हमारे प्यारे श्यामाश्याम बिराजे - श्री नूपीबाई
रत्नजड़ित सिंहासन पर, समस्त सौंदर्य की निधि, हमारे प्यारे श्री श्यामा-श्याम आज सुशोभित हैं।
बिलावल राग सुबह का राग है जिसे दिन के पहले प्रहर में गाया जाता है सवेरे (6बजे - 9बजे) जिसे गहरी भक्ति और विश्राम के साथ, अक्सर गर्म महीनों के दौरान प्रदर्शन किया जाता है।
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रत्नजड़ित सिंहासन पर, समस्त सौंदर्य की निधि, हमारे प्यारे श्री श्यामा-श्याम आज सुशोभित हैं।
श्रीराधा और श्रीमोहन (श्रीकृष्ण) श्री धाम वृन्दावन में नित्य विहार करते रहते हैं। वे स्वभाव से ही सहज रंगीले, छैल-छबीले हैं, जो हृदय में प्रेम का संचार (आदान-प्रदान) करते रहते हैं ।
अपनी प्राणसखी श्रीराधा से प्रेम-लीला की चातुर्यपूर्ण योजना करते हुए सहचरी (विठ्ठल विपुल) मधुर वाणी में कहती है — हे सखी! मैं तो आप पर बलिहार जाती हूँ। चलिए अब धीरे-धीरे प्रियतम की ओर चलते हैं।
श्रीविपुलबिहारिनदासीजी निज प्राण-लालसा को प्रकट करती हुई अपनी प्राण-सखी श्री राधा से निवेदन करने लगीं - हे श्यामा प्यारी ! निकुंज-भवन पधार कर केलि-रंग में अनुरंजित हों, आपको इस रस में लाड़ लड़ाने के लिए हमारे तन-मन-प्राण आकुल-व्याकुल हो रहे हैं।
हे प्रियाजी (श्री राधे), मैं तो आपकी दासियों की भी दासी हूँ । अब मुझ पर कृपा करें, हे लाड़िली, क्योंकि बहुत अधिक विलंब हो चुका है।
हे भामिनी!, मैं बार बार विचार करता हूँ, परंतु आपके स्वरूप की तुलना के लिए कुछ भी उपयुक्त नहीं पाता ।
हे नित्य बिहारिनी श्री राधा! कृपा कर मेरी इस विनम्र प्रार्थना को सुन लीजिए। मुझ पर ऐसी अनुग्रह दृष्टि कीजिए कि मैं सदा चकोरी बनकर आपके चंद्रमा सदृश आनंदमय मुखकमल का दर्शन करती रहूँ।
श्री बाँके बिहारी जी महाराज, नित्य विहारिणी श्री प्यारी जू [श्री राधा] के खिलौने के समान हैं जिनके अंगों से विविध प्रकार के रति रंग-रस उत्पन्न होते हैं जो मन को अति मोहने वाले एवं लावण्य युक्त हैं ।
रूप की राशि श्रीराधा लाल को सहज ही अपने वश में कर लेने वाली हैं, कामदेव का प्रचंड दर्प तो उन्हें देखते ही चूर चूर हो जाता है, अपने यौवन के उल्लास में वे लचक-लचक कर चलती हैं और शोभा का भार वक्ष्यस्थल को उठाये हुए है ।
हे वृंदावन की महारानी, श्री राधा रानी, मुझ पर कृपा कीजिए । तुम्हारी महिमा अगाध एवं अपरंपार है जिसका पार वेद भी नहीं पा सकते अत: वे नेती नेती कह कर वर्णन करते हैं ।
यदि पर्वत रुचिकर हो तो श्रीगोवर्धन में निवास करो, यदि ग्राम रुचिकर हो तो नंदगाँव में निवास करो।
मेरी प्यारी श्री राधिका रंग रंगीली एवं सुकुमारी हैं । मेरे बिहारीजी सभी सुखों के धाम हैं, जो रूप से उज्ज्वल हैं और रसिक चूड़ामणि हैं ।
हे श्रीराधे, आज तुम प्रेम-रंग भरी दिखलाई दे रही हो, मालूम होता है कि तुमने अपने मोहन प्रियतम के साथ रात्रि में एकान्त रमण किया है ।
जिसके नाम को वेद रटते हैं, ब्रह्मा रटते हैं, भगवान शिव रटते हैं, शेष रटते हैं, नारद, शुकदेव एवं वेद व्यास जी रटते हैं लेकिन पार नहीं पाते।
हमारी लाड़िली नित्य विहारिनी [श्री राधा] सुख की राशि हैं । जिनका स्वरूप अति अद्बुत एवं अनूप है, मन को मोहने वाली एवं जिनकी छबीली मृदु हास [मुस्कान] है ।
श्री राधा प्यारी के चरणारविंद अत्यंत शीतल हैं । ऐसे श्री चरणों के नख की चाँदनी के समक्ष तो कोटि-कोटि चंद्रमा भी मंद प्रतीत होते हैं ।
श्री पीतांबर देव सहचरी स्वरूप से कहते हैं कि मेरा मन श्री कुंज बिहारी श्री कुंज बिहारिनी के विपिन विहार में ऐसा अटक गया है कि वह नित्य ही प्रिया प्रियतम के दिव्य स्वरूप को निहारता रहता है ।
आज दीपावली का त्यौहार है। यशोदा नंदा बाबा से कहती हैं कि यह पर्व उनके मन को बहुत प्रिय है।
हे नवनागरी प्यारी [राधिका], तुम्हारा यशोगान मुझे बहुत भाता है । हे नित्य बिहारिनी, श्री लाड़िली जी! भगवान श्री कृष्ण स्वयं आपका ही यश अपने मुख से गाते हैं ।
ब्रज के लाड़िले यशोदा पुत्र नंदनंदन राधावर श्री श्यामसुंदर की रूप माधुरी सबके हृदय को भाती है।