कुंजबिहारिन लाडिली, कुंजबिहारी लाल - श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (15)
प्रिया-प्रियतम अपनी अंतरंग केलि में, तन और मन से एक होकर अत्यंत मनोहर लग रहे हैं। उनके प्रत्येक अंग की शोभा परम मधुर है, और कुंज-महल ही उनकी केलि का निज धाम है।
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प्रिया-प्रियतम अपनी अंतरंग केलि में, तन और मन से एक होकर अत्यंत मनोहर लग रहे हैं। उनके प्रत्येक अंग की शोभा परम मधुर है, और कुंज-महल ही उनकी केलि का निज धाम है।
हमारे यहाँ के, श्रीस्वामी हरिदास जी के अनुयायी सन्त, श्री प्रिया प्रियतम के अतिरिक्त किसी अन्य देवी-देवता का प्रसाद ग्रहण करना पसन्द नहीं करते और न कभी वस्त्र (आदिक) का अडंगा ही लगाते हैं।
श्री श्यामा (राधा) नित्य नवीन, अनुपम नागरी हैं, जो रूप और गुणों की खान हैं। वे अत्यन्त सुभग, ललित और राजराजेश्वरी स्वरूपा हैं ।
गिरिराज गोवर्धन की दोनों आँखें श्री राधा कुंड और श्री श्याम कुंड रूपी दो युगल कुंड हैं। इनकी ऐसी दिव्य महिमा है कि ये साक्षात प्रिया-प्रियतम (श्री राधा-कृष्ण) के ही स्वरूप हैं। इनकी तुलना किसी और से नहीं की जा सकती।
वही वास्तविक रसिक अनन्य कहलाता है जिसके श्रवणेंद्रिय को युगल (श्री राधा कृष्ण) की रस लीलाओं के अतिरिक्त और कुछ भी सुनना अच्छा नहीं लगता।
वृन्दावन, जो स्वयं प्रिया-प्रियतम का निजमहल है, वहाँ केवल युगल के प्रेम-विलास का रस ही सतत बरसता है। बेगमदास कहते हैं कि सखीभाव के बिना किसी को भी उस रस में प्रवेश नहीं है।
दोनों प्यारे (प्रिया-प्रियतम) कुंजमहल में फूलों से सजे हुए झूले पर झूल रहे हैं । कुंजमहल में फूलों की सुंदर सजावट की गई है, खिले हुए फूलों से ही हर कोना सँवारा गया है।
मुझे तो ललिता अवतार स्वामी श्री हरिदास जी पर विश्वास है । उनकी करुणा ऐसी है कि वे जिस पर कृपा करते हैं, उसे भी अपने समान बना लेते हैं । अर्थात् जिस प्रकार वे स्वयं श्री प्रिया-प्रियतम की सेवा करते हैं, वही सेवा का अधिकार वे अपने कृपापात्र को भी दे देते हैं। उनके प्राणों का आधार युगल नित्य विहार है ।
जो बड़भागी जन प्रभु के प्रेम-रस में भीग जाते हैं, उनके नेत्र प्रेम के नशे में मतवाले हो जाते हैं । उस प्रेम रस के प्रभाव से वे सांसारिक संबंधों से अनभिज्ञ हो जाते हैं ।
हे युगल सरकार श्री राधा-कृष्ण! मैं आपके चरणों में बारम्बार प्रणाम करता हूँ — कृपा करके एक बार मेरी ओर दृष्टि डालिए। मुझे वृंदावन वास प्रदान कीजिए क्योंकि वृंदावन से बाहर बिताया हुआ प्रत्येक क्षण जीवन की अपूरणीय क्षति है ।
प्रिया प्रीतम की यह दिव्य रस रीतिः नित्यविहार रस स्वाति नक्षत्र की वर्षा के जल के समान दिव्य और फलदायी है।
ऋतुराज वसंत के भव्य आगमन से वृंदावन अनुपम शोभा से विभूषित होकर आनंद में नृत्य कर रहा है, जिससे प्रत्येक कुंज और उपवन उसकी सुंदरता से भर उठे हैं।
अरी सखी ! चलो न, श्यामा- कुञ्जविहारी का वसन्तोत्सव देखने चलें । देखो, श्रीधाम वृन्दावन नव-नव उमंगों से पुलकित हो रहा है । इसकी कुंज निकुजें भी नवीन हैं और पत्र-पुष्पों का विकास भी नवीन है । ऐसे सरस वातावरण में श्यामा श्याम नव तरुणियों के बीच उनसे मिलकर वसन्तोत्सव मना रहे हैं ।
आज, मनोहर कुंज महल में, श्री राधा और श्री कृष्ण प्रेम-रस में लीन होकर एक संग गान कर रहे हैं।
श्री प्यारी जू (श्री राधा) के नेत्रों में रस की छकन भरी हुई है। ये प्रियतम के मन को वश में करना जानते हैं। इनको यह अभ्यास ही पड़ गया है।
निज धाम श्री वृंदावन में अखंड नित्य विहार रस है, जहाँ जीव को गुरु कृपा से अचल विश्राम प्राप्त होता है।
श्रीप्रिया-प्रियतम (श्रीराधा-कृष्ण) एक पल के लिए भी एक-दूसरे से अलग नहीं होते। जैसे दर्पण में दिखाई देने वाले प्रतिबिंबित नेत्र, देखने वाले के नेत्रों में मिलकर एक हो जाते हैं, उसी प्रकार श्रीश्यामाश्याम एक-दूसरे में मिलकर अभिन्न हो गए हैं।
जिसमें प्रिया-प्रियतम को सुख मिलता है, केवल वही हमारा धर्म है। जिसमें उनकी अनन्यता भंग नहीं होती, वही हमारा कर्म है।
श्री वृंदावन धाम का वास सर्वोत्कृष्ट है । यहाँ प्रिया प्रियतम की ही पग पग पर लीला स्थली विद्यमान है, अत: जहां जहां भी यह मन जाता है वहाँ वहाँ उसके जीवन धन श्यामा श्याम दिखते हैं । [1]
प्रिया-प्रियतम की लीला भूमि श्री धाम वृंदावन की तो शोभा ही निराली है। यहाँ का कण-कण सुवर्ण तथा रत्न कणों से भी अधिक बहुमूल्य है तथा यमुना जी का स्पर्श ह्रदय में सरस रस बरसाता है।