केलिमाल

केलिमाल स्वामी श्री हरिदास जी महाराज जिन्हें ललिता सखी का अवतार वृंदावन धाम में माना जाता है, ने प्रमुख रूप से अंतरंग केली लीलाओं का वर्णन मुख्य इस ग्रंथ में किया है ।

88 लेख उपलब्ध हैं

  1. श्रम जल कन नाहीं होत - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (59)

    हे राधे! सुरत-श्रम के पश्चात तुम्हारी रसमयी छवि के श्रीअंगों पर सुशोभित ये स्वेद-बिन्दु (पसीने की बूँदें) कोई साधारण जल-कण नहीं हैं, अपितु ये साक्षात् चिन्मय मोतियों की माला के समान दमक रहे हैं। संसार में अनेक बहुमूल्य मोती तो देखे, किन्तु इस अलौकिक छवि का कोई मूल्य नहीं है; इस अद्भुत रूप-माधुरी पर मैं अपना तन, मन और धन सब कुछ बार-बार न्योछावर करता हूँ।

  2. बचन दै मान न करौं - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (59)

    प्रियतम बाँके बिहारी श्री राधा रानी से कहते हैं— हे प्यारीजू! वचन दीजिये कि आप कभी मान न करेंगी। मन से कभी मान नहीं करेंगी, वचनों से कभी रुखाई न बरतेंगी, एवं किसी क्रिया द्वारा अर्थात् भौहों को टेड़ी करके मुझे डरायेंगी नहीं।

  3. द्वै लर मोतिन की एक पुंजा पोति कौ सादा - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (20)

    श्री कुंजबिहारिणीजू (श्रीराधा) के गले में मोती की दो लरियों वाला हार, सादा और एकदम सुगठित है।हे सखी! मेरी दृष्टि उनसे हटती ही नहीं।

  4. बेंनी गूँथि कहा कोउ जानें मेरी सी - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (70)

    हे प्यारी जू ! आपकी सौगन्ध खा कर कह रहा हूँ कि वेणी गूंथने की कला मेरे समान और कौन जानता है ? हे प्यारी! वेणी के बीच-बीच में सफेद, पीले एवं लाल फूलों की सज्जा मेरे सदृश दूसरा कोई नहीं बना सकता ।

  5. कुंजबिहारी कौ बसन्त सखि - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (99)

    अरी सखी ! चलो न, श्यामा- कुञ्जविहारी का वसन्तोत्सव देखने चलें । देखो, श्रीधाम वृन्दावन नव-नव उमंगों से पुलकित हो रहा है । इसकी कुंज निकुजें भी नवीन हैं और पत्र-पुष्पों का विकास भी नवीन है । ऐसे सरस वातावरण में श्यामा श्याम नव तरुणियों के बीच उनसे मिलकर वसन्तोत्सव मना रहे हैं ।

  6. बनी री तेरे चारि चारि चूरी करनि - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (50)

    हे प्यारीजू (श्री राधा), आपके प्रत्येक हाथ में चार चूड़ियाँ सुशोभित हैं। एक बहुमूल्य हीरे का हार आपके गले की शोभा बढ़ा रहा है, और आपकी नथ से मोती झूल रहे हैं।

  7. अजहूँ कहा कहति है री मारै नैंन आरनि - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (64)

    हे प्रियाजू ! आपकी चितवन के प्रहार से लाल (श्री कृष्ण) के हृदय में ऐसी वेदना हो रही है, क्या अब भी कुछ कहना शेष है ? अब क्या कहती हो ?

  8. प्यारी तेरौ बदन चंद देखैं - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (57)

    लालजी (श्री कृष्ण) श्री राधा से कहते हैं - हे प्यारी जू, आपके चन्द्र वदन को देखकर मेरे हृदय रूपी सरोवर में चाह रूपी कमल प्रफुल्लित हुई है।

  9. प्यारी तेरी बॉफिन बान सुमार - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (37)

    श्री कृष्ण श्री राधा से कहते हैं - हे प्यारी जू! आपकी चितवनि अर्थात् पलकें बाण के समान हैं एवं भौंहें धनुष के समान हैं जिसके प्रहार से कोई नहीं बच सकता । यदि एक साथ इस धनुष के बाण छूट जायें तो ऐसा रस बरसता है मानो इंद्र के क्रोध से भयंकर बादल बरसने लगें ।

  10. सुनि धुनि मुरली बन बाजै - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (52)

    अरी सखी! कुंजों में बज रही मुरली की धुन सुन, श्री हरि ने रास रचाया है । प्रत्येक कुंज में वृक्ष एवं लताएँ प्रफुल्लित हैं एवं रास मण्डल सोने एवं मणियों से जटित है ।

  11. प्यारी जू हम तुम दोऊ इहाँ न कोउ हितू मेरौ - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (79)

    हे प्यारी जू, हम दोनों एक ही कुंज के साथी हैं, तो हम क्यों एक दूसरे से रूठें । यहां कोई हमारा ऐसा हितैषी नहीं जो हम दोनों की पीर को समझ सके । [1]

  12. ऐसी जिय होत जो जिय सौं जिय मिलै - ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (35)

    श्री श्यामसुंदर प्यारी श्री राधा से कहते हैं - हे प्यारी जू, मेरी ऐसी इच्छा हो रही है कि हृदय से हृदय मिल जाये, तन में तन समा जाय, परन्तु हे प्यारी, फिर मैं आपके दर्शन कहाँ कर पाउँगा ?

  13. सोई तौ बचन मोसौं मानि - श्री स्वामी हरिदास जी, केलिमाल (44)

    निकुंज महल में दिव्य युगल श्री राधा कृष्ण विराजमान हैं। उसी समय श्री राधा अपना प्रतिबिंब देखते हुए, अपने ही प्रतिबिंब से मधुर वचन कहने लगीं:

  14. प्यारी तौपै कितौक संग्रह छबिन कौ - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (66)

    कुंज महल में श्री लाल जू प्रिया जी के चरणों से लिपटे हैं । श्री लाल जी [कृष्ण], श्री राधा से कहते हैं: हे प्यारी जू, तुम्हारे पास छबि के कितने संग्रह हैं ? तुम्हारे अंगों से विभिन्न केलि के प्रकाश उत्पन्न होते हैं ।

  15. नील लाल गौर के ध्यान बैठे कुंजबिहारी - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (28)

    श्री कुंजबिहारी गौर वर्ण वाली श्री कुंजबिहारिनी [राधिका] जो नीले एवं लाल रंग के वस्त्रों एवं आभूषणों से सुस्जित हैं, उनके अति अद्भुत रस के ध्यान में बैठे हैं । ज्यौं ज्यौं वह इस रस से वंचित हैं त्यौं त्यौं उनकी पीड़ा [लालसा] बढ़ रही है ।

  16. बनी री तेरे चारि चारि चूरी करनि - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (50)

    श्री लाल जी [कृष्ण] श्री लाडिलीजी [राधा] से बोले- हे प्यारीजी, आपके सुकोमल करों में चार-चार चूड़ियाँ अत्यंत शोभायमान हैं ।आपके कंठ में रत्नों हीरे से जटित सुंदर आभूषण, एवं धारण किया हुआ हार, एवं नासा में मुक्ता (मोती) ऐसी अद्बुत शोभा पा रही है जो आपके मीठे बोल बोलने से हिल-हिल कर मन का हरण कर रही है ।