जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज जो पांचवें मूल जगदगुरू थे, जिन्होंने रस उपासना की व्याख्या अपने ग्रंथों जैसे ब्रज रस माधुरी, प्रेम रस मदिरा, श्यामा श्याम गीत, राधा गोविंद गीत एवं अन्य से की है। काशी विश्व परिषद द्वारा इन्हें भक्ति योग रसावतार माना गया है। यह ही केवल ऐसे जगद्गुरु हैं जिन्हे जगद्गुरुतम पदवी मिली है।

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  1. मोहिं मनमोहन मनभाय रे - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (80)

    मुझे तो केवल वे मन को मोहने वाले प्राणप्रिय मनमोहन (श्री कृष्ण) ही मनभावन लगते हैं। कोई जप करता है, कोई तप करता है, कोई व्रत रखता है, तो कोई जंगल में जाकर समाधि लगाता है।

  2. चितवत चित करषत जिते - जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (54)

    श्री कृष्ण की एक रसमयी दृष्टि से बड़े-बड़े परमहंस समाधि भुला देते हैं और परमहंसों की तो गणना ही क्या, जब स्वयं देवाधिदेव भगवान् शिव ने भी उस रस के आस्वादन हेतु गोपी-देह को धारण कर लिया।

  3. सखी सब, ह्वै गये लालहिं लाल - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, होरी माधुरी (24)

    एक सखी वृन्दावन की होली के दृश्य का वर्णन करती हुई अपनी अन्तरंग सखी से कहती है कि अरी सखी ! युगल सरकार की होली में पिचकारियों से ऐसा रंग चला और ऐसा गुलाल उड़ा कि जड़-चेतन सब लाल हो गये।

  4. कहो पिय किन तोहिं रसिक बनायो - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, विरह माधुरी (80)

    एक सखी कहती है कि हे प्रियतम ! यह तो बताओकि तुमको रसिक बनाया किसने है? तुम पूर्व शूकरावतार में अपने सौन्दर्य के बल पर कब 'मदन मोहन' कहलाये थे? मत्स्यावतार में तुमने मछली का शरीर धारण करके जल ही में रहते हुए कब गोपियों का चीर हरण किया था?

  5. रास-रस रसिक रँगीली राधा - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (35)

    श्री किशोरी जी रास रस से विभोर रसिकों को रिझाने वाली हैं, जिनके चरण कमलों की नखमणि रूपी चन्द्रमा के प्रकाश को ब्रह्म जान कर योगीराज शम्भु सरीखे समाधि में ध्यान करते हुए निर्विकल्प रहते हैं।

  6. माँगना हो तो माँगो सेवा श्याम श्यामा - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, श्यामा श्याम गीत (55)

    यदि कुछ माँगना ही है तो केवल श्यामा-श्याम की सेवा माँगो। उस सेवा के लिए निष्काम प्रेम की याचना करनी चाहिये। इसके अतिरिक्त कोई अन्य इच्छा या याचना हृदय में न आने पाए — यही सच्ची भक्ति का मार्ग है।

  7. श्री राधे जू को, अधाधुंध दरबार - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (46)

    श्री राधा जू के दरबार में अधाधुंध (बेहिसाब) कृपा बरसती है। जिन ब्रज की वनचारी स्त्रियों का आचरण संसार की दृष्टि में निंदनीय और व्यभिचारी कहा जाता है क्योंकि वे पति के घर में रहते हुए भी, श्रीकृष्ण को (उन्हें पूर्ण ब्रह्म रूप में न जानते हुए भी) परपुरुष मानकर अनन्य प्रेम करती थीं, उन्हीं गोपिकाओं को श्री राधा ने अपनी निज-सहचरियाँ बना लिया।

  8. जाके अगनित गुनन को गावत वेद ऋचान - जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (94)

    जिन श्री कृष्ण के अनगिनत गुणों को गाते हुये चारों वेद नहीं थकते, वही ब्रह्म श्री कृष्ण ब्रज में गोपियों को हठात् छेड़ कर 'दारी के’, इत्यादि गाली को सुनने में अपना परम सौभाग्य समझते हैं।

  9. हम भूखे ब्रज की गारी के - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (132)

    भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं कि हमें ब्रज की प्यार की गालियाँ अत्यंत ही अच्छी लगती हैं। 'दारी के' इस गाली को सुन-सुन कर मैं अपने बैकुण्ठ लोक के सुख को न्यौछावर करते हुए बलिहार जाता हूँ।

  10. तुम मेरे थे रहोगे यह श्रुति वचन तिहार - जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (81)

    हे श्री कृष्ण! भले ही मैं पतित हूँ, परंतु तुम अनादि काल से मेरे थे, और अनंतकाल तक मेरे ही बने रहोगे — यह वेदों में तुम्हीं ने स्वयं कहा है। फिर हे अधम उधारन! मुझे क्यों भुला दिया?

  11. श्री श्यामा जू को श्याम पलोटत पाम - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (49)

    श्री श्यामा जू (श्री राधा) के चरण कमलों को श्यामसुन्दर दबाया करते हैं । जिन्हें वेदों ने पूर्णकाम सच्चिदानंद ब्रह्म बताया है, वही ब्रह्म नन्दनन्दन बनकर अवतीर्ण हुए हैं ।

  12. संत जन बारह मास बसंत - जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (103)

    संत महात्माओं के पास बारहों महीने बसन्त का निवास रहता है । संत लोग बसन्तकालीन कोयल की कूक के समान अत्यन्त प्रेम भरी ध्वनि में निरन्तर ‘पिउ’ ‘पिउ’ ऐसा कहा करते हैं ।

  13. आरती भानु दुलारी की - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

    मैं बृषभानु की लाड़िली पुत्री, बरसाने वारी राधे की आरती करता हूँ। राधा रानी दिव्य धाम वृंदावन में रत्न जड़ित स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान हैं।

  14. धरु उन स्वामिनी को ध्यान रे - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (19)

    अरे मन! तू उन वृषभानुनंदिनी स्वामिनी का ध्यान कर, जिनकी नखमणि चन्द्रिका का ध्यान स्वयं श्यामसुन्दर करते हैं ।

  15. रहु श्री बरसाने गाम रे - जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (90)

    अरे मन! चलकर श्री बरसाने ग्राम में निवास कर, जहाँ पूर्णब्रह्म घनश्याम भी अपने मुकुट से झाड़ू लगाया करते हैं।

  16. वृषभानु ललिहिं उर आनिये - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (44)

    श्री वृषभानुनन्दिनी (श्री राधा) को ही अपने हृदय में बसाओ । विकर्मों द्वारा नरक, सुकर्म द्वारा स्वर्ग एवं ज्ञान द्वारा मोक्षादि की व्यर्थ ही खाक क्यों छान रहे हो ?

  17. कोटिन ज्ञानिन मध्य कोउ प्रेम-सुधा-रस पाय - जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (28)

    करोड़ों ज्ञानियों में किसी बड़भागी को ही प्रेम सुधा रस प्राप्त होता है । जैसे सनकादि शुकादिक परमहंस ब्रजरस में डूब गये ।