श्री भगवत रसिक

श्री भगवत रसिक श्री ललित मोहिनी देव जी के शिष्य, वृंदावन के रसिक संत थे। उनकी रचनाओं को आज भी रसोपासना के भक्तों द्वारा गायन एवं चिंतन किया जाता है।

162 लेख उपलब्ध हैं

  1. नवल दोउ आजु बसंत-से फूले - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (11.3)

    आज दोनों नित्य किशोर (श्री राधा-कृष्ण) वसंत ऋतु के समान खिले हुए हैं। गोरी किशोरी जी द्वारा श्यामसुन्दर के कंधे (अंस) पर अपनी भुजा डाल दिये जाने से, श्यामसुंदर उनकी भुज-मूल (बाँहों के आश्रय) में छिपे हुए से सुशोभित हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो श्याम घटा छिप गई हो और गोरे वर्ण की वासन्ती सुषमा छा गई हो।

  2. रूप-सरोवर लाडिली फूले सहज सरोज - श्री भागवत रसिक जी की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 1 (12)

    हमारी लाडिलीजी (श्री राधा) साक्षात् रूप-सौंदर्य का अथाह सरोवर हैं, जिसमें उनके विभिन्न अंग — दो हस्तकमल, दो चरण कमल, एक नाभि कमल, दो नयन कमल, एक मुख कमल और उन्नत उरोज कमल — ये दस कमल, सदा सहज खिले रहते हैं।

  3. नव कुंज-सदन मैं आज रँगीली होरी - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (12.2)

    नव-निकुंज-महल में आज रंगों से सराबोर होली की अद्भुत छटा छाई हुई है। एक ओर श्रीकिशोरीजी हैं और दूसरी ओर श्रीश्यामसुन्दर दृढ़ता से उपस्थित हैं। दोनों अनन्त उमंगों और हर्षोल्लास के साथ परस्पर होली-लीला में उन्मत्त हैं।

  4. दोऊ कानन लगि कहैं चुंबन देहिं अँकोर - श्री भागवत रसिक जी की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 1 (16)

    (नित्यविहार-रत श्यामाश्याम की परिचर्या में अवस्थित श्रीभगवतअलि जी कहती हैं कि नित्यविहार की स्थिति में अधीर हुए) प्रिया-प्रियतम मेरे कानों से लग-लगकर और अँकोर के रूप में चुंबन का प्रसाद दे-देकर कह रहे हैं कि "हे प्यारी सखी, मैं तुझ पर बलिहारी हूँ। तू जैसे भी हो, इस बार तो मुझे जिता ही दे !"

  5. माया कौं सब जग भजै - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (28)

    समस्त संसार वास्तव में माया की ही भक्ति करता है — धन, स्त्री, गृह, आश्रम आदि में आसक्ति ही सबका साधन बन गई है। किंतु मायापति श्रीकृष्ण का अनन्य भजन तो कोई विरला ही करता है। और जो वास्तव में श्रीकृष्ण का अनन्य भजन करता है — उसके लिए माया स्वयं आज्ञाकारिणी दासी बन जाती है।

  6. ग्राम-सिंह भूंस्यौ बिपिन - श्री भगवत रसिक जी की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (26)

    एक गाँव के पास एक जंगल था, जहाँ एक दिन एक कुत्ता जंगल में घुस गया और शेर को देखकर भौंकने लगा। उसकी देखा-देखी गाँव के अन्य बेवकूफ कुत्ते भी बिना कारण भौंकने लगे। भगवत् रसिक समझाते हैं कि लोग भी ऐसे ही, महापुरुषों की बातों को बिना अनुभव के दोहराते रहते हैं, लेकिन उनके गूढ़ रहस्य से दूर ही रहते हैं।

  7. परमेस्वर परतीति नहिं - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (22)

    जिन व्यक्तियों का भगवान् पर विश्वास नहीं है और जिनका भरोसा केवल धन-दौलत पर टिका है — वे चाहे गृहस्थ हों या गृहत्यागी, विरक्त कहलाते हों या संसार से विमुख दिखाई देते हों — वास्तव में वे सभी संसार-सागर में ही डूबे हुए हैं।

  8. पाँयन परि बिनती करै - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (1.8)

