राग गौरी

धाराधरा निभाकारा धीरा गंभीरनिस्वना। गौरी जनमनोहारी गरकंठ प्रियस्वरा॥ - देवर्षि नारद, राग निरूपणम् (161) राग गौरी, राग हंसक की पत्नी हैं। इनका रूप श्याम मेघ की भाँती है। (एक काले बादल की तरह काले रंग का)। वे निर्भीक और गरिमापूर्ण हैं, जिनमें एक गुंजायमान ध्वनि है। इनके रसीले कंठ की आवाज़ लोगों को मंत्रमुग्ध कर देती है। राग गौरी श्रोता को एक उद्देश्य प्राप्ति की कड़ी मेहनत करने के लिए प्रोत्साहित करता जाता है। हालांकि, राग द्वारा दिया गया प्रोत्साहन अहंकार को बढ़ने नहीं देता है। इसलिए, यह एक ऐसा वातावरण बनाता है जहां श्रोता को प्रोत्साहित किया जाता है, लेकिन फिर भी अभिमानी और आत्म-महत्वपूर्ण बनने से रोका जाता है।

56 संकीर्तन उपलब्ध हैं

  1. आजु सखी तोहिं लागी इहै रट - श्री चतुर्भुज दास

    हे सखी! आज तो तुझे बस यही एक रट लग गई है। तू वृन्दावन के सीधे-टेढ़े और दुर्गम वीथियों में भटकती हुई 'गोविन्द ले लो, कोई गोविन्द ले लो!' यही पुकारती फिर रही है।

  2. कुंज महल रंग हो हो होरी - श्री वंशी अली जी, वर्षोत्सव, बसंत के पद (15)

    निकुंज रूपी महल में होली के रंगों की धूम मची हुई है, जहाँ नित्य किशोर श्री कृष्ण और नित्य किशोरी श्री राधा प्रेम की होली खेल रहे हैं। ताल, मृदंग, झाँझ और ढप जैसे वाद्य यंत्र बज रहे हैं और झोलियों से भर-भर कर अबीर और गुलाल उड़ाया जा रहा है।

  3. बैंनु माई बाजै बंसीवट - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (64)

    हे सखी! वंशीवट में श्री कृष्ण की वंशी की मधुर ध्वनि गूँज रही है। श्री धाम वृन्दावन के परम पावन एवं सुन्दर यमुना तट में सदा वसंत ही रहता है ।

  4. जमुना-पुलिन कुंज गहबर की - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (65)

    ऐसा कब होगा कि मैं यमुना-तट के किसी एकांत कुंज में किसी वृक्ष पर कोयल बनकर कूकूं, अथवा श्री राधा-कृष्ण के चरण-कमलों का भौंरा बनकर मधुर-मधुर गुंजार उन्हें सुनाऊं।

  5. श्री हरिवंश सरन जे आये - श्री नेह नागरी दास जी की वाणी, सिद्धांत (136)

    जो भी जीव श्रीहरिवंश महाप्रभु जी की शरण में आ गए, उनका नाम स्वयं श्री राधा-श्यामसुन्दर ने अपने हस्तकमल से भक्तों की सूची में अंकित कर लिया।

  6. प्यारी मुहिं दीजै श्री वृन्दावन वास - श्री ललित माधुरी जी

    हे प्यारी जू (श्री राधा)! मुझे श्री वृंदावन धाम में वास प्रदान करें, जहाँ हर क्षण नव अनुराग का वर्धन होता है और भक्त प्रेम-रस रास का आस्वादन करता है।

  7. आनंद सिंधु बढ्यौ हरि तन में - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (551)

    श्री राधा के शरद पूर्णिमा के चन्द्र के समान मुख को देखकर, श्री कृष्ण के श्री अंगों में आनंद का सिंधु ऐसा उमड़ने लगा कि वह आनंद का समुद्र लहर बनकर ब्रज वृंदावन में बह चला ।

  8. कहा भयौ वृंदावनहि बसै - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (262)

    श्री धाम वृंदावन में यदि वास भी मिल गया तो ऐसा क्या हो गया क्योंकि जब तक लोभ एवं पाखंड रूपी माया से वे ग्रसित है तब तक उसने घर को त्याग कर भी ऐसा क्या कमाल कर दिखाया?

  9. कोंन तप कीनों नथ कैं मोती - श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (44)

    श्री प्रिया जी (श्री राधा) के नथ के मोतियों ने ऐसी कौन सी तपस्या की है कि श्री राधा ने उन्हें अपने नथ का मोती बनाया है और वे नित्य ही अधर सुधा का आचमन करते हैं, और एक क्षण को भी बिछड़ते नहीं ।

  10. एक पकौरी सब जग छूट्यौ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (300)

    इस पद में महाप्रसाद की महिमा का वर्णन करते हुए श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि जप, तप, व्रत, संयम आदि सब कुछ करके मैं हार गया, मेरा मन तनिक भी न टूटा परंतु श्री राधा वल्लभ लाल के महाप्रसाद की एक पकौड़ी ने मेरा समस्त संसार छुड़वा दिया ।

  11. मदनगुपाल सरन तेरी आयौ - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (1)

    हे मदनगोपाल! इस जीव को अपना निजी दास मानकर अपने श्रीचरण-कमलों की सहज, स्वाभाविक और रसमयी सेवा प्रदान कीजिये, तथा मुझे सदैव अपनी ही शरण में रखिये।

  12. आज सखी बनी है अनोखी जोरी - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (178)

    हे सखी! आज जुगल किशोर श्री श्यामाश्याम की जोड़ी बड़ी सुन्दर लग रही है । दोनों अपनी रुचि अनुसार श्री वृन्दावन के मनोहर श्री यमुना तट पर विहार कर रहे हैं । वे सुन्दर फूल-बंगला में सुशोभित हैं ।

  13. अहो विधना ! तो पै अचरा पसारि मांगों - श्री छीत स्वामी (अष्टछाप कवि)

    श्री छीतस्वामी परमात्मा से [विधाता से] यही आँचल पसार कर अनुग्रह की याचना करते हैं कि उन्हें सदा जन्म जमान्तर में ब्रज में ही वास मिले, एवं अहीर जाति में जन्म मिले, एवं उनका घर नन्द बाबा के घर के समीप हो, जिससे वे हर घड़ी श्यामसुंदर के दर्शन कर सकें, उनके साथ हंस-खेल सकें ।

  14. प्रेम कला सुर सहित पिय - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (55)

    श्रीवृन्दावन की निभृत निकुञ्जों में श्रीप्रिया-प्रियतम विहार कर रहे हैं। श्रीप्रियाजी के वक्ष पर पुष्प-हार को देख श्रीलालजी का मन प्रेम की मधुर अभिलाषाओं से उत्कंठित हो उठता है और वे प्रियाजी से उनके हृदय से स्पर्श किए हुए हार की याचना करते हैं।

  15. सुभग सुहाग को चिनौं प्यारी तेरे चरननि सोहै - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्द्ध (81)

    सखी भाव में अवस्थित श्री हरिराम व्यास श्री राधा से कहते हैं "हे प्यारी जू, परम सुभग श्री श्यामसुंदर के सुहाग चिन्ह तो आपके चरणों में शोभायमान है, एवं श्री वृन्दावन में इन्हीं चरण कमलों के चिन्ह श्री कृष्ण के मन को मोह लेते हैं।"