दोहावली - ब्रज के दोहे
दोहावली विभिन्न भक्तों द्वारा रचित दोहों का संग्रह है ।
2264 लेख उपलब्ध हैं
सोवत जागत फिरत में सुनियत - श्री अनन्य अली जी की वाणी, श्री वृंदावन वास अवस्था (2.67)
जहाँ सोते, जागते और चलते-फिरते हर समय ‘श्रीराधावल्लभ’, ‘श्रीराधिका’ आदि परम मंगलमय नामों का श्रवण होता रहता है, वह श्रीधाम वृन्दावन अलबेली सरकार श्रीराधाजू का दिव्य रसधाम है।
वृंदावन को चूहरौ बेचि खातु - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (43)
श्रीवृन्दावन धाम में निवास करने वाला चूहड़ा समुदाय का वह व्यक्ति भी, जो छाज बेचकर अपना जीवन-निर्वाह करता है, इतना परम सौभाग्यशाली है कि किसी अन्य गाँव अथवा नगर का राजा भी उसकी बराबरी नहीं कर सकता। श्रीधाम वृंदावन के वास की महिमा सर्वोपरि है।
सेज सुसंपति जुगल रति दंपति - श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (45)
श्रीवृन्दावन के दिव्य निकुञ्ज-भवन में सुन्दर शय्या और समस्त मनोहर रस-सामग्रियों से सुशोभित श्रीप्रियाप्रियतम (श्रीराधा-कृष्ण) अपनी अनन्य गति, मति और प्रेम को एक-दूसरे में समर्पित कर परस्पर गहन प्रेम में लीन हैं। श्रीवृन्दावन रूपी उनके निज धाम में युगल दंपति के नित्य-बिहार के अलौकिक सुख का निरंतर दर्शन प्राप्त होता है।
प्रनत-पाल-विरदावली राखी आनि जहान - ब्रज के दोहे
हे कृपानिधान! आपने संपूर्ण संसार में अपने शरणागत-पालक होने के यश की मर्यादा को सदा बनाए रखा है। फिर अब मेरी बारी आने पर आप मुझ पर कृपा करने में क्यों विलंब कर रहे हैं, दया करके मुझ पर भी अपनी करुणा दृष्टि कीजिए।
चिन्ता तो हरि नामकी और न चितवै दास - श्री कबीरदास
भक्त को केवल श्रीहरि के नाम का ही निरंतर चिंतन करना चाहिए और उसके अतिरिक्त किसी अन्य विषय का विचार नहीं करना चाहिए। श्रीहरिनाम के बिना जिन विषयों का मनुष्य चिन्तन करता है, वे सब अन्ततः उसे जन्म-मृत्यु के बन्धन में फँसाने वाले काल के फन्दे के समान हैं।
श्री वल्लभ वल्लभ रटत हो - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (08)
मैं निरंतर 'श्री वल्लभ-श्री वल्लभ' नाम का रटन करता हूँ, क्योंकि श्री वल्लभ ही मेरे जीवन और प्राण हैं। मुझे अपने माता-पिता की सौगंध है, मैं श्री वल्लभ को कभी भी नहीं भूलूँगा और सर्वदा उनका ही स्मरण रखूँगा।
कहा बुद्धि कहा कहि सकूँ - श्री चरणदास
श्रीराधा-कृष्ण की दिव्य रास-केलि की मनोहर प्रेममयी क्रीड़ा का वर्णन करने में मेरी बुद्धि कहाँ समर्थ है? वहाँ ऐसी अद्भुत और अनुपम लीलाएँ हो रही हैं कि उनका वर्णन करने में अपनी असमर्थता का अनुभव कर मुझे लज्जा आती है।
यह उत्कंठा की लता चली - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (15)
मेरे हृदय में उत्पन्न हुई तीव्र उत्कंठा रूपी लता बड़ी शीघ्रता से मुरझाने लगी है। यदि आप दोनों घन-दामिनी स्वरूप श्रीप्रियाप्रियतम (श्रीराधा-कृष्ण) अति शीघ्र पधारकर इस पर अपनी कृपा-जल की वर्षा नहीं करेंगे, तो यह लता विरह की अग्नि में सूखकर नष्ट हो जाएगी।
कबकी टेरत दीन है सुनत न नाथ पुकार - श्री दयाबाई
हे नाथ! यह दीन जीव न जाने कब से आपको पुकार रहा है, किंतु आप मेरी पुकार सुन ही नहीं रहे हैं। क्या आपके कान ऊँचा सुनने लगे हैं, अथवा आपने दीनों पर दया करने का अपना सहज स्वभाव (विरद) ही भुला दिया है?
