श्री हित चौरासी
84 पदों से युक्त, रसोपासना पंथ के अनुयायियों के लिए रस महाकाव्य, श्री कृष्ण की मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु के द्वारा लिखित श्री राधा कृष्ण की नित्य लीलाओं का संकलन है श्री हित चौरासी।
लेखक: श्री हित हरिवंश महाप्रभु
53 लेख उपलब्ध हैं
आजु दोउ दामिनि मिलि बहसीं - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (55)
हे सखी! आज दो दामिनियों में परस्पर होड़ लगी है। दोनों अत्यंत नवीन श्याम घटाओं के बीच रहकर उनके श्यामल रंग में रंगी हैं। एक दामिनी (बिजली) आकाश की श्याम घटाओं के बीच चमक रही है और दूसरी श्रीराधा हैं, जो श्याम मेघ के समान वर्ण वाले श्रीकृष्ण के संग शोभायमान हो रही हैं।
राधा प्यारी तेरे नैंन सलोल - श्री हित हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (23)
हित सखी (श्री हरिवंश महाप्रभु) भाव-विभोर होकर कहती हैं— हे प्यारी राधे! आज तुम्हारे नेत्र अत्यंत चंचल और मदमाते हैं। तुमने अपनी अनन्य प्रीति, अनुराग और कंचन के समान कांतिवान गौर देह से रसिकलाल श्रीकृष्ण को पूर्णतः अपने वश में कर लिया है।
बैंनु माई बाजै बंसीवट - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (64)
हे सखी! वंशीवट में श्री कृष्ण की वंशी की मधुर ध्वनि गूँज रही है। श्री धाम वृन्दावन के परम पावन एवं सुन्दर यमुना तट में सदा वसंत ही रहता है ।
मोहनलाल के रसमाती - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (20)
हे राधे ! तू मोहन लाल के रस में उन्मत्त है। हे नव वधू ! उस एकान्त मिलन की गोप्य बात को क्यों मुझसे छिपा रही है? इसीलिये न कि प्रथम स्नेह के कारण संकोच है !
चलि सुंदरि बोली वृंदावन - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (44)
(दूतिका ने श्रीप्रियाजी से कहा- ) हे सुन्दरि ! चलो !! तुम्हें ( प्रियतम ने ) वृंदावन में बुलाया है । हे कामिनि ! तुम तो हो दामिनि जैसी और मोहन नूतन घन की भाँति । तब फिर तुम उनके कण्ठ में ( घन में दामिनि की भाँति ) लग कर क्यों नहीं शोभित होती ?
खंजन मीन मृगज मद मेंटत - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (73)
हे प्रिया, मैं तुम्हारे नेत्रों की बात क्या कहूँ ? यह अपनी चंचलता से खंजन का, तिरछी गति से मीन का, और भोलेपन से मृगछोना का मद चूर चूर कर रहे हैं ।
अधर अरुन तेरे कैसे कै दुराऊँ - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (14)
हे रसिक वर लाल ! आपके अत्यन्त अरुण अधरों का राग किस प्रकार छिपाऊँ ? यदि मैं कदाचित् उन अधरों की अद्भुतता कुसुम रंगों से रंजित करूँ तो भी मुझे रवि शशि रूप प्रेम की आशङ्का है ।
प्रीति न काहु की कानि बिचारै - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (42)
प्रीति किसी की मर्यादा नहीं मानती । अरे ! प्रेम से विशेष विवश मन को किसी मार्ग कुमार्ग की ओर जाने से कौन निवारण कर सकता है ?
