जो कोई प्रिया चरण मन - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (103)
जो कोई अपने मन को श्रीप्रियाजी (श्रीराधा) के चरणों में सदा लगाए रखता है, आनन्दस्वरूप श्रीश्यामसुन्दर उस पर अपार प्रेम की वर्षा करते हैं।
श्री हित किशोरी लाल, श्री राधा वल्लभ सम्प्रदाय के एक रसिक भक्त हैं ।
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जो कोई अपने मन को श्रीप्रियाजी (श्रीराधा) के चरणों में सदा लगाए रखता है, आनन्दस्वरूप श्रीश्यामसुन्दर उस पर अपार प्रेम की वर्षा करते हैं।
जो मनमोहन (श्री कृष्ण) संपूर्ण संसार को अपने वश में कर लेते हैं और जो सभी के चित्त को चुराने वाले हैं, वे स्वयं भी इस ‘राधा’ नाम को, अत्यंत प्रेमपूर्वक, रात-दिन निरंतर जपते रहते हैं।
मैंने लोक-परलोक, परिवार के सुख और अनन्त भौतिक कामनाओं को दूर से ही त्याग दिया है। इतना ही नहीं, जप, व्रत तथा परमार्थ सम्बन्धी समस्त श्रेष्ठ साधनों से भी दीर्घकाल तक अभ्यास करने पर निराश होकर उन्हें छोड़ दिया है।
जिसके प्रभाव के सामने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे चारों पुरुषार्थ भी तुच्छ प्रतीत होते हैं, उस परम रसमय “राधा” नाम से श्रीकृष्ण अपार प्रेम रखते हैं।
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये उत्तम चार पुरुषार्थ यदि जगत में अत्यन्त उत्कृष्ट माने भी जाते हों, तो वे भले ही बने रहें। मुझे तो उनकी व्यर्थ चर्चा करने की भी तनिक अभिलाषा नहीं है।
शुद्ध रेशम का बना हुआ पवित्रा श्री श्यामाश्याम के गले में सुशोभित है।प्रिया के हृदय पर लाल और सोसनी (लाल रंग मिले हुये नीले रंग का) रंगों का पवित्रा धारण किया हुआ है और मोहन के वक्ष स्थल पर पीला पवित्रा धारण हैं।
सृष्टि-रचना आदि की बात तो दूर रही, निकुंजेश्वर श्रीकृष्ण अपने नारद आदि भक्तों को भी नहीं पहचानते।
जिनके नयन बाणों की चोट से श्री कृष्ण मूर्छित होकर धरती पर गिर जाते हैं और पुनः-पुनः व्याकुल और अधीर हो उठते हैं।
हे नित्य निकुंजेश्वरी श्री राधे! हे रस प्रदायिनी प्रिया जू! मुझे अपनी दासी जान अपनी महल की टहल (निज सेवा) दीजिए ।
हे राधा प्यारी जू, आपके चरणों की सेवा के लिए लक्ष्मी आदि देवीयां भी लालायित रहती हैं। शुकदेव, नारद, आदि भागवतगण उसकी कामना करते हैं लेकिन प्राप्त नहीं कर पाते।
विषय तो दूर विषय की चर्चा भी मत करो क्योंकि वह करोड़ों नरकों से भी घृणित है। मुक्ति आदि जो अनेक मार्ग वेदों एवं शास्त्रों ने गाए हैं उससे तो मुझे भय लगता है।
अहो जो परम तत्व, केवल श्रीवृन्दावन में ही दृष्टिगोचर होता है, अन्यत्र कहीं नहीं। जिसका वर्णन करने में श्रुति-शिरोभाग उपनिषद् भी समर्थ नहीं हैं।
वृंदावन की स्वामिनी जो समस्त सारों की सार हैं जिनका नाम राधा है, उनके चरणों में ही मेरा मन नित्य वास करे ।
अनुदिन श्रीराधा-नाम के भजन के प्राप्त होने पर कोटि कोटि श्रेष्ठ साधन भी परित्याज्य हो जाते हैं।
श्री राधा नाम की इतनी महिमा है कि केवल ‘राधा राधा’ कहने मात्र से ही श्री कृष्ण तुरंत उसे सुनते हैं और दौड़ कर उस भक्त से मिलने आते हैं।
जिनमें प्रेम-मूर्ति श्रीराधा के चरणों का रस नहीं ऐसे शास्त्रों के समूह से मेरा क्या प्रयोजन ?
जो लावण्य एवं रस की सार हैं। जो करुणा एवं सुख की सार हैं।
वे भाग्यशाली जन जो न तो संसार की मर्यादा, वेदों या कुलों को स्वीकार करना चाहते हैं ।
जो व्यक्ति एक बार भी मुख से “राधा” नाम का उच्चारण करता है, श्री श्यामसुंदर भगवान कृष्ण उसके अनंत पापों की गणना न करते हुए हृदय से अति उदार होकर यह विचारने लगते हैं कि उसे क्या प्रदान करें, क्योंकि उसने जो उन्हें दिया है, उसकी तो कोई तुलना ही नहीं हो सकती।
हे प्यारी जू (श्री राधा)! आपके चरणों की सेवा और टहल प्राप्त करने के लिए लक्ष्मी जी (कमला) आदि देवियाँ भी निरंतर ललचाती रहती हैं। यहाँ तक कि श्री शुकदेव जी और नारद जी जैसे महान मुनीश्वर भी जिस दुर्लभ सेवा की सदा अभिलाषा करते हैं, वह उन्हें भी सुगमता से प्राप्त नहीं हो पाती।