दोहावली - ब्रज के दोहे

दोहावली विभिन्न भक्तों द्वारा रचित दोहों का संग्रह है ।

2185 लेख उपलब्ध हैं

  1. सरस-सुगन्ध-मन्द मलयानिल विहरत - श्री सूरदास, सूर सागर (4891)

    श्री वृन्दावन की सघन कुंजों में रसमयी, सुगंधित और मंद-शीतल मलय पवन बहती है। श्री धाम वृंदावन में जो अलौकिक प्रेम-क्रीड़ा होती है, वैसी विहार लीला तीनों लोकों में कहीं भी नहीं है।

  2. तुमसे हम को एक है - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (75)

    हे प्रभु! मेरे लिए तो आप ही एकमात्र शरण व सर्वस्व हैं, किंतु आपके लिए तो मेरे जैसे अनगिनत जीव व अनुरागी हैं। अतः हे प्राणप्रियतम! आप जैसा भी उचित समझें वैसा व्यवहार करें, बस ऐसी कृपा करें कि हमारे इस निष्काम प्रेम की प्रतिज्ञा का सदा निर्वाह होता रहे।

  3. जोग जज्ञ तप नाम बिनु - श्री गुरु छौनाजी महाराज

    श्री भगवन्नाम के बिना योग, यज्ञ, तपस्या आदि समस्त साधन निष्फल हो जाते हैं। श्री गुरु छौना जी कहते हैं कि जैसे सेमर के वृक्ष का यत्नपूर्वक पालन करने पर, फल पकने पर भी भीतर से केवल व्यर्थ रुई (कपास) ही निकलती है, कोई खाने योग्य फल नहीं मिलता, वैसे ही नाम-हीन साधन भी निष्फल सिद्ध होते हैं।

  4. अहो कुँवरि तुब रूप यह - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (5)

    हे किशोरी जी (श्रीराधा)! आपका यह अनुपम सौन्दर्य किसी भी मर्यादा का पालन नहीं करता। आपकी स्मृति मुझे अपनी सुध-बुध भुला देती है और मेरे हृदय के मर्मस्थल को प्रेम-बाणों से निरन्तर बींधती रहती है।

  5. टेरत राधा-नाम टरे न मुख - श्री ब्रजनिधि जी, ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (36)

    श्री राधा के वियोग में श्री कृष्ण 'राधा' नाम की निरंतर पुकार कर रहे हैं, एक क्षण को भी मुख से नहीं भुला रहे। समस्त विश्राम को त्याग कर अब तो केवल यही लालसा है कि कब प्रिया जी की उस बाँकी चितवन की रसमय झाँकी प्राप्त होगी।

  6. धन हित सटकौ अनत कौ - श्री हित दामोदर दास, नेम बत्तीसी (16)

    यदि धन-संपदा की तृष्णा के वशीभूत होकर मैं श्रीधाम वृन्दावन को पीठ दिखाकर किसी अन्य स्थल की ओर पलायन करूँ, तो मैं अपने ही नेत्र फोड़ लेने योग्य हूँ।।

  7. श्री विपुल बिहारनिदास को मैं पायो - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, साखी (17)

    श्री नागरीदास जी कहते हैं कि उन्हें श्री विट्ठलविपुल देव जी तथा श्री बिहारिन देव जी का पूर्ण सत्संग प्राप्त हुआ है। ऐसे अनन्य रसिकों के प्रभाव से श्री प्रिया-प्रियतम के प्रति जो अनन्य अनुराग प्रकट हुआ है, उससे उनका चित्त नित्य प्रफुल्लित और आनंदित रहता है।

  8. झूठ कुटुम संग्रहे तजे सत - श्री अग्रदास जी, अग्रग्रंथावली

    जीव मिथ्या सांसारिक संबंधों एवं वस्तुओं के संग्रह में निरंतर लगा रहता है, परंतु अपने एकमात्र सच्चे हितैषी श्री श्यामसुंदर के अकारण-निश्चल प्रेम का परित्याग किए रहता है। वह परमार्थ से विमुख होकर उसकी ओर पीठ कर लेता है तथा अपनी दृष्टि और समस्त पुरुषार्थ केवल नश्वर संसार में स्वार्थयुक्त लगाए रखता है।

  9. दीनबंधु तुम दीन हौं यह - ब्रज के दोहे

    हे भगवन्! आप दीनबंधु हैं और मैं दीन हूँ। आपका और मेरा यह बहुत सुंदर बना-बनाया नाता है, अतः मेरे इस संबंध पर आप अवश्य ही विचार कीजिए। हे कृपालु महाप्रभु! मेरी इस विशेष विनती को सुनकर मुझ पर अपनी कृपा कीजिए।

  10. नैन बैन मन श्रवण सब - श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, विरह मंजरी (16)

    विरहाकुल गोपी के नेत्र, वाणी, मन एवं कर्ण प्रियतम श्यामसुंदर के पास ही चली गई हैं। उनके शरीर-रूपी घट में केवल थोड़े-से प्राण ही इस आशा से शेष हैं कि प्रियतम पुनः लौटकर आएँगे।

