शेष महेश दिनेश गणेश लौं - श्री प्रेम जी
शेष, शिव, सूर्य, गणेश तथा स्वयं वेद भी विचार करते-करते उस परम तत्त्व की पूर्ण सीमा नहीं पा सके।
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शेष, शिव, सूर्य, गणेश तथा स्वयं वेद भी विचार करते-करते उस परम तत्त्व की पूर्ण सीमा नहीं पा सके।
जिस वृन्दावन-रस रूपी मार्ग को ब्रह्मा, शेष, शिव आदि भी खोजते फिरते हैं, उसी अद्भुत मार्ग को आपने इस पृथ्वी पर दुर्लभ से सुलभ बना दिया। हे रसिक-शिरोमणि, श्रीहित हरिवंश महाप्रभु! आपकी जय हो।
यदि स्वप्न में भी कोई दुखी जीव आह भरकर उन्हें पुकारता है, तो वे (श्रीकृष्ण) शेषनाग और गरुड़ आदि को भी त्यागकर उसकी ओर दौड़ पड़ते हैं।
कोई उन्हें (भगवान) “अलख-अनन्त” कहता है, कोई उसे “ब्रह्म” या “जोति/प्रकाश” कहकर वर्णित करता है।
इस धराधाम पर श्रीकृष्ण ने किसी भी गोपी को उतना नहीं अपनाया, जितना उन्होंने उस एक गोपी (श्रीराधा) को अपनाया, जिन्हें अपने साथ वे रास में अकेले ले गए। इस रहस्य को वेद भी नहीं जान सके।
श्री वृंदावन धाम प्रेम की राजधानी है जहां के राजा नायक शिरोमणि श्री श्याम सुन्दर और रानी तरुणि-मणि श्री राधिका हैं । पाताल से वैकुंठ तक के सब लोकों का स्वामी यह वृंदावन धाम है ।
न मैं शेष से याचना करता हूँ, न शिवजी से, न इंद्र से, और न ही अन्य किसी देवी देवता का वरदान चाहता हूँ।
श्री वृन्दावन धाम सुख, रस एवं रूप की अपार निधि है, जिसकी महिमा का वर्णन सरस्वती, नारद, शेष, शिव एवं चारों वेद करते हैं।
जिसके नाम को वेद रटते हैं, ब्रह्मा रटते हैं, भगवान शिव रटते हैं, शेष रटते हैं, नारद, शुकदेव एवं वेद व्यास जी रटते हैं लेकिन पार नहीं पाते।
माता सरस्वती और शेष जी का क्या कहना, श्री राधारानी के गुण तो चारों वेद गा रहे हैं।
जिन चरणों की वंदना तीनों लोकों में होती है और जिनका आनंद अपार है, उन चरणों का वंदन स्वयं धरती को अपने फन पर धारण करने वाले शेषनाग भी करते हैं।
रसिक भक्त कवि श्री ब्रजवासीदास जी परम विरक्त एवं सांसारिक प्रचार-प्रपंच से सर्वदा दूर रहने वाले सिद्ध भक्त थे। निरन्तर श्रीराधा माधव का चिन्तन एवं उनका ही गुणानुवाद वर्णन इनका प्रमुख कार्य था।
श्री वृन्दावन धाम की शोभा और सुन्दरता का वर्णन भला ऐसा कौन है जो कर सके जब शेषनाग, महादेव, गणेश जी और ब्रह्मा जी भी उसकी महिमा का पार नहीं पा सकते।
श्री वृन्दावन की माधुरी का वर्णन किस प्रकार किया जाए? जिसका वर्णन करते-करते सहस्रमुखी शेषनाग भी थक गए और श्री ब्रह्मा जी भी उसका पार न पा सके।
हे देवि ! वृन्दावन दिव्य ब्रह्म रूप, तथा सच्चिदानन्द स्वरूप है। यह सर्वदा भगवान की आधार शक्ति स्वरूप शेषांग पर स्थित है।
शिव, शेषनाग आदि देवता भी बरसाना-वास की आशा रखते हैं। बरसाना की महिमा का बखान कौन कर सकता है, जहाँ स्वयं भगवान श्रीकृष्ण भी सखी का रूप धारण करके प्रवेश करते हैं।
जिसे ब्रज की रज प्राप्त हो जाती है, उसकी कोई इच्छा शेष नहीं रह जाती; क्योंकि ब्रज की लालसा तो नित्य ही ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी आदि को भी बनी रहती है।
किसी को शेषनाग पर भरोसा है, कुछ को भगवान सूर्य पर भरोसा है। कुछ को भगवान शिव पर भरोसा है, जो वरदान देने के लिए प्रसिद्ध हैं।
हे वृषभानु नंदिनी श्री राधा, आप भक्तों के प्राणों की आधार हैं। हे वृन्दावन विहारिणी, मैं बार-बार आपको प्रणाम करता हूँ। हे कृष्ण प्रिया, हे समस्त सुखों की धाम, मैं जैसा भी हूँ, जो भी हूँ, परन्तु आपका ही हूँ।
श्री कृष्ण, प्रेम के वश मुरली में "राधे राधे" शब्द की धुन बजा रहे हैं, जिससे यह समस्त ब्रह्मांड मोहित हो रहा है, और इससे यह सिद्ध हो रहा है की राधा नाम अति गूढ़ एवं मन्त्र शिरोमणि है।