अनुराग रस
अनुराग रस श्री नारायण स्वामी, वृंदावन के रसिक संत, की प्रसिद्ध रचना है। उन्होंने विभिन्न दोहे लिखे हैं जो श्री युगल सरकार और श्री वृंदावन धाम को समर्पित हैं। यह रसिक भक्तों के लिए बहुत महत्वपूर्ण ग्रन्थ।
लेखक: श्री नारायण स्वामी
110 लेख उपलब्ध हैं
अजापुत्र मैं मैं कहत दिये आपने प्रान - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (100)
बकरी का बच्चा 'मैं-मैं' (अहंकार) की पुकार करते हुए अपने प्राण गंवा देता है, जबकि उससे कहीं भली मैना है जो प्रभु का नाम लेकर आनंद से मलीदा खाती है। भाव यह है कि 'मैं-मैं' अर्थात् अहंकार जीव का विनाश कर देता है, जबकि प्रभु का नाम सुमिरन करने से ही सच्चा सुख प्राप्त होता है।
नारायण नवखण्ड में निरभय जिनको - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (20)
श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि इस सम्पूर्ण पृथ्वी के नौ खण्डों में जिनका सर्वथा भयरहित होकर शासन था, ऐसे जगत्प्रसिद्ध महान राजाओं को भी अंततः बलवान काल ने अपना ग्रास बना लिया।
नारायण निज हिये में अपने - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (54)
श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि हे जीव! सबसे पहले तू अपने हृदय के भीतर झाँककर स्वयं के दोषों और दुर्गुणों का विचार कर और उनका भली-भांति निवारण कर। उसके बाद यदि फुर्सत मिले, तो भले ही तू दूसरों के अवगुणों को देखते रहना। (अर्थात् जब जीव स्वयं के दोष सुधारने लगेगा, तो उसे दूसरों में बुराई देखने का न तो समय मिलेगा और न ही अधिकार बचेगा)
हम न भये व्रज में प्रगट - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (07)
यद्यपि व्रजभूमि की पावन रज में जन्म लेने का सौभाग्य मुझे प्राप्त न हो सका, तथापि अब मेरे हृदय की एकमात्र अभिलाषा यही है कि श्रीधाम वृन्दावन का मैं अखंड वास करूँ तथा नित्य-प्रति श्री राधा-कृष्ण की मनोहर युगल छवि का दर्शन एवं चिंतन करते हुए अपना जीवन कृतार्थ करूँ।
नारायण दुख सुख उभै - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (101)
सुख और दुख जीवन में दिन और रात के चक्र की भाँति बिना बुलाए आते-जाते रहते हैं। इसलिए विवेकी मनुष्य को इन दोनों ही परिस्थितियों में समभाव बनाए रखना चाहिए और विचलित हुए बिना धैर्यपूर्वक अपने मार्ग पर आगे बढ़ते रहना चाहिए।
मन लाग्यो सुख भोग में तरन चहै संसार - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (51)
श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि यदि मन भोग-विलास के सुखों में ही लगा हुआ है, दिन-रात उसी से आसक्ति बनी हुई है और पुन: संसार-सागर से तरना भी चाहे, तो ऐसा कैसे संभव हो सकता है?
