श्रम जल कन नाहीं होत - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (59)
हे राधे! सुरत-श्रम के पश्चात तुम्हारी रसमयी छवि के श्रीअंगों पर सुशोभित ये स्वेद-बिन्दु (पसीने की बूँदें) कोई साधारण जल-कण नहीं हैं, अपितु ये साक्षात् चिन्मय मोतियों की माला के समान दमक रहे हैं। संसार में अनेक बहुमूल्य मोती तो देखे, किन्तु इस अलौकिक छवि का कोई मूल्य नहीं है; इस अद्भुत रूप-माधुरी पर मैं अपना तन, मन और धन सब कुछ बार-बार न्योछावर करता हूँ।