  11. 'दया' नाव हरिनाम की सतगुरु - श्री दयाबाई

    दयाबाई कहती हैं कि हरिनाम भवसागर से पार उतारने वाली नौका है और सतगुरु उसके खेवनहार हैं। यदि वास्तविक संत का सच्चा संग प्राप्त हो जाए, तो इस संसार-सागर को पार करने में तनिक भी विलम्ब नहीं होता।

  12. पर्यो जगत भव-कूप में पर्यो - श्री अलबेली अलि

    मैं परम अज्ञानतावश संसार-रूपी गहरे भव-कूप में गिरा पड़ा था। परंतु मेरी परम कृपालु श्रीराधा जू ने अपनी करुणामयी भुजाओं से मुझे वहाँ से निकालकर, अपने निज धाम श्रीवृन्दावन की शीतल शरण में पहुँचा दिया।

  13. ‘नारायण’ निज हिये में अपने - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (54)

    श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि हे जीव! सबसे पहले तू अपने हृदय के भीतर झाँककर स्वयं के दोषों और दुर्गुणों का विचार कर और उनका भली-भांति निवारण कर। उसके बाद यदि फुर्सत मिले, तो भले ही तू दूसरों के अवगुणों को देखते रहना। (अर्थात् जब जीव स्वयं के दोष सुधारने लगेगा, तो उसे दूसरों में बुराई देखने का न तो समय मिलेगा और न ही अधिकार बचेगा)

  14. छिन-छिन हैं नव लाड़ली करिये - श्री हित गोपाल दास, निकुंज रस वल्लरी, आशीष दोहा

    क्षण-क्षण नित्य नवीन रहने वाली श्री लाड़ली जी और प्रियतम श्यामसुन्दर निरंतर दिव्य रास-क्रीड़ा का विलास करते रहें। आप दोनों का यह परम निर्मल और श्रेष्ठ प्रेम नित्य नवीन भाव से दिव्य रस और आनंद से सदैव परिपूर्ण बना रहे।

  15. बदन झलक अंग-अंग ललक अधरनि - श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (42)

    परम चतुर श्री श्यामा-श्याम के मुखारविंद की दिव्य आभा, उनके अंग-अंग की परस्पर मिलन के लिए व्याकुलता और अधरों की मंद मुस्कान ही उनके नित्य विहार का मुख्य आधार तथा प्राणों का एकमात्र आहार है।

  16. ‘रा’ अक्षर को सुनत ही - ब्रज के दोहे

    'रा' अक्षर को सुनते ही मेरा मन प्रेम-विह्वल होकर लालायित हो उठता है। नम्र सखी उस परम पावन "राधा" नाम पर अपना तन, मन, कर्म, वचन, प्राण तथा सर्वस्व न्यौछावर करती है।

  17. धन्य धन्य श्री गिरिराज जु - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (81)

    श्री गिरिराज जी धन्य हैं, धन्य हैं। वे भगवान श्रीहरि के समस्त भक्तों में श्रेष्ठ और अग्रणी हैं। वे निरन्तर श्रीकृष्ण के सान्निध्य में रहकर उनकी सेवा करते हैं, और इसीलिए वे बलभद्र और श्यामसुंदर के मन को अत्यंत प्रिय लगते हैं अथवा श्री गिरिराज जी मनमोहन के मन को मोहने का सामर्थ रखते हैं।

  18. राधेराधे नामकी जकलागै ये वीर - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (118)

    हे भाई! मेरे हृदय में निरंतर केवल 'राधे-राधे' नाम की ही लगन लगी रहे, और मैं श्रीधाम वृन्दावन की लताओं की शीतल छाया में बैठकर इस परम पावन नाम को उसी प्रकार रटता रहूँ, जैसे कोई तोता एक ही नाम निरंतर रटता है।

  19. हरि कृपा जो होय तो - श्री सहजो बाई

    यदि श्री हरि कृपा करें तो बहुत अच्छी बात है, और यदि वे न भी करें, तो भी कोई बात नहीं, परंतु यदि जीवन में गुरुदेव की कृपा एवं दया प्राप्त न हो, तो मनुष्य की बुद्धि सदा अंधकारमय ही बनी रहती है और वास्तविक विवेक कभी जागृत नहीं हो सकता।

  20. अतन होय वन पायबौ गायौ - श्री किशोरी अलि

    अनेक महापुरुषों का यह मत है कि व्रज में किसी वृक्ष, लता, तृण अथवा अन्य रूप में जन्म प्राप्त होना अथवा वास करना यह तो महान सौभाग्य की बात है ही, तथापि, रसिकों की दृढ़ मान्यता यह भी है कि उनकी इस भौतिक देह का विसर्जन भी इसी चिन्मय व्रज-रज के अंक में ही संपन्न होना चाहिए।