जो रस बरस रह्यो बरसाने - ब्रज के लोक गीत
बरसाने में जो मधुर प्रेम-रस बरस रहा है, वैसा रस तीनों लोकों में कहीं नहीं है। इतना ही नहीं, वह रस तो स्वयं वैकुण्ठ में भी दुर्लभ है।
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बरसाने में जो मधुर प्रेम-रस बरस रहा है, वैसा रस तीनों लोकों में कहीं नहीं है। इतना ही नहीं, वह रस तो स्वयं वैकुण्ठ में भी दुर्लभ है।
मैं श्री वृषभानुपुर (बरसाना) की वंदना करता हूँ, जो सर्वोपरि और अत्यंत सुंदर है। यह धाम भगवान श्री हरि के अन्य धामों (वैकुंठ आदि) से भी कहीं अधिक महिमामय और श्रेष्ठ है, जिसका पावन नाम 'श्री बरसाना' है।
भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं कि हमें ब्रज की प्यार की गालियाँ अत्यंत ही अच्छी लगती हैं। 'दारी के' इस गाली को सुन-सुन कर मैं अपने बैकुण्ठ लोक के सुख को न्यौछावर करते हुए बलिहार जाता हूँ।
परम प्रियतम भगवान श्रीकृष्ण के प्रेम में रंगा हुआ जीव संसार, शरीर और परमार्थ की स्मृति से परे हो जाता है। उसे न जग की परवाह रहती है, न वैकुंठ/मुक्ति आदि की चाह। उसे अपने शरीर तक की भी सुध नहीं रहती ।
हे नवलाल (श्री लाडली लाल)! कृपया मेरी विनती सुनिए और मुझे श्रीवृंदावन का वास एवं वाहन की कुंजों की सोहनी सेवा करने का अवसर दीजिए।
पृथ्वी पर स्थित वृंदावन पूर्ण ब्रह्म का साकार रूप है जो परम सुख, ऐश्वर्य एवं नित्यानंद से परिपूर्ण है। वैकुंठ आदि लोक तो इसके केवल अंश मात्र हैं।
महाराज वृषभानु जी का बरसाना, जहाँ श्री राधारानी सदा वास करती हैं, समस्त सुखों का सार है, जिस पर अरबों-खरबों वैकुंठ धाम भी न्योछावर किए जा सकते हैं।
दयाबाई कहती हैं कि हे भगवान, मैं आपकी सौगंध खाकर कहती हूँ कि भले ही मुझे सदा दुख मिलता रहे, मुझे दुख को छोड़कर सुख की बिल्कुल भी इच्छा नहीं है और न ही मुझे वैकुण्ठ की ही इच्छा है। मैं तो अपने मन को केवल और केवल आपके चरण-कमलों में ही निरंतर लगाना चाहती हूँ।
अवध आदि श्री हरि के जितने भी धाम हैं, उनका फल वैकुंठ धाम की प्राप्ति है। ऐसे अनंत कोटि वैकुंठ धामों को श्री वृन्दावन धाम की रज के ऊपर वार देना चाहिए।
हे वृन्दावन में विलास करने वाली श्री राधे! जहाँ जहाँ पर भी मैं आपका दर्शन नहीं करती, उन वैकुंठ आदि परम धाम (एवं उनकी कामना) भी मेरे लिए अत्यंत तुच्छ है ।
सब रसों का सार रस, वृंदावन रस अनंत है क्योंकि यह युगल किशोर श्री राधा-कृष्ण का नित्य निवास स्थान है। स्वयं भगवान श्री हरि भी, कमलापुर (वैकुंठ) में वास करते हुए, निरंतर ब्रज वास की आशा करते हैं।
हे प्रिया जी (श्री राधा), मेरा मन केवल आपके चरणारविंदों की आशा को छोड़कर कहीं भी इधर-उधर नहीं भटकता है। मेरे मन को आपके चरणों की परछाईं के बिना और कुछ भी नहीं सुहाता।
किसी को सज्जन पिता, माता, भाई, बेटा और सुंदर स्त्री मिलते हैं, जिन्हें पाकर वे सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करते हैं।
स्वामी श्री हरिदास जी की विशुद्ध नित्य विहार उपासना में न तो संगम-तीर्थ (कुम्भ स्नान) का महत्व है और न ही सूतक एवं पातक का।
मेरा मन पृथ्वी के नश्वर राज्यादि के सुखों का आदर नहीं करता और स्वप्न की सी माया जानकर उसको त्याग देता है।
जागृत, स्वप्न एवं सुषुप्ति अवस्था में भी श्रीराधा कृष्ण के चरण कमलों की छटा ही मेरे मन में स्फुरित होती रहे । बैकुण्ठ अथवा नरक में भी उनके अतिरिक्त मेरे लिये कोई अन्य गति न हो ।
ब्रज में बालकृष्ण की चंचल लीलाओं के मध्य, उनके मामा कंस उन्हें समाप्त करने के लिए बार-बार असुरों को भेजते रहते थे, जैसे शकटासुर, पूतना, तृणावर्त, व्योमासुर, बकासुर, आदि। ऐसा ही एक असुर था जिसका नाम अघासुर था।
हे श्री राधे! न आप वैकुण्ठ लोक में हैं और न आपके रस दाता प्रियतम श्री कृष्ण ही । यदि आप कहीं हैं, तो केवल श्री वृंदावन में । अतएव मैंने भी उसी श्री वृंदावन का आश्रय ग्रहण किया है ।
श्री अभयराम जी जगद्गुरु निम्बार्काचार्य श्री 'श्रीजी' श्री निम्बार्कशरण देवाचार्य जी के शिष्य थे। श्री अभयराम जी की जन्म तिथि का ठीक-ठीक पता नहीं चलता पर अन्तः साक्ष्य एवं वंश परम्परा के आधार पर ज्ञात होता है कि इनका जन्म 1830-1835 ईसवी के आसपास हुआ होगा।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि समस्त तीर्थों से, वैकुण्ठ से भी श्रेष्ठ मथुरा है क्योंकि यह भगवान श्री कृष्ण की जन्म भूमि है ।