भक्त सर्वस्व [भारतेंदु ग्रंथावली]

भक्त सर्वस्व भारतेंदु ग्रंथावली का प्रथम अध्याय है, जिसकी रचना श्री भारतेंदु हरिशचंद्र ने की है। इस अध्याय में श्री राधा कृष्ण के चरण चिन्हों का वर्णन किया गया है जो भक्तों का सर्वस्व है।

22 लेख उपलब्ध हैं

  1. जद्यपि हम सब भाँति ही - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (16)

    हे श्री कृष्ण! यद्यपि हम सर्वथा कपटी, निष्ठुर और मन्दबुद्धि हैं, तथापि आप हमारे दोषों पर ध्यान न देकर अपने परम कृपालु स्वभाव की ओर ही दृष्टि डालिये। आपकी अहैतुकी कृपा से ही हम जैसे अधम जीवों का उद्धार संभव है।

  2. वेद भेद पायो नहीं - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (8)

    वेदों को भी भगवान का रहस्य नहीं मिल पाया और पुराण उन्हें खोजते-खोजते स्वयं पुराने (जीर्ण-शीर्ण) हो गए, फिर भी वे ईश्वर की थाह न पा सके। स्मृतियों ने भी उन्हें समझने के प्रयास में अपनी सुध-बुध खो दी, पर इन ग्रंथों मात्र से प्रभु की प्राप्ति न हुई। सार यह है कि ईश्वर की प्राप्ति केवल निष्काम प्रेम और शरणागति से ही संभव है।

  3. जौं हमरे दोसन लखौ तौ नहिं कछु अवलंब - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (20)

    हे प्रभु! यदि आप मेरे दोषों को ही निहारेंगे, तो फिर मेरे पास कोई भी अवलम्ब नहीं बचेगा। मेरी विनती है कि आप अपने उस स्वभाव की ओर दृष्टि करें, जो दीनों पर करुणा करने वाला है। केवल उसी कृपालु स्वभाव के कारण ही मेरे जैसे पापी का कल्याण संभव है।

  4. सुत तिय गृह धन राज्य हू - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (7)

    पुत्र, पत्नी, घर, धन एवं राज्य आदि में सच्चा सुख नहीं है। परम आनंद केवल श्रीकृष्ण के चरणों में ही प्राप्त होता है।

  5. भटकयौ बहु बिधि जग बिपिन - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (5)

    मैं इस संसार रूपी जंगल में अनेक प्रकार से भटकता रहा, परंतु कहीं भी विश्राम और शांति नहीं मिली। जब से घनश्याम (श्री कृष्ण) के चरणकमलों की शरण प्राप्त हुई है, तभी से मुझे वास्तविक आनंद और शांति का सच्चा अनुभव हुआ है।

  6. अहो सहो नहिं जात अब - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (31)

    हे नंदनंदन (श्रीकृष्ण)! अब बहुत हुई, अब आपके दर्शन के बिना जीना असंभव है । श्री हरिचंद प्रार्थना कर रहे हैं कि हे परम करुणामय, अब मुझ पर कृपा कीजिए और अपने सेवक की रक्षा कीजिए।

  7. साधुन को सँग पाइ कै - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (30)

    संतों का संग पाकर श्री हरि का यशोगान करो। ऐसा जीवन जियो कि श्री हरि के प्रेम में भाव में उन्मत्त होकर नृत्य करने लगो।

  8. श्री जमुना-जल पान करू - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (23)

    मेरी यही अभिलाषा है कि मैं सदा वृंदावन का वास करूं और श्री यमुना जल का पान करता रहूं। मुख में महाप्रसाद रखूं और श्री वल्लभ नाम का उच्चारण करूं।

  9. लोक वेद कुल-धर्म बल - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (3)

    मैं लोक, वेद, कुल-धर्म के बल से विहीन हूँ एवं सब प्रकार से अति हीन हूँ । परंतु ब्रजराज श्री कृष्ण चन्द्र के चरणों के बल से मैंने परम ढिठाई (ढीठता) की है ।

  10. साधन छाँड़ि अनेक विधि - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (22)

