अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध]

अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध], श्री भागवत रसिक देव जू की वाणी का प्रथम अध्याय है । रचयिता : श्री भागवत रसिक देव जी

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  1. ग्राम-सिंह भूंस्यौ बिपिन - श्री भगवत रसिक जी की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (26)

    एक गाँव के पास एक जंगल था, जहाँ एक दिन एक कुत्ता जंगल में घुस गया और शेर को देखकर भौंकने लगा। उसकी देखा-देखी गाँव के अन्य बेवकूफ कुत्ते भी बिना कारण भौंकने लगे। भगवत् रसिक समझाते हैं कि लोग भी ऐसे ही, महापुरुषों की बातों को बिना अनुभव के दोहराते रहते हैं, लेकिन उनके गूढ़ रहस्य से दूर ही रहते हैं।

  2. सुनी सुनी सब कोउ कहै देखी कहै ने कोइ - श्री भगवत रसिक जी की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (27)

    संसार में अधिकांश लोग वेदों, शास्त्रों एवं अनुभवी महापुरुषों की बातों को बिना स्वयं अनुभव किए ही दोहराते रहते हैं। ऐसे व्यक्तियों की बातें प्रायः मिथ्या होती हैं। श्री भगवतरसिकजी कहते हैं कि हम तो उस व्यक्ति के चरण धोकर पीने को भी तत्पर हैं जो पहले परमार्थ का स्वयं अनुभव करे और फिर कुछ कहे।

  3. जगत में पैसन ही की माँड - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रन्थ (पूर्वार्ध) (3)

    इस संसार में धन-दौलत का ही एक मात्र महत्त्व और प्रभुत्व है। धन न रहने पर शिष्य गुरु को छोड़ देता है और स्त्री पति का परित्याग कर देती है।

  4. भगवत जन स्वाधीन नहिं - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (23)

    भले ही मनुष्य को लगे कि वह स्वतंत्र है परंतु वह कभी भी स्वतंत्र नहीं है, वह हर स्थिति में भगवान के सदा आधीन ही रहता है । जिस प्रकार डोर का विस्तार करने से पतंग आकाश में तो स्वतंत्र उड़ती दिखती है, परंतु उड़ाने वाले के समेटते ही, हाथ में आ जाती है । (इसका एक यह भी भाव है कि जैसे जैसे जीव अपने गुणों का बखान करता है वह श्री हरि से दूर होता रहता है, और जैसे ही वह अहंकार शून्य हो जाता है वह श्री हरि के एक दम पास पहुँच जाता है ) ।

  5. मैं बोले मारी गई, देखौ अजया आँत - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (22)

    भगवत रसिक जी कहते हैं कि बकरी के “मैं-मैं” करने का परिणाम तो देखिए, वह “मैं-मैं” बोलने के कारण मारी गई। फिर उसी बकरी की अँतड़ी जब ताँत के रूप में धुनकी में लगकर कुटने लगी, तब वही “तें-तें” (तुहि तुहि) बोलने लगी।

  6. वेषधारी हरि के उर सालै - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रन्थ (पूर्वार्ध) (4)

    श्रीहरि के भक्तों का वेश बनाकर भी जो व्यक्ति (खेल तमाशा दिखाने वाले) नट की तरह लोभ, पाखण्ड और कपट के सहारे इंद्रिय सुखों की प्राप्ति और उदर पूर्ति में लगे रहते हैं, वे हमारे हृदय को (अथवा श्रीहरि के हृदय को ) बहुत चोट पहुँचाते हैं ।

  7. कागा कोयल, हंस बग, गुबरीला मदपान - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (21)

    कौवा और कोयल, हंस और बगुला तथा गुबरीला और भ्रमर—इन युग्मों में दोनों का रंग एक-दूसरे के समान होता है; अर्थात् कौवे का कोयल से, हंस का बगुले से और गुबरीले का भ्रमर से रंग मिलता-जुलता होता है। किंतु इनकी पहचान कार्य की भिन्नता से होती है, न कि रंग से। इसी प्रकार साधु की पहचान उसके वेश-विन्यास या तिलक से नहीं, अपितु उसके आचरण, कार्य और भक्ति से होती है।

  8. प्रथम महातम प्रकृति - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (45)

    आनंद के सात परिवेश है। उनमें श्रीप्रिया प्रियतम की केलि चरम परिवेश में है। वही सातवाँ परिवेश रसिकराय श्रीस्वामीहरिदासी का मंगल भवन है, इस बात को स्पष्ट करते हुए भगवतरसिकजी कहते हैं:

  9. बलि जैहौं श्रीरसिकचारज - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - पूर्वार्द्ध (32)

    भावार्थ - भगवतरसिकजी कहते हैं - रसिकाचार्य स्वामी श्री हरिदासजी! मैं आपकी बलिहारी जाता हूँ जिन्होंने अपने हृदय सिन्धु का मन्थन करके यह नित्य विहार रूपी अद्भुत रत्न प्रकट किया है।

  10. जीभ जुगल नामहिं जपै - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (16)

    साधक को चाहिए कि वह कुत्ते और मृगराज-सिंह की वृत्ति को त्यागकर मधुकरी वृत्ति से उदर-पूर्ति करता हुआ, जीभ से श्री युगल का नाम-स्मरण और नेत्रों से उनके रूप-माधुरी का अवलोकन करता रहे।