तेरे नैंन करत दोऊ चारी - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (21)
[हे राधे !] तेरी दोनों आँखें ही तो चारी (चुगल खोरी) कर रही हैं, बता रही हैं ! कितनी प्रसन्न है ये ? इनकी प्रसन्नता मानो कहीं समाती नहीं [इसी से विदित होता है कि तुझे कहीं न कहीं कुञ्ज बिहारी] (श्रीलालजी) [अवश्य] मिले हैं।
वन की लीला लालहिं भावै - श्री हित हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (47)
श्रीलालजी को वन की लीला बड़ी प्यारी लगती है, तभी तो उन्हें वहाँ के फूल पत्तों पर पड़े हुए प्रति बिम्बों में भी नख सिख प्रिया रूप ही ज्ञात होता रहता है ।
आजु गोपाल रास रस खेलत - श्री हरिवंश महाप्रभु , हित चौरासी (24)
अरी सजनी ! आज विमल कल्पवृक्ष के तीर यमुना पुलिन पर श्रीगोपाल लाल रास क्रीड़ा कर रहे हैं । सजनी ! जैसा निर्मल शरद का समय है वैसा ही सुन्दर चन्द्रमा आकाश में शोभित है और रोचक त्रिविध ( शीतल मन्द सुगन्धित ) पवन भी बह रहा है ।
आजु तौ जुवति तेरौ वदन - श्री हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (4)
हे युवति ! तुम्हारा जो यह मुख आनन्द से प्रफुल्लित है उसी से तुम्हारे प्रियतम सङ्गम जनित सुख की सूचना मिल रही है।
जैसे तुम्हारे बोल आलस्य से लटपटाये हुए हैं वैसे ही तुम्हारे कपोल भी सुरंग (ताम्बूल पीक) से रँग गये हैं। दोनों नयन विशेष थकित से, अरुण एवं उनींदे हैं ।
बैठे लाल निकुंज भवन - श्री हित हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (40)
श्री हित सखी ने फिर कहा- “ हे मानिनि [श्री राधे] ! लाल ( तुम्हारी प्रतीक्षा करते हुए ) निकुञ्ज भवन में बैठे हैं । ( इस समय ) कैसी सुन्दर रुचि दायक रात्रि है , मल्लिकाएँ खिल रही हैं और शीतल , सुगन्धित पवन धीरे धीरे बह रहा है ।
सुधंग नाचत नवल किसोरी - श्री हित हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (78)
नवल किशोरी राधिका आज सुधंग नृत्य नाच रही है और थेइ थेई कहते हुए अपने प्रियतम के मुख चन्द्र की ओर ऐसे देखती है जैसे ( रूप की ) प्यासी चकोरी ।
आजु बन राजत जुगल किसोर - श्री हित हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (33)
आज श्रीवृन्दावन में युगलकिशोर श्रीश्यामाश्याम शोभायमान हैं। श्रीनन्दनन्दन और श्रीवृषभानुनन्दिनी सम्पूर्ण रात्रि प्रेम विहार करने के बाद उनींदी अवस्था में प्रातःकाल उठे हैं।
नैंननिं पर वारौं कोटिक खंजन - श्री हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (22)
( हे राधे ! तुम्हारे ) नयनों पर मैं कोटि कोटि ख़ंजनों को भी न्यौछावर कर दूँ । ( कितने सुन्दर हैं तुम्हारे नयन ? ) चंचल हैं , अत्यन्त चपल हैं , अरुण है और अनियारे – कोर दार भी । तिस पर उनके अग्र भाग में और अंजन भी लग रहा है ।
नंद के लाल हरयौं मन मोर - श्री हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (13)
श्रीप्रियाजी ने कहा- “ सखि ! नन्द नन्दन ने तो मेरा मन हर लिया है । मैं अपने भवन में बैठी मुक्ता माल पिरो रही थी उन्होंने सबेरे सबेरे मुझ पर काँकरी फेंक कर मेरी तन्मयता भंग करके अपनी ओर आकृष्ट कर लिया ।
देखौ माई सुंदरता की सीवाँ
श्रीहित सखी (श्री हित हरिवंश महाप्रभु) कहती हैं- हे सखियों ! सुन्दरता की सीमा (श्रीराधा) को तो देखो !जिस नागरी को देख कर समस्त व्रज की नव युवती गण
यह जु एक मन बहुत ठौर करि - श्री हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (59)
यह पद श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने श्री हरिराम व्यास के प्रश्नों के उत्तर में कहा था, जिसके बाद श्री हरिराम व्यास जी उनके शिष्य बन गये थे।
आजु प्रभात लता मंदिर में - श्री हरिवंश महाप्रभू, श्री हित चौरासी (5)
मंगल प्रभात की वेला में हर्षोन्मादित युगल किशोर अलसाये हुए लटक लटक कर लता भवन की मंजुल भूमि पर मादक गति से चलते हैं। वृन्दावन निकुञ धाम में सूरत-विलासी श्रीश्यामसुन्दर की मालाएँ श्रीराधा के उरोज चर्चित केशर लेप से मण्डित हैं।