    हे श्री राधा, मैं समस्त साधनों को छोड़कर आपके द्वार पर आकर पड़ा हूँ, मुझे अपना मानकर किसी भी उपाय से मुझे अपनी सेवा प्रदान कीजिए।

  11. अहो नाथ ब्रजनाथ जू कित त्यागौ निज दास - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (10)

    हे ब्रज नाथ, मेरे प्राणनाथ श्री कृष्ण! आपने अपने इस निज दास को क्यों त्याग दिया । कृपा कर जल्द ही मुझे अपने दर्शन से कृतार्थ करो क्योंकि तुम्हारे मिले बिना मेरा जीवन व्यर्थ है ।

  12. श्रीराधे वृषभानुजा तुम तौ दीन-दयाल - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (18)

    हे वृषभानु-नन्दिनी श्रीराधे! आप तो स्वभाव से ही करुणावत्सला और दीन-दयालु हैं; फिर किस कारण आपने मेरे प्रति ऐसी निष्ठुरता धारण कर ली है? अपनी इस दीन-दासी की दशा की ओर कृपा-दृष्टि तो डालिए।

  13. मोरौ मुख घर ओर सों तोरौ भव के जाल - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (9)

    अपने सांसारिक घर की वासनाओं से मुख मोड़कर, भव के जाल (सांसारिक झंझटों) को तोड़कर, समस्त साधनों को त्याग कर, एक नंदलाल श्री कृष्ण का निष्काम एवं निष्कपट भाव से भजन करो।

  14. निठुराई मत कीजिए - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (14)

    हे प्रभु, मुझ पर कृपा करने की बारी आई तो आप अब निष्ठुरता मत कीजिए, अन्यथा आपकी 'दया-समुद्र', 'कृपानिधान', 'करुणा की सीमा' आदि बड़ी-बड़ी उपाधियों पर प्रश्नचिह्न लग जाएगा।

  15. दोऊ हाथ उठाई कै कहत पुकारि-पुकारि - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (6)

    दोनों हाथ उठाकर मैं पुकार-पुकार कर कहता हूँ— यदि तुम अपना भला चाहते हो, तो मुरारी (श्रीकृष्ण) का भजन करो।

  16. मरौ ज्ञान वेदान्त को - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (29)

    वेदान्त का शुष्क ज्ञान भले ही समाप्त हो जाए और कर्मों का यह कठिन जाल जलकर भस्म हो जाए; मेरी तो बस यही एकमात्र अभिलाषा है कि नन्द के लाड़ले श्री कृष्ण मुझ पर अपनी एक करुणामयी दया-दृष्टि डाल दें।

  17. प्राननाथ व्रजनाथ जू - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (28)

    हे प्राणनाथ, हे ब्रजनाथ, हे नंदनंदन श्रीकृष्ण! मेरे हृदय की पीड़ा को हर लीजिए। मैं भवसागर में डूब रहा हूँ—दौड़कर मुझे अपनी करुणामयी भुजाओं में भरकर सदा के लिए अपना बना लीजिए।

  18. ब्रज-रज मैं लोटत रहौ - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (25)

    संसार के सभी जंजालों को छोड़कर ब्रज-रज में लोटते रहो। श्री राधा-गोपाल के चरणकमलों में दृढ़ विश्वास रखकर उनका भजन करो।

  19. तन पुलकित रोमांच करि - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (24)

    तन पुलकित हो कर रोमांचित हो उठे, आँखों से प्रेमाश्रुओं की धारा बहाते हुए, प्रेम में मग्न और मतवाले होकर बस निरंतर "राधा-राधा" नाम का गान करो।

  20. श्री वल्लभ वल्लभ कहौ - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (21)

    सांसारिक और आध्यात्मिक अन्य समस्त साधनों और आश्रयों का परित्याग कर, केवल श्री वल्लभ को ही अनन्य भाव से पुकारें। वे निश्चित ही आपको अपनी शरण में स्वीकार करेंगे। यह दृढ़ विश्वास रखें कि दीन-दुखियों के एकमात्र सच्चे सहायक केवल वही हैं।