यह माँगों गोपी-जन-बल्लभ - श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (1350)
हे गोपीजनवल्लभ (श्री कृष्ण)! मैं आपसे बस यही वरदान माँगता हूँ की जब जब भी मुझे मनुष्य जन्म प्राप्त हो, श्री हरि की सेवा मिले और श्री ब्रजधाम का ही वास प्राप्त हो।
परमानंद सागर, श्री परमानंद दास द्वारा लिखित दोहों एवं पदों का संग्रह है । परमानंद दास जी श्री अष्टछाप कवीयों में से एक थे । रचयिता: श्री परमानंद दास
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हे गोपीजनवल्लभ (श्री कृष्ण)! मैं आपसे बस यही वरदान माँगता हूँ की जब जब भी मुझे मनुष्य जन्म प्राप्त हो, श्री हरि की सेवा मिले और श्री ब्रजधाम का ही वास प्राप्त हो।
श्री राधा अपनी भुजाएँ डुलाती (मटकाती) हुई आ रही हैं। वे अपने कमल-समान मुख को ढके हुए हैं और उसे पूरी तरह नहीं खोलतीं; उनके माथे का तिलक भी आधा मिट गया है।
श्रीकृष्ण जन्म के कारण ब्रज मण्डल में अतिशय कोलाहल हो रहा है । सभी ग्वाले आनन्द मग्न होकर परस्पर ताली बजाते हुए नाच रहे हैं।
जिस प्रकार सोने (सुवर्ण) पर तनिक सा सुहागा डालने पर जड़ सुवर्ण भी पिघल जाता है, तब श्री राधा तो सदा सुहागिन हैं, उनके स्वरूप को देखकर श्री कृष्ण का पिघलना (ललचाना) तो स्वाभाविक ही है।
हे विधाता! मुझे वृंदावन का मोर क्यों नहीं बनाया? जहाँ मैं गोवर्धन पर्वत पर वास करता और नंदकिशोर श्रीकृष्ण को निहारा करता।
सखी श्री राधा से कह रही है—“हे श्री राधे! चलो, तुम्हारे प्रियतम श्यामसुंदर तुम्हें बुला रहे हैं। ज़रा चलकर देखो, वे अपनी वंशी के मधुर स्वरों में तुम्हारे नाम का ही सुमधुर गान कर रहे हैं।”
आज दीपावली का शुभ दिन है । ब्रज की युवतियाँ नंदनंदन श्रीकृष्ण के आँगन में आनंदपूर्वक मंगल गीत गा रही हैं और आँगन को सजा रही हैं।
श्री गोपाल जी को केवल सहज प्रेम ही प्रिय है, जिसमें कोई बनावट नहीं होती। हे सखी, जब मैं अपने प्रियतम श्री कृष्ण का मुख देखती हूँ, तो उससे मुझे अपार सुख की प्राप्ति होती है, और जब वे नैन से नैन मिलाते हैं, तब तो आनंद की सीमा ही नहीं रहती।
अपनी बाहों को झुलाते हुए, श्री राधा आ रही हैं। उनका कमल के समान मुख आधा ढका हुआ है, जिसके कारण उनका आधा तिलक मिटा हुआ है।
श्री मदन गोपाल आज बसंत खेल रहे हैं । उनके संग में नवल रसिक चूड़ामणि श्री राधिका हैं जिनके संग राधिका कंत श्री श्यामसुन्दर शोभायमान हैं ।
प्रेम तो एक जगह (एक से ही) ही करना चाहिए । यदि यह मन प्रभु के चरण कमलों को त्याग देगा, तो अनायास ही लक्ष्यहीन होकर संसार में भटकेगा ।
श्री राधा के शरद पूर्णिमा के चन्द्र के समान मुख को देखकर, श्री कृष्ण के श्री अंगों में आनंद का सिंधु ऐसा उमड़ने लगा कि वह आनंद का समुद्र लहर बनकर ब्रज वृंदावन में बह चला ।
नंद लाल श्री कृष्ण से प्रेम करो! वह ही केवल हैं जो अच्छे और बुरे समय में जीव के साथ सदा रहते हैं । उनकी कृपा से ही हम जीवित हैं ।
ऐसा कौन रसिक है जो इन बातों को समझ सकेगा; हे सखी, रसिक शिरोमणि नंदनंदन (कृष्ण) के अतिरिक्त ऐसा कौन है जो मेरे तन के दुखों (वियोग) को समझ सकता है ?
अलकलड़ी श्री राधा एवं मनमोहन श्री कृष्ण की जोड़ी अद्भुत शोभायमान है । रस की खान श्री कृष्ण नंद जू के दुलारे हैं एवं उनकी नित्य दुल्हन श्री राधा वृषभानु जी की दुलारी हैं ।
श्री परमानंद दास के आराध्य मुरली-मनोहर श्री कृष्णचंद्र वृंदावन में नित्य विहार करते हैं, जहाँ वे दिन-रात हृदय को मोह लेने वाली दिव्य लीलाओं में रत रहते हैं।
जिनके ह्रदय में भगवान् का नाम नित्य विराजमान है उनके पीछे बेचारी अष्ट-सिद्धि और नवों निधि मुख से लार टपकाते हुए फिरती हैं ।
अपने तन मन को दिव्य युगल श्री राधा कृष्ण पर समर्पित करता हूँ । मैं बार-बार गौर श्याम वर्ण की युगल जोड़ी को कुंज के भीतर किसी द्वार से निहारता रहूँ ।
आनंदकंद दुलारी श्री राधिका आ रही हैं जिनका बदन चंद्रमा के समान है, जिनके नयन मृग समान हैं एवं जो दामोदर [श्री कृष्ण] की प्यारी हैं ।
मेरा मन बांवरा हो गया है । यहाँ एक आकर्षक लड़का खड़ा था, उसके संग ही मेरा मन न जाने कहाँ चला गया ।