श्री हित किशोरी लाल

श्री हित किशोरी लाल, श्री राधा वल्लभ सम्प्रदाय के एक रसिक भक्त हैं ।

19 लेख उपलब्ध हैं

  1. जो मन मोहन करत बस - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (94.3)

    जो मनमोहन (श्री कृष्ण) संपूर्ण संसार को अपने वश में कर लेते हैं और जो सभी के चित्त को चुराने वाले हैं, वे स्वयं भी इस ‘राधा’ नाम को, अत्यंत प्रेमपूर्वक, रात-दिन निरंतर जपते रहते हैं।

  2. लोग कुटुम सुख अर्थ अनन्तहि - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (32)

    मैंने लोक-परलोक, परिवार के सुख और अनन्त भौतिक कामनाओं को दूर से ही त्याग दिया है। इतना ही नहीं, जप, व्रत तथा परमार्थ सम्बन्धी समस्त श्रेष्ठ साधनों से भी दीर्घकाल तक अभ्यास करने पर निराश होकर उन्हें छोड़ दिया है।

  3. याही रस-मय नाम सौं राखत प्रेम अपार - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (94.2)

    जिसके प्रभाव के सामने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे चारों पुरुषार्थ भी तुच्छ प्रतीत होते हैं, उस परम रसमय “राधा” नाम से श्रीकृष्ण अपार प्रेम रखते हैं।

  4. धर्म अर्थ फल काम मोक्ष सब दूर विराजैं - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (77)

    धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये उत्तम चार पुरुषार्थ यदि जगत में अत्यन्त उत्कृष्ट माने भी जाते हों, तो वे भले ही बने रहें। मुझे तो उनकी व्यर्थ चर्चा करने की भी तनिक अभिलाषा नहीं है।

  5. पवित्रा शोभित पाट पुनीत - श्री हित किशोरी लाल

    शुद्ध रेशम का बना हुआ पवित्रा श्री श्यामाश्याम के गले में सुशोभित है।प्रिया के हृदय पर लाल और सोसनी (लाल रंग मिले हुये नीले रंग का) रंगों का पवित्रा धारण किया हुआ है और मोहन के वक्ष स्थल पर पीला पवित्रा धारण हैं।

  6. प्यारी तव पद टहल कौं - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (85.1)

    हे राधा प्यारी जू, आपके चरणों की सेवा के लिए लक्ष्मी आदि देवीयां भी लालायित रहती हैं। शुकदेव, नारद, आदि भागवतगण उसकी कामना करते हैं लेकिन प्राप्त नहीं कर पाते।

  7. कोटि कोटि नरकादिक तिनहूँ सौं निंद ऐसी - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (83)

    विषय तो दूर विषय की चर्चा भी मत करो क्योंकि वह करोड़ों नरकों से भी घृणित है। मुक्ति आदि जो अनेक मार्ग वेदों एवं शास्त्रों ने गाए हैं उससे तो मुझे भय लगता है।

  8. जोई परा तत्व वृन्दावन में प्रकाश जाकौं - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (76)

    अहो जो परम तत्व, केवल श्रीवृन्दावन में ही दृष्टिगोचर होता है, अन्यत्र कहीं नहीं। जिसका वर्णन करने में श्रुति-शिरोभाग उपनिषद् भी समर्थ नहीं हैं।

  9. एक बार हू लेहि मुख, राधा-राधा नाम - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (94.1)

    श्री राधा नाम की इतनी महिमा है कि केवल ‘राधा राधा’ कहने मात्र से ही श्री कृष्ण तुरंत उसे सुनते हैं और दौड़ कर उस भक्त से मिलने आते हैं।

  10. गिनत बनै ना अघ अगनित अपार सोऊ - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (154)

    जो व्यक्ति एक बार भी मुख से “राधा” नाम का उच्चारण करता है, श्री श्यामसुंदर भगवान कृष्ण उसके अनंत पापों की गणना न करते हुए हृदय से अति उदार होकर यह विचारने लगते हैं कि उसे क्या प्रदान करें, क्योंकि उसने जो उन्हें दिया है, उसकी तो कोई तुलना ही नहीं हो सकती।

  11. प्यारी तव पद टहल कौं, कमलादिक ललचाहिँ - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (85)

    हे प्यारी जू (श्री राधा)! आपके चरणों की सेवा और टहल प्राप्त करने के लिए लक्ष्मी जी (कमला) आदि देवियाँ भी निरंतर ललचाती रहती हैं। यहाँ तक कि श्री शुकदेव जी और नारद जी जैसे महान मुनीश्वर भी जिस दुर्लभ सेवा की सदा अभिलाषा करते हैं, वह उन्हें भी सुगमता से प्राप्त नहीं हो पाती।