दोहावली - ब्रज के दोहे

दोहावली विभिन्न भक्तों द्वारा रचित दोहों का संग्रह है ।

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  1. श्रीवृन्दावन लता वेलि तरु करौ - श्री हित गोपाल दास, निकुंज रस वल्लरी, आशीष दोहा

    हे श्रीवृन्दावन की समस्त लताओं, बेलों और वृक्षों! आप सब मिलकर मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए जिससे परम सुकुमारी प्यारी श्रीराधाजी हमसे हिल-मिलकर अत्यंत लाड़-दुलार करें।

  2. जाकों दरस अति दुर्लभो परसन - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (644)

    जिस नित्य-बिहार का दर्शन अति ही दुर्लभ है और उसका स्पर्श तो परम कठिन है। जिसमें ये साधारण स्वाद के लोभी लोग बेकार ही अपने मन में आशा लगाए बैठे हैं। अर्थात इस नित्य विहार की प्राप्ति के लिए इसका अनन्य उपासक बनना पड़ता है।

  3. घुँघरारी अलकावली मुख पै देत बहार - ब्रज के दोहे

    श्री कृष्ण के मुखमंडल पर सुशोभित घुँघराले बालों की लटें अद्भुत सौंदर्य की छटा बिखेर रही हैं। रसिकों के मीन रुपी मन को आकर्षित कर फँसाने के लिए ये अलकें अत्यंत नुकीले काँटों के समान हैं।

  4. जाके बश में रहत हौं - श्री ब्रजवासीदास, ब्रज विलास

    अपनी प्रभुता और ऐश्वर्य को त्यागकर मैं जिसके वश में रहता हूँ, उसी अनन्य प्रेम-भक्ति के द्वारा मनुष्य श्री वृन्दावन का परम अनुराग प्राप्त करता है।

  5. लेहु री निज नैनको फल - ब्रज के दोहे

    हे सखी! आज अपने नेत्रों का वास्तविक फल प्राप्त कर लो और अपने धन्य भाग्य की सराहना करो। जो स्वयं अजन्मा हैं, उन श्रीप्रियाजी के इस धरा पर प्राकट्य के परम मंगलकारी बधाई गीतों का गान करो।

  6. श्रीगुरु लाडिलि लालजी पूरिय मेरी - श्री संकेत अली, संकेत लता (6)

    हे श्री गुरुदेव और श्री लाडिली-लालजी! आप मेरी इस अभिलाषा को पूर्ण कीजिए कि मेरे चित्त में सदैव आपके युगल चरणों का वास रहे जिससे मेरे हृदय में निरंतर आनंद का संचार होता रहे, और आप मेरी बुद्धि को अपने दिव्य प्रकाश से आलोकित कर दें।

  7. राधा-राधा रट रही रसना प्रेम - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्री राधा प्रेम स्वरूपनी वर्णन (1)

    जीभ निरंतर प्रेम के परम सुंदर नाम 'राधा-राधा' का ही रटन कर रही है। श्री राधा साक्षात् प्रेम का धाम हैं और वे ही समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली हैं।

  8. या रस सौं जे रहे - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत (3.53)

    जो रसिक इस युगल-रस में सदैव रंगे रहते हैं, उनकी चरण-रज सदैव मस्तक पर धारण करनी चाहिये। श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि जिन्होंने इस रहस्य को भली-भांति समझ लिया है, उन्होंने ही अपने इस मानव-शरीर को वास्तव में सफल किया है।

  9. बिहरत दोऊ रसिकवर सहज अजन्मा - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (559)

    सहज और अजन्मा रूप वाले दोनों श्रेष्ठ रसिक निरंतर परस्पर विहार करते हैं। मैं निरंतर एकरस होकर उसी अनुपम केलि का भजन करता हूँ, जो श्री हरिदासी पद्धति की अत्यंत विलक्षण और अद्वितीय क्रीड़ा है।

  10. जिन काढ़ौ ब्रजनाथ जू मो - श्री रसनिधि

    हे ब्रजनाथ (श्री कृष्ण)! आप मेरे कर्मों का लेखा-जोखा मत देखिए, अर्थात् मेरे दोषों पर ध्यान मत दीजिए। आप तो कृपा करके मेरे हाथ को अपने कर-कमलों से दृढ़तापूर्वक थाम लीजिए। भाव यह है कि मेरे कर्म इतने निकृष्ट हैं कि उनके बल पर मेरा उद्धार कभी संभव नहीं है, परन्तु यदि आप कृपा करके मुझे अपना मान लें और मेरा हाथ थाम लें, तभी मेरा उद्धार संभव है।