राधे आनन निरखिकै चकित रहे - श्री ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रज शृंगार (32)
श्री राधा के श्रीमुख को निहारकर स्वयं नंदनंदन श्री कृष्ण आश्चर्य चकित रह जाते हैं। प्रेम की रीति बड़ी विचित्र है कि त्रिभुवन-मोहन, ब्रजचन्द्र श्री कृष्ण भी चकोर की भाँति श्री राधा के मुख-चंद्र को टकटकी लगाए निहार रहे हैं।
सुजस जाहु व्यौहार लागि परमारथ - श्री हित दामोदर दास, नेम बत्तीसी (8)
भले ही संसार के लोक-व्यवहार में मेरा यश और सुकीर्ति नष्ट हो जाए तथा परमार्थ के क्षेत्र में भी मेरा नाम पूर्ण रूप से मिट जाए, फिर भी मैं श्री धाम वृन्दावन को छोड़कर किसी भी अन्य स्थान पर कभी नहीं जाऊँगा।
नाम सुन्यौ हो गाँव बसि - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (442)
जैसे किसी गाँव में एक ही नाम के अनेक व्यक्ति रहते हों, तो बिना परिचय और पहचान के केवल नाम जानकर किसी विशेष व्यक्ति को खोजना असंभव है। खोजते-खोजते मनुष्य अंततः थककर निराश हो जाता है। इसी प्रकार केवल भगवान् के नाम का जप पर्याप्त नहीं है। जब तक उनके किसी विशेष स्वरूप से प्रेमपूर्ण भाव-संबंध स्थापित न हो, तब तक उनकी वास्तविक प्राप्ति नहीं हो सकती।
शोभा युगल किशोरकी को कवि - ब्रज के दोहे
श्री युगल किशोर (राधा-कृष्ण) की अलौकिक शोभा का वर्णन कौन कवि कर सकता है? वे दोनों मन को मोहने वाले शीतल चंद्रमा के समान पवित्र हैं और समस्त गोपियों के जीवन के एकमात्र धन और प्राण हैं।
निरगुन अविनासी मत कहा आनि - श्री सूरदास, सूर सागर (4215.5)
अरे उद्धव! हम ब्रजांगनाएँ तो प्रेममार्ग की उपासिकाएँ हैं और तुम ब्रज में आकर हमें ही अविनाशी निर्गुण ब्रह्म का ज्ञान सुनाना चाहते हो, जो हमें कदापि स्वीकार नहीं है। अतः तुम पहले यह बताओ कि सूरदास जी के स्वामी और हमारे जीवन-धन श्रीकृष्ण को कहाँ छोड़ आए हो? अच्छा तो यही होगा कि तुम उन्हें यहाँ हमारे पास ले आओ।
लता कुंज वृंदा बिपिन बिहरें - श्री सरस माधुरी
श्रीवृंदावन के लता-कुंजों में दोनों परम सुकुमार श्रीराधा-कृष्ण नित्य विहार कर रहे हैं। उनके श्रीमुख की मकरंद-रूपी माधुरी को प्राप्त करके भँवरे आनंदित होकर मधुर गुंजार कर रहे हैं (अथवा रसिक जन उनका सुंदर गुणगान कर रहे हैं)।
अँग-सँगनि सँग लै सखी लेउ - श्री हरिव्यस देवाचार्य, महावाणी, सुरत सुख (122)
हे सखियों! अपनी समस्त अंग-संगिनी सहचरियों को साथ लेकर आज श्रीप्रियाप्रियतम के प्रेम-विलास के संपूर्ण रस का भरपूर आनंद लूट लो। आज विजयादशमी की रात्रि है, अतः श्रीराधा-कृष्ण की यह दिव्य युगल जोड़ी अपने परस्पर प्रेमानंद से करोड़ों कामदेवों को परास्त कर पूर्ण विजय प्राप्त करे।
चकित नैन लखि बैन भये - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (70)
रास के अवसर पर श्रीप्रियाजी के अद्भुत रूप-लावण्य के दर्शन कर श्रीलालजी माधुर्य-रस के सागर में डूब जाते हैं।
यह रस अनुभव जनित है - चाचा श्री वृंदावन दास जी
यह रस प्रत्यक्ष अनुभव से ही प्राप्त होता है, जिसके लिए मन में प्रगाढ़ प्रेम होना आवश्यक है। श्रीहित हरिवंश महाप्रभु की कृपा से इस रस की प्राप्ति सहज और सुलभ रीति से हो जाती है।
कुंजबिहारिनि स्वामिनी अपनी निजु - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (182)
कुंजबिहारिणी श्रीराधा महारानी जू ही मेरी एक मात्र स्वामिनी हैं, जिन्होंने मुझे पूर्णतः अपना निज जन बना लिया है। उन्होंने अपने अत्यंत अद्भुत रूप का दर्शन कराकर मुझे अपने परम प्रेम-रस में पूर्ण रूप से सराबोर कर दिया है।
परम धन्य ब्रजलोक यह धनि - ब्रज के दोहे
यह ब्रजभूमि अत्यंत धन्य है और यहाँ का बरसाना गाँव भी परम धन्य है। वह गोप-कुल भी परम धन्य है, जिसका धाम नित्य मंगलमय और रस बरसाने वाला है।