  11. जो कछु करौ सो समुझि कै - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (25)

    तुम जो कुछ भी कर रहे हो, उसे खूब सोच-समझकर करो। भगवतरसिक जी कहते हैं कि जिन लोगों ने बिना सोचे-समझे कर्म किया है, वे सब घने अंधकार में विलीन हो चुके हैं।

  12. प्रथम महात्म प्रकृति ज्ञान रवि तहाँ प्रकासे - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - पूर्वार्द्ध (45)

    आनंद का प्रथम परिवेश वह है जहाँ गहन अंधकारमयी प्रकृति में ज्ञान का सूर्य प्रकाशित होता है। दूसरा परिवेश है ब्रह्म ज्ञान के प्रकाश का, जो करोडो सूर्यों के सदृश जगमगाता रहता है। तीसरा परिवेश वह वैकुण्ठ धाम है, जहाँ भगवान् विष्णु और लक्ष्मीजी निवास करते हैं।

  13. नमो नमो श्री बृंदावनचंद - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - पूर्वार्द्ध (34)

    अद्भुत सौंदर्य की छटा बिखेरने वाले श्री धाम वृंदावन को हमारा बारंबार प्रणाम है | यह (वृंदावन) नित्य अनादि और अनंत है | यहां श्री प्रिया प्रियतम एकरस स्वच्छंद विहार करते रहते हैं |

  14. भगवत जन चकरी कियो - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (24)

    भगवत्-रसिक जी कहते हैं कि श्री लाड़िलीजी अपने भक्त को चकरी—अपने कर-कौशल का खिलौना—बना लेती हैं और उसे अपने प्रेम की डोर में लपेटकर रखती हैं। वे दिन-रात उसी से क्रीड़ा करती रहती हैं और उसे कभी भी त्यागती नहीं हैं।

  15. जै जै रसिक रवनी रवन - श्री भगवत रसिक - भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - पूर्वार्द्ध (35)

    हे रसिक शिरोमणि श्रीकिशोरी - किशोरजी, आपकी जय हो, जय हो ! आप रूप, गुण, लावण्य प्रभुता और प्रेम की पूर्णता की धाम हैं ।

  16. जै जै रसिक रवनी रवन। रूप गुन लवन्य प्रभुता प्रेम पूरन भवन - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वानी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (35)

    हे रसिक शिरोमणि प्यारी जू , श्री किशोरीजी, आपकी जय हो जय हो! आप रूप, गुण, लावण्य प्रभुता और प्रेम की पूर्णता की धाम हो। आपके अतिरिक्त रसिक भक्त की विपत्ति को मिटाने वाला दूसरा कौन है?

  17. दुख सुख भुगतै देह, नहिं कछु संक है - श्री भगवत रसिक - भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - पूर्वार्द्ध (47)

    भगवत रसिक जी कहते है कि मेरा शरीर सुख भोगता रहे अथवा दुःख, संसार मेरी निंदा करता रहे या स्तुति, मैं धन सम्पन्न हो जाऊँ अथवा कंगाल, परमार्थ या लोक व्यवहार मुझसे बने या न बने इन सब बातों की मुझे कोई परवाह नहीं। मेरी यही प्रार्थना है कि आप दोनों मेरी आँखों में अंजन बनकर लगे रहें, अर्थात वह रस दृष्टि मिली रहे, जिससे प्रिया प्रियतम के नित्य विहार का अवलोकन बना रहे ।।

  18. भगवत रसिक संग जो चाहै, प्रथमहै लोभै त्यागै - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (05)

    श्री भगवतरसिकजी कहते हैं कि जो साधक परम रसिक श्रीयुगल की नित्य संगति के अभिलाशी हैं, उन्हें सर्वप्रथम लोभ का परित्याग कर देना चाहिये, फिर शरीर, घर, पुत्र, धन, दौलत, स्त्री आदि के प्रति अनासक्त होकर हरी से प्रेम करना चाहिए |

  19. जावक जुत जुग चरण लली के - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - पूर्वार्द्ध (33)

    श्री किशोरी जी के महाबर से युक्त दोनों चरणारविंद अद्भुत निर्मल एवं अनुपम हैं। ये प्रियतम की हृदय रूपी कमल कलिका को विकसित करने वाले सूर्य है। सुन्दर, कोमल मनोहर और आनंद के पारावार ये (चरणारविन्द) निकुंज गली के सुभग श्रृंगार है। भगवत रसिक जी कहते हैं कि (मनोकामनाओं को पूरा करने वाले होने के कारण) मेरे जैसी अनन्य सखी के लिए तो ये ही कल्पवृक्ष है, ये ही कामधेनु हैं और ये ही चिंतामणि हैं। मेरी तो ये ही सब कुछ है।

  20. भगवत रसिक सहायक सब दिन - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (38)

    भगवत रसिक जी कहते हैं कि जो रसिकों (प्रियतम एवं सहचरियों) की सदा सहायता करने वाली हैं और उनको निरंतर सर्वोपरि सुख देती हैं वो एक मात्रा किशोरीजी ही हैं।