  11. राधे आधे नयनसों तिरछी चितवन - ब्रज के दोहे

    श्रीराधा अपने अधखुले नेत्रों से अत्यंत अनुरागपूर्वक तिरछी चितवन से पीछे की ओर निहारती हैं। उनका यह देखना ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई ध्वज आगे की ओर बढ़ रहा हो, और उसकी पताका पीछे की ओर फहरा रही हो।

  12. कबिरा यह तन जात है - श्री कबीरदास

    कबीरदास जी कहते हैं कि यह मानव शरीर एक दिन अवश्य नष्ट हो जाएगा, इसलिए यदि संभव हो तो समय रहते इससे अपना कल्याण कर लो। अपने कल्याण के लिए या तो संतों की निष्काम सेवा करो या भगवान श्री कृष्ण के गुणों का गान करो।

  13. घर आवे वैष्णव जबहीं दीजे - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (49)

    जब भी कोई वैष्णव भक्त घर पर पधारें, तब उन्हें चार बहुमूल्य रत्न अवश्य अर्पित करने चाहिए। वे चार रत्न हैं—बैठने के लिए आदरपूर्वक आसन, पीने के लिए शीतल जल, अत्यंत मधुर एवं प्रिय वाणी, और अपनी सामर्थ्य के अनुसार प्रेमपूर्वक भोजन या अन्न-प्रसाद।

  14. खग मृग द्रुम सेवत सदा - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (284)

    पक्षी, मृग और वृक्ष अपने अति सरस व अलौकिक रूप को धारण करके इस प्रकार सुशोभित हो रहे हैं, मानो परम पावन वंशीवट वृन्दावन धाम का सम्राट् होकर शोभायमान हो रहा है।

  15. लेत न सुख हरि भक्ति - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह)

    जो मनुष्य समस्त सुखों के वास्तविक सार भगवान की भक्ति के आनंद को ग्रहण नहीं करता, उसका इस संसार में राजा बन जाना भी व्यर्थ ही है; वह तो केवल संसार का बोझ उठाने वाले एक बेगार मजदूर की भाँति अपना जीवन गँवा रहा है।

  16. धन-जोवन-जन-ज्ञान-बल सब गुमान के - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (2)

    धन, यौवन, स्वजन, ज्ञान और बल—ये सभी केवल अहंकार (गुमान) उत्पन्न करने के मूल कारण हैं. श्री कान्त किशोर जी कहते हैं कि इन साधनों के बल पर श्री वृन्दावन की रसमय केलि कदापि प्राप्त नहीं की जा सकती।

  17. वेद पुरान विरंचि सिव महिमा - कृपाराम

    वेद, पुराण, ब्रह्मा और शिव भी जिन नंदकिशोर (श्रीकृष्ण) की महिमा का विचार करके निरंतर गान करते हैं, ऐसे उन परम प्रभु के चरण कमलों को सदा अपने हृदय में धारण करना चाहिए।

  18. बेननि के नैननि सों दरस्यो - श्री वल्लभ रसिक जी, श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी (54)

    रसिक वाणी रूपी नेत्रों के माध्यम से मैंने श्रीयुगल सरकार के दिव्य स्वरूप का साक्षात् दर्शन किया है, और अब अपने नेत्रों की मूक भाषा व प्रेमाश्रुओं द्वारा उनके उस अनुपम रूप-सौंदर्य का वर्णन किया है।

  19. कहा कहौं शोभा सुभग कहत - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी

    श्री युगल सरकार की उस परम सुंदर और मंगलमयी शोभा का मैं क्या वर्णन करूँ, उसके विषय में कुछ भी कहते नहीं बनता है। दोनों एक ही समान किशोर अवस्था के हैं, जो अद्भुत सौंदर्य की कांति से परिपूर्ण हैं और उनके श्रीअंग अत्यंत सुंदर तथा सुकोमल हैं।

  20. जा रज ही के लोभ सौं वत्स रूप गहि स्याम- श्री किशोरी अलि (रत्न अलि को पत्र-व्यवहार)

    जिस श्रीवृंदावन रज के परम लोभ के कारण ही श्यामसुंदर श्रीकृष्ण ने बछड़े का रूप धारण किया और दिन-रात अपनी जिह्वा से उस रज का आस्वादन करते हुए वन-वन में विचरते रहे।