    लालजी (श्रीकृष्ण) जब श्री प्रियाजी (श्रीराधा) के चरणों में पड़कर दैन्यपूर्वक विनय करते हैं, तो वही श्रृंगार रस का मुख्य स्वरूप है। प्रियतम की विनय-वाणी से द्रवीभूत होकर, मान का त्याग कर श्री किशोरीजी जब प्यारे के प्रति मृदु वचन बोलती हैं, तो वही करुण रस की सर्वोच्च अभिव्यक्ति मानी जाती है।

  9. बहु बिधि मर्दन करें - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (11.6.3)

    भगवतरसिक जी कहते हैं कि भले ही कोई कितनी ही दवाओं से और कितने ही प्रकार से मुर्दे की मालिश क्यों न करे, वह कभी जिन्दा नहीं हो सकता । इसी प्रकार रस का अनुभव न रखने वाले नीरस व्यक्ति को कितना ही समझाइये, कितना ही पढ़ाइये, वह रस की बात को समझ ही नहीं सकता।

  10. नाचत दोउ रहस में रँग-भीनैं - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (11.1)

    अनंग-रंग में सराबोर श्रीयुगलकिशोर एकान्त में नाच रहे हैं | काम-केलि की नयी-नयी कलाओं में लगे हुए मन वाले उन दोनों के अंग-अंग से अनगिनत हाव-भाव उत्पन्न हो रहे हैं।

  11. निसबासर तिथि मास रितु - श्री भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (6)

    उत्सव त्यौहारों से संबंधित समस्त सांसारिक व्यवहारों को त्यागकर नित्य निकुंज मंदिर के दिन रात, तिथि मास ऋतु और समस्त उत्सवों को भाव में ही देखना चाहिए ।

  12. नहिं हिंदू नहिं तुरक हम - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (5.7)

    मैं न हिंदू हूँ, न तुर्क (मुसलमान), न जैनी और न ही अंग्रेज। मैं तो प्रेम में उन्मत्त होकर (सहचरी स्वरूप से) नित्य श्री प्रिया प्रियतम की सुमन सेज संवारता रहता हूँ।

  13. रजधानी वृन्दाबिपिन, वय किसोर जुगराज - श्री भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (6)

    नित्य धाम श्री वृंदावन ही रसिकों एवं युगल किशोर (प्रिया प्रियतम) की राजधानी है, जहां लालितादिक सहचरियाँ रस विलास के नित्य नये साज सजाया करती हैं।

  14. नाहीं द्वैताद्वैत हरि - श्री भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (6)

    श्री कृष्ण न तो द्वैताद्वैत सिद्धांत में बंधे हैं न विशिष्टाद्वैत में, वे तो परम स्वतंत्र हैं, अपनी इच्छा अनुसार ही कार्य करते हैं।

  15. सुनी सुनी सब कोउ कहै देखी कहै ने कोइ - श्री भगवत रसिक जी की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (27)

    संसार में अधिकांश लोग वेदों, शास्त्रों एवं अनुभवी महापुरुषों की बातों को बिना स्वयं अनुभव किए ही दोहराते रहते हैं। ऐसे व्यक्तियों की बातें प्रायः मिथ्या होती हैं। श्री भगवतरसिकजी कहते हैं कि हम तो उस व्यक्ति के चरण धोकर पीने को भी तत्पर हैं जो पहले परमार्थ का स्वयं अनुभव करे और फिर कुछ कहे।

  16. जगत में पैसन ही की माँड - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रन्थ (पूर्वार्ध) (3)

    इस संसार में धन-दौलत का ही एक मात्र महत्त्व और प्रभुत्व है। धन न रहने पर शिष्य गुरु को छोड़ देता है और स्त्री पति का परित्याग कर देती है।

  17. नैना घूमत हैं मद छाके - श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (6.1)

    (श्रीयुगल की सुरतान्त छवि का अंकन है।) प्रिया-प्रियतम जमुहाई लेते हुए जाग रहे हैं। उनके मद-भरे नयन चंचल हो रहे हैं। वस्त्र-अलंकार अस्त-व्यस्त हैं।

  18. भगवत रसिक अनन्य - श्री भगवत रसिक जी की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (26)

    श्री भगवत रसिक जी कहते हैं कि रसिक भक्त अपने इष्टदेव के प्रति अनन्य होता है, इसी कारण वह अद्भुत रस का आस्वादन करता है। श्यामाश्याम के नित्यबिहार रस में खोए हुए उस रसिक को काल भी नहीं काट सकता।