‘नारायण’ नवखण्ड में निरभय जिनको - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (20)
श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि इस सम्पूर्ण पृथ्वी के नौ खण्डों में जिनका सर्वथा भयरहित होकर शासन था, ऐसे जगत्प्रसिद्ध महान राजाओं को भी अंततः बलवान काल ने अपना ग्रास बना लिया।
अनुराग रस श्री नारायण स्वामी, वृंदावन के रसिक संत, की प्रसिद्ध रचना है। उन्होंने विभिन्न दोहे लिखे हैं जो श्री युगल सरकार और श्री वृंदावन धाम को समर्पित हैं। यह रसिक भक्तों के लिए बहुत महत्वपूर्ण ग्रन्थ। लेखक: श्री नारायण स्वामी
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श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि इस सम्पूर्ण पृथ्वी के नौ खण्डों में जिनका सर्वथा भयरहित होकर शासन था, ऐसे जगत्प्रसिद्ध महान राजाओं को भी अंततः बलवान काल ने अपना ग्रास बना लिया।
श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि हे जीव! सबसे पहले तू अपने हृदय के भीतर झाँककर स्वयं के दोषों और दुर्गुणों का विचार कर और उनका भली-भांति निवारण कर। उसके बाद यदि फुर्सत मिले, तो भले ही तू दूसरों के अवगुणों को देखते रहना। (अर्थात् जब जीव स्वयं के दोष सुधारने लगेगा, तो उसे दूसरों में बुराई देखने का न तो समय मिलेगा और न ही अधिकार बचेगा)
यद्यपि व्रजभूमि की पावन रज में जन्म लेने का सौभाग्य मुझे प्राप्त न हो सका, तथापि अब मेरे हृदय की एकमात्र अभिलाषा यही है कि श्रीधाम वृन्दावन का मैं अखंड वास करूँ तथा नित्य-प्रति श्री राधा-कृष्ण की मनोहर युगल छवि का दर्शन एवं चिंतन करते हुए अपना जीवन कृतार्थ करूँ।
सुख और दुख जीवन में दिन और रात के चक्र की भाँति बिना बुलाए आते-जाते रहते हैं। इसलिए विवेकी मनुष्य को इन दोनों ही परिस्थितियों में समभाव बनाए रखना चाहिए और विचलित हुए बिना धैर्यपूर्वक अपने मार्ग पर आगे बढ़ते रहना चाहिए।
श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि यदि मन भोग-विलास के सुखों में ही लगा हुआ है, दिन-रात उसी से आसक्ति बनी हुई है और पुन: संसार-सागर से तरना भी चाहे, तो ऐसा कैसे संभव हो सकता है?
प्रेम का खेल सबसे कठिन है, जिसे कोई सच्चा सुजान ही खेल सकता है। श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि जिसने स्वयं भगवद् प्रेम-मार्ग का अनुभव ही नहीं किया, वह प्रेम की सच्ची महिमा, उसकी पहचान एवं उसका स्वरूप कभी समझ ही नहीं सकता।
गोपाल के गुणों का कीर्तन करते-करते आँखें आँसुओं से भर जानी चाहिए — यही सच्ची भक्ति की पहचान है। श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि जब तक बलराम के भैया श्रीकृष्ण के दर्शन नहीं हो जाते, तब तक उनका हृदय एक क्षण के लिए भी शांत नहीं होगा।
दिव्य प्रेम रूपी परम धाम की ओर ले जाने वाला यह संकीर्ण पथ अत्यंत कठिन है। इसमें चलने वालों को विश्राम केवल विकलता, मूर्छा या रुदन-सिसकियों के क्षणों में ही प्राप्त होता है।
यदि किसी जीव की न तो रक्षा की और न ही उसे आदर-सत्कार दिया, तो ऐसे पुरुष से श्रेष्ठ तो वह वृक्ष है, जो जीवों को निष्काम भाव से छाया और फल प्रदान करता है।
युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) समस्त गुणों के मंदिर हैं और मंगल तथा आनंद के मूल स्रोत हैं। श्री नारायण स्वामी प्रार्थना करते हैं, "हे परम कृपालु युगल वर! कृपा कर मुझे अपने चरण कमलों में प्रेम रूपी अमूल्य वरदान प्रदान करें।"
नारायण स्वामी जी ऐसे जीवों को सावधान करते हुए कहते हैं, “जो अपने सांसारिक कार्यों को भजन से अधिक महत्ता देते हैं, उन्हें समझना चाहिए कि जब तुम्हारा अंतिम समय आएगा और यमराज तुम्हारी बाँह पकड़ेंगे, तब उनसे भी यही कहना कि ‘अभी मुझे फ़ुरसत नहीं है।’ तब देखना, क्या वे तेरी यह बात सुनेंगे?”
जिनका मन श्री हरि के चरण कमलों में भ्रमर के समान, नित्य प्रति चिपका रहता है, उनका संग करने से जीव को कभी भी हानि नहीं होती।
नंदलाल श्री कृष्ण एवं दशरथ सुवन श्री राम दोनों एक ही हैं । जो इनको दो कहते हैं वे जीव अज्ञानी हैं । दोनों का एक सा रंग, रूप, तिल एवं चिन्ह आदि हैं अंतर बस यह है कि श्री राम के नेत्र थोड़े गंभीर हैं और श्री कृष्ण के विशेष रूप से चंचल हैं ।
जिस हृदय में प्रेम रूपी नदी उमड़ पड़ती है, वहाँ एक ही पल में लज्जा एवं मर्यादा रूपी सीमाओं को तोड़ कर आगे निकल जाती है।
जिसके ह्रदय में तनिक भी मान की चाह न हो, और सब से प्रेम रखे, ऐसे संतों पर मैं बार बार बलिहार जाता हूँ ।
जिसके ह्रदय में श्री हरि की सच्ची प्रीति होती है उसका तन मन श्री हरि में ऐसा रमा होता है कि उसकी अन्य किसी से ममता नहीं होती चाहे कोई उसके निकट रहे या दूर, उससे उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता ।
संसार के समस्त मार्गों और मत-मतांतरों से प्रेम का यह मार्ग अत्यंत विलक्षण और सुखद है। इस अनुराग के पथ पर अग्रसर होने वाला साधक अति शीघ्र ही अपने प्रियतम के परम धाम को प्राप्त कर लेता है।
जब तक हृदय में सच्चा प्रेम प्रकट नहीं होता, तब तक वर्णाश्रम धर्म, व्रत और नियमों का बंधन गले की फाँसी के समान बना रहता है। प्रेम के उदय होते ही ये बाह्य बंधन स्वतः शिथिल हो जाते हैं।
प्रभु के प्रेम-पथ पर चलने वाला कोई विरला साहसी ही होता है, क्योंकि इस मार्ग में प्रत्येक कदम पर मानो बरछी चुभती है और प्रत्येक श्वास में तीर सा वेधन अनुभव होता है।
जिस साधक के हृदय में श्री श्यामा-श्याम के प्रेम की सशक्त चपेट लग जाती है, उसके भीतर वेद और श्रुति द्वारा निर्दिष्ट सभी विधि-निषेध की सीमाएँ स्वतः विलीन हो जाती हैं।