परमानंद सागर

परमानंद सागर, श्री परमानंद दास द्वारा लिखित दोहों एवं पदों का संग्रह है । परमानंद दास जी श्री अष्टछाप कवीयों में से एक थे । रचयिता: श्री परमानंद दास

38 लेख उपलब्ध हैं

  1. यह माँगों गोपी-जन-बल्लभ - श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (1350)

    हे गोपीजनवल्लभ (श्री कृष्ण)! मैं आपसे बस यही वरदान माँगता हूँ की जब जब भी मुझे मनुष्य जन्म प्राप्त हो, श्री हरि की सेवा मिले और श्री ब्रजधाम का ही वास प्राप्त हो।

  2. बाँह डुलावति आवति राधा - श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (826)

    श्री राधा अपनी भुजाएँ डुलाती (मटकाती) हुई आ रही हैं। वे अपने कमल-समान मुख को ढके हुए हैं और उसे पूरी तरह नहीं खोलतीं; उनके माथे का तिलक भी आधा मिट गया है।

  3. तनक सोहागो डारिकें जड़ कंचन पिघलाय - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर

    जिस प्रकार सोने (सुवर्ण) पर तनिक सा सुहागा डालने पर जड़ सुवर्ण भी पिघल जाता है, तब श्री राधा तो सदा सुहागिन हैं, उनके स्वरूप को देखकर श्री कृष्ण का पिघलना (ललचाना) तो स्वाभाविक ही है।

  4. चलि राधा! तोकौं स्याम बुलावै - श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (1194)

    सखी श्री राधा से कह रही है—“हे श्री राधे! चलो, तुम्हारे प्रियतम श्यामसुंदर तुम्हें बुला रहे हैं। ज़रा चलकर देखो, वे अपनी वंशी के मधुर स्वरों में तुम्हारे नाम का ही सुमधुर गान कर रहे हैं।”

  5. सहज प्रीति गोपालै भावे - श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (605)

    श्री गोपाल जी को केवल सहज प्रेम ही प्रिय है, जिसमें कोई बनावट नहीं होती। हे सखी, जब मैं अपने प्रियतम श्री कृष्ण का मुख देखती हूँ, तो उससे मुझे अपार सुख की प्राप्ति होती है, और जब वे नैन से नैन मिलाते हैं, तब तो आनंद की सीमा ही नहीं रहती।

  6. खेलत मदन गोपाल बंसत - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (1165)

    श्री मदन गोपाल आज बसंत खेल रहे हैं । उनके संग में नवल रसिक चूड़ामणि श्री राधिका हैं जिनके संग राधिका कंत श्री श्यामसुन्दर शोभायमान हैं ।

  7. आनंद सिंधु बढ्यौ हरि तन में - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (551)

    श्री राधा के शरद पूर्णिमा के चन्द्र के समान मुख को देखकर, श्री कृष्ण के श्री अंगों में आनंद का सिंधु ऐसा उमड़ने लगा कि वह आनंद का समुद्र लहर बनकर ब्रज वृंदावन में बह चला ।

  8. कौन रसिक है इन बातनि कौ - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (1001)

    ऐसा कौन रसिक है जो इन बातों को समझ सकेगा; हे सखी, रसिक शिरोमणि नंदनंदन (कृष्ण) के अतिरिक्त ऐसा कौन है जो मेरे तन के दुखों (वियोग) को समझ सकता है ?

  9. अलकलड़ी मोहन की जोरी - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (800)

    अलकलड़ी श्री राधा एवं मनमोहन श्री कृष्ण की जोड़ी अद्भुत शोभायमान है । रस की खान श्री कृष्ण नंद जू के दुलारे हैं एवं उनकी नित्य दुल्हन श्री राधा वृषभानु जी की दुलारी हैं ।

  10. श्रीघनश्याम मनोहर मूरति करत विहार वृन्दावन - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर

    श्री परमानंद दास के आराध्य मुरली-मनोहर श्री कृष्णचंद्र वृंदावन में नित्य विहार करते हैं, जहाँ वे दिन-रात हृदय को मोह लेने वाली दिव्य लीलाओं में रत रहते हैं।

  11. तन मन नवल जुगल पर वारौं - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (1346)

    अपने तन मन को दिव्य युगल श्री राधा कृष्ण पर समर्पित करता हूँ । मैं बार-बार गौर श्याम वर्ण की युगल जोड़ी को कुंज के भीतर किसी द्वार से निहारता रहूँ ।