राग कान्हरौ

राग कान्हरौ (राग कान्हरौ) सबसे अधिक प्रयोग में लाये जाने वाले रागों में से एक है जिसे रात्रि के दूसरे प्रहार में गाया जाता है। इसे राग दरबारी भी कहते हैं क्यूंकि इसे तानसेन ने अनेक अवसरों पर राज महलों में गायन किया था। इस राग से मीठा एवं गंभीर वातावरण उत्पन्न होता है ।

74 संकीर्तन उपलब्ध हैं

  1. दूलह मदनगोपाल राधा नव दुलही - श्री सूरदास मदनमोहन जी की पदावली (03)

    एकमात्र विशुद्ध प्रेम के वश में होकर जिन ब्रजांगनाओं ने मनमोहन श्री कृष्ण को पूरी तरह अपने अधीन कर लिया है, इसी कारण इस ब्रज की प्रेम-रीति संपूर्ण ब्रह्मांड से अत्यंत विशिष्ट और निराली है।

  2. श्रम जल कन नाहीं होत - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (59)

    हे राधे! सुरत-श्रम के पश्चात तुम्हारी रसमयी छवि के श्रीअंगों पर सुशोभित ये स्वेद-बिन्दु (पसीने की बूँदें) कोई साधारण जल-कण नहीं हैं, अपितु ये साक्षात् चिन्मय मोतियों की माला के समान दमक रहे हैं। संसार में अनेक बहुमूल्य मोती तो देखे, किन्तु इस अलौकिक छवि का कोई मूल्य नहीं है; इस अद्भुत रूप-माधुरी पर मैं अपना तन, मन और धन सब कुछ बार-बार न्योछावर करता हूँ।

  3. मिलि खेलि मोहन सौं - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (31)

    श्रीविपुलविहारिनदासी जी अपनी प्राण-प्यारी सखी श्री राधा से कह रही हैं— हे प्यारीजू! आप अपने मनचाहे चाव और उमंग के साथ श्रीमोहनलाल (श्री कृष्ण) से मिलकर क्रीड़ा कीजिए। जब आप रस में उन्मत्त होकर अपने प्राणप्यारे कुंजबिहारी संग रस-विलास में प्रवृत्त होती हैं केवल तभी हमारे तन-मन-प्राण प्रफुल्लित होते हैं मानो हमारा रोम-रोम सब प्रकार से परितृप्त हो उठता है।

  4. यह माँगों गोपी-जन-बल्लभ - श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (1350)

    हे गोपीजनवल्लभ (श्री कृष्ण)! मैं आपसे बस यही वरदान माँगता हूँ की जब जब भी मुझे मनुष्य जन्म प्राप्त हो, श्री हरि की सेवा मिले और श्री ब्रजधाम का ही वास प्राप्त हो।

  5. द्वै लर मोतिन की एक पुंजा पोति कौ सादा - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (20)

    श्री कुंजबिहारिणीजू (श्रीराधा) के गले में मोती की दो लरियों वाला हार, सादा और एकदम सुगठित है।हे सखी! मेरी दृष्टि उनसे हटती ही नहीं।

  6. तोसी न निहारी मैं - श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (58)

    हे प्यारीजू (श्री राधा)! मैं शपथपूर्वक कहता हूँ कि तुम्हारे समान रूप, गुण और चतुरता से युक्त कोई भी मैंने आज तक नहीं देखी। अपने ही प्राणप्रीतम से इस प्रकार मान करना—यह अद्भुत कला तुमने कहाँ से सीखी है?

  7. नंदनंदन हिंडोरे झूलें माई री - श्री चतुर्भुज दास

    नंदलाल श्रीकृष्ण झूला झूल रहे हैं, और संग में वृषभानु-दुलारी श्रीराधा अपनी अनुपम छवि से मोहक शोभा बिखेर रही हैं। वन में चारों ओर रिमझिम वर्षा की बूँदें गिर रही हैं।

  8. श्रीराधावल्लभ तुम मेरे हित - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (288)

    हे श्रीराधावल्लभ! आप ही मेरे सच्चे हितैषी हैं। संसार के समस्त रिश्ते केवल तब तक ही साथ देते हैं जब तक उनका स्वयं का कोई स्वार्थ जुड़ा हो।

  9. ऐसौ और सनेही कौन - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (97)

    रसिक शिरोमणि श्रीलाल जी (श्री कृष्ण) के अतिरिक्त ऐसा और कौन रँगीला-प्रेमी है, जो चौदह लोकों के ऐश्वर्य-वैभव तथा स्वामित्त्व का त्याग करके केवल एक प्रेम के ही रंग में रँग गया हो।

  10. तेही छिनु बृषभनु-किसोरी - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (511)

    हे वृषभानु किशोरी श्री राधा! जिस क्षण आप नवल-वृंदावन की कुंज-वीथियों में गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण से मिलती हैं, उसी क्षण उनका चित्त और बुद्धि पूर्ण रूप से हरण कर लेती हैं।

  11. प्रान दियैं यह प्रेम न पैयै - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (98)

    हे सखि ! प्राणों का उत्सर्ग करने पर भी लाड़िली-लाल का यह सर्वोपरि प्रेम नहीं मिलता, ऐसा विलक्षण-मूल्यवान् अर्थात् महँगा है यह प्रेम, अतएव हे सखि ! तुम्हीं बताओ इसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है ?

  12. प्रिया मैं तो हूँ चेरिन की चेरी - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (125)

    हे प्रियाजी (श्री राधे), मैं तो आपकी दासियों की भी दासी हूँ । अब मुझ पर कृपा करें, हे लाड़िली, क्योंकि बहुत अधिक विलंब हो चुका है।

  13. बिहारिन दे वृन्दावन वास - श्री सरस माधुरी जी

    हे बिहारिनी श्री राधे! कृपा करके मुझे श्री वृंदावन धाम का अति दुर्लभ वास प्रदान करें। हे कुंवरि किशोरीजी, हे मेरी प्यारी स्वामिनीजू, हे आनंद की मूर्ति! कृपा कर मेरी विनम्र प्रार्थना को सुन लीजिए।

  14. प्यारी तेरो मानु मनावन आँई - श्री केवल राम जी, रास मान के पद (25)

    हे प्यारी जू, आपके मान को दूर कर मैं आपको मनाने आयी हूँ। रसिकराज श्रीकृष्ण बार-बार मेरे चरणों में गिर रहे हैं। उन्होंने प्रेम और करुणा से प्रेरित होकर मुझे आपके पास भेजा है।

  15. लागी रट, राधा श्रीराधा नाम - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (39)

    अब मैंने श्री राधा नाम की रटना लगा दी है। मैंने समस्त वृन्दावन में ढूंढने का प्रयत्न किया परंतु नंद के नटखट दुलारे श्री श्यामसुन्दर कहीं नहीं मिले।

  16. अरी तू काहे अनमनी - श्री हरिराय जी

    हे राधिका जू, तुम अचानक इतनी अनमनी क्यों हो गयी हो कि कृष्ण के पुकारने पर भी नहीं बोल रही हो ? अभी तक तो तुम हँस-खेल रही थी, बातें कर रही थी और मेरे पहुँचते ही तुम्हें क्या हो गया?

  17. मन बावरे तूँ हरि पद अटक्यौ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (132)

    अरे मन बाँवरे, तू अब जाके श्री हरि के चरणों में अटका है, इसी वजह से अब तू साँचा सुख प्राप्त कर रहा है । जब तू संसार में था तो इसी आनंद के लिए घर घर भटकता था और हर जगह केवल दुख ही दुख मिलता था ।