प्रेम खेल सबसों कठिन खेलत कोउ सुजान - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (151)
प्रेम का खेल सबसे कठिन है, जिसे कोई सच्चा सुजान ही खेल सकता है। श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि जिसने स्वयं भगवद् प्रेम-मार्ग का अनुभव ही नहीं किया, वह प्रेम की सच्ची महिमा, उसकी पहचान एवं उसका स्वरूप कभी समझ ही नहीं सकता।
गुण गावै गोपाल के भरि लावै दृग नीर - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (171)
गोपाल के गुणों का कीर्तन करते-करते आँखें आँसुओं से भर जानी चाहिए — यही सच्ची भक्ति की पहचान है। श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि जब तक बलराम के भैया श्रीकृष्ण के दर्शन नहीं हो जाते, तब तक उनका हृदय एक क्षण के लिए भी शांत नहीं होगा।
रक्षा करी न जीव की दियो न आदर दान - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (137)
दिव्य प्रेम रूपी परम धाम की ओर ले जाने वाला यह संकीर्ण पथ अत्यंत कठिन है। इसमें चलने वालों को विश्राम केवल विकलता, मूर्छा या रुदन-सिसकियों के क्षणों में ही प्राप्त होता है।
रक्षा करी न जीव की दियो न आदर दान - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (78)
यदि किसी जीव की न तो रक्षा की और न ही उसे आदर-सत्कार दिया, तो ऐसे पुरुष से श्रेष्ठ तो वह वृक्ष है, जो जीवों को निष्काम भाव से छाया और फल प्रदान करता है।
गुण मन्दिर सुंदर युगल मंगल मोदनिधान - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (184)
युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) समस्त गुणों के मंदिर हैं और मंगल तथा आनंद के मूल स्रोत हैं। श्री नारायण स्वामी प्रार्थना करते हैं, "हे परम कृपालु युगल वर! कृपा कर मुझे अपने चरण कमलों में प्रेम रूपी अमूल्य वरदान प्रदान करें।"
नारायण जब अंत में, यम पकड़ेंगे बाँह - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (49)
नारायण स्वामी जी ऐसे जीवों को सावधान करते हुए कहते हैं, “जो अपने सांसारिक कार्यों को भजन से अधिक महत्ता देते हैं, उन्हें समझना चाहिए कि जब तुम्हारा अंतिम समय आएगा और यमराज तुम्हारी बाँह पकड़ेंगे, तब उनसे भी यही कहना कि ‘अभी मुझे फ़ुरसत नहीं है।’ तब देखना, क्या वे तेरी यह बात सुनेंगे?”
जिनको मन हरिपद कमल - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (97)
जिनका मन श्री हरि के चरण कमलों में भ्रमर के समान, नित्य प्रति चिपका रहता है, उनका संग करने से जीव को कभी भी हानि नहीं होती।
नन्दलाल दशरथ सुवन - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (151, 152)
नंदलाल श्री कृष्ण एवं दशरथ सुवन श्री राम दोनों एक ही हैं । जो इनको दो कहते हैं वे जीव अज्ञानी हैं । दोनों का एक सा रंग, रूप, तिल एवं चिन्ह आदि हैं अंतर बस यह है कि श्री राम के नेत्र थोड़े गंभीर हैं और श्री कृष्ण के विशेष रूप से चंचल हैं ।
नारायण या प्रेम को, नद उमड़त जो ठौर - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (146)
जिस हृदय में प्रेम रूपी नदी उमड़ पड़ती है, वहाँ एक ही पल में लज्जा एवं मर्यादा रूपी सीमाओं को तोड़ कर आगे निकल जाती है।
तनक मान मन में नहीं सब सों राखत प्यार - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (87)
जिसके ह्रदय में तनिक भी मान की चाह न हो, और सब से प्रेम रखे, ऐसे संतों पर मैं बार बार बलिहार जाता हूँ ।
नारायण हरि प्रीति में, जाको तन मन चूर - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (170)
जिसके ह्रदय में श्री हरि की सच्ची प्रीति होती है उसका तन मन श्री हरि में ऐसा रमा होता है कि उसकी अन्य किसी से ममता नहीं होती चाहे कोई उसके निकट रहे या दूर, उससे उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता ।
है न्यारो सब पंथ ते प्रेम पंथ अभिराम - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (156)
संसार के समस्त मार्गों और मत-मतांतरों से प्रेम का यह मार्ग अत्यंत विलक्षण और सुखद है। इस अनुराग के पथ पर अग्रसर होने वाला साधक अति शीघ्र ही अपने प्रियतम के परम धाम को प्राप्त कर लेता है।
तौलौं यह फांसी गरे - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (143)
जब तक हृदय में सच्चा प्रेम प्रकट नहीं होता, तब तक वर्णाश्रम धर्म, व्रत और नियमों का बंधन गले की फाँसी के समान बना रहता है। प्रेम के उदय होते ही ये बाह्य बंधन स्वतः शिथिल हो जाते हैं।
नारायण या डगर में, कोउ चलत है बीर - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (138)
प्रभु के प्रेम-पथ पर चलने वाला कोई विरला साहसी ही होता है, क्योंकि इस मार्ग में प्रत्येक कदम पर मानो बरछी चुभती है और प्रत्येक श्वास में तीर सा वेधन अनुभव होता है।