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  1. अरी तेरी सहज की मुसिक्यान - श्री नंददास ग्रंथावली, पदावली (68)

    इस पद में सखियाँ श्री राधा की सुंदरता और उनके प्रति श्री कृष्ण के समर्पण का वर्णन करती हुई कहती हैं कि हे सखी! तेरी सहज मनमोहक मुस्कान ने श्री कृष्ण को मोह लिया है। सारा संसार जिनका यश गाता है, वे श्री कृष्ण अब तुम्हारे अधीन हैं।

  2. कौन फिरत या विपिन राज में राधे राधे कहि टेरत - श्री लछिराम

    श्री धाम वृन्दावन में श्री कृष्ण की श्री राधा नाम पुकार सुन, एक भक्त चकित होकर पूछता है - यह कौन है जो श्री धाम वृन्दावन में “राधे राधे” पुकार करता हुआ विचरण कर रहा है?

  3. भजौं तो गुपाल ही कौं - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, विनय प्रेम पचासा (21)

    यदि मैं पूजा करता हूँ तो वह केवल गोपाल की, यदि सेवा करता हूँ तो वह भी केवल गोपाल की — मेरा मन नंदलाल में ही सब भाँति से लगा हुआ है।

  4. वे जमुना, वे सखा हमारे नित नव केली विहारी - श्री सूरदास, सूर सागर (4892)

    श्री कृष्ण सत्यभामा से कहते हैं - मैं शपथपूर्वक कहता हूँ, वह यमुना, वह हमारे प्रिय ब्रजवासी सखा, सखियों संग नित्य नवीन केली विहार, वृंदावन धाम के पुष्प एवं लताएँ—ये सभी मेरे मन रूपी मधुकर को अत्यधिक प्यारी हैं।

  5. देखो देखो ब्रजकी बीथिनि बीथिनि खेलत हैं हरि होरी - श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (68)

    अरी सखी! देखो, ब्रज की हर एक गली में आनंद के सागर स्वयं हरि, प्रेमपूर्वक होली खेल रहे हैं। मधुर गीतों, हास-परिहास और लीलाओं के मध्य, हजारों सखाओं के संग वे रंगों की इस उत्सवमयी रसधारा में मग्न हो रहे हैं।

  6. जैसैं सुखहीं तन बढ़यौ तैसैं तनहिं अनंग - श्री सूरदास, सूर सागर

    जैसे-जैसे सुखपूर्वक शरीर पुष्ट होता गया, वैसे-वैसे उसमें काम की वृद्धि होती गई। जिसके परिणाम स्वरूप अज्ञानता रूपी धुआँ इतना बढ़ गया कि विचाररूपी दृष्टि-शक्ति नष्ट हो गयी, जिससे तुझे तेरे सदा साथ रहने वाला सच्चा मित्र (प्रभु) दिखाई नहीं पड़ा।

  7. श्री गरुड़ गोविन्द मंदिर

    छटीकरा के पास स्थित इस स्थान पर श्री कृष्ण की विभिन्न लीलाएं संपन्न हुई। एक दिन, गायों को चराते समय, श्री कृष्ण अपने सखाओं के साथ लीला करने लगे।

  8. गोस्वामी श्री हित राधालाल जी की जीवनी

    गो. श्रीराधालाल जी का जन्म 1885 की आश्विन बदी तृतीया के दिन वृन्दावन में हुआ था। इनके पिता गो. श्रीगोवर्द्धनलाल जी श्रीराधावल्लभ मन्दिर के रासवंशीय सेवाधिकारी थे।

  9. जन्म हुआ भाग्य से पवित्र भूमि वृन्दावन - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (40)

    ब्रजवासी बालक कहता है: जहां जन्म लेने के लिए देवताओं का राजा भी तरसता है ऐसी पवित्र भूमि श्री धाम वृंदावन में भाग्य से हमारा जन्म हुआ है।

  10. प्यारी जू हम तुम दोऊ इहाँ न कोउ हितू मेरौ - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (79)

    हे प्यारी जू, हम दोनों एक ही कुंज के साथी हैं, तो हम क्यों एक दूसरे से रूठें । यहां कोई हमारा ऐसा हितैषी नहीं जो हम दोनों की पीर को समझ सके । [1]

  11. मधुवन - ब्रज की महिमा

    मधुवन ब्रज के प्रसिद्ध 12 वनों में से एक है । सतयुग में मधु नामक एक दैत्यका भगवान ने यहाँ वध किया था । इस कारण भगवान का नाम मधुसूदन हो गया । अतः भगवान् श्रीमधुसूदन के नामपर इस वनका नाम मधुवन पड़ा है, क्योंकि यह मधुवन भगवान् श्रीमधुसूदन के समान ही प्रिय एवं मधुर है ।

  12. अब तो कृपा करो व्रजवासी - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (98)

    हे ब्रज वासी जन, अब मुझपर कृपा कीजिए । आप सब तो जुगों जुगों से श्री श्यामसुंदर के सखा हो और उनकी लीला की उपासी हो ।

  13. वृंदावन मोकों अति भावत - श्री सूरदास, सूर सागर

    श्री श्यामसुन्दर कहते हैं: अरे सब सखाजन सुबल, श्रीदामा, तुम लोग सुनो! वृन्दावन मुझे बहुत प्रिय है, इसी कारण व्रज से मैं यहाँ वन में गायें चराने आता हूँ ।

  14. श्री छीतस्वामी की जीवनी

    श्री छीतस्वामी श्रीनाथजी के अष्ट सखाओं में से एक थे एवं पुष्टिमार्ग में अष्टछाप भक्तों में से थे। ये ब्रजवासी थे एवं इनका जन्म मथुरा में सन 1515 में चौबे परिवार में हुआ था। कालांतर में छीतस्वामी गुसाईं श्री विट्ठलनाथ जी के शरणागत हुए एवं श्रीनाथजी को पद गाकर सुनाते थे।

  15. श्री गोविन्द स्वामी की जीवनी

    श्री गोविन्द स्वामी (1505 - 1586) मध्य प्रदेश के ग्वालियर के निकट आंतरी ग्राम में रहते थे। वहां ये इसी नाम से जाने जाते थे। इनके मन में सदा यही प्रश्न उठता की "भगवान के चरणारविन्दों की प्राप्ति कैसे होगी ?" इसी प्रश्न का सदैव विचार करते थे।

  16. श्री परमानन्ददास जी की जीवनी

    श्री परमानन्ददास जी का जन्म कन्नौज के एक ब्राह्मण घर में 1493 में हुआ। ये श्री कृष्ण के परमसखा थे और बड़े उच्च कोटि के कवि थे। श्री परमानन्ददास जी अपने रचे पदों को बड़े मधुर राग में गाते और कीर्तन करते। जो भी इनका कीर्तन सुनता वह भाव विभोर हो उठता।