प्रेम की पीर - श्री भोरी सखी

प्रेम की पीर श्री भोरी सखी या भोलानाथ जी द्वारा लिखित भजनों का संकलन है। यह श्री हित हरिवंश महाप्रभु के अनुयायी हैं।

61 लेख उपलब्ध हैं

  1. जहँ राजत नवल निकुंजन प्यारी - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (157)

    नित्य-नवीन निकुंजों से सुशोभित रस-धाम श्री वृन्दावन में हमारी प्राणप्यारी श्री राधा सदा सर्वदा नित्य विहार परायण होकर विराज रही हैं। वे दिव्य रूप से सुशोभित हैं; जहाँ स्वयं श्री कृष्ण परम अनुरागवश उनके श्री चरणों में महावर लगाते हैं, और जहाँ अत्यंत लाड़-चाव के साथ उनकी सुंदर वेणी (चोटी) को सँवारकर बाँधते हैं।

  2. कण-कण पै वारौं यहाँ - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर, सोहनी महिमा (435.8)

    श्री हित भोरी सखी जी कहती हैं — अरी सोहनी! मैं इस वृन्दावन की पावन रज के कण-कण पर अपने कोटि-कोटि तन, मन और प्राण न्यौछावर कर देने को तत्पर हूँ और तू इस दिव्य रज को हटाकर दूर फेंकने का प्रयास कर रही है। तू किंचित विचार कर और मेरी इस बात को मान ले।

  3. लग्यौ नेह सब भाँति निभैहौ - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (415)

    हे प्यारी जू! आपसे मेरा जो यह प्रेम-संबंध जुड़ गया है, मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप इसे हर प्रकार से निभाएँगी। मेरे मन में यह दृढ़ भरोसा है कि आप अपने सहज स्वभाव के अनुसार जिसका हाथ पकड़ लेती हैं, उसे पूर्णतः अपना बना लेती हैं; अर्थात् आप अपने शरणागत की लाज अवश्य रखेंगी । [1]

  4. करुणा भरे प्रिया दृग तोरैं - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (76)

    हे श्रीप्रियाजू ! आपके नेत्रों में करुणा का सागर भरा हुआ है, जिसमें स्वाभाविक रूप से कृपा की ऊँची-ऊँची तरंगें उठती रहती हैं, जिन्होंने तीनों लोकों को रस से सराबोर कर दिया है।

  5. कोटि विश्व ऐश्वर्य सुख - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर, सोहनी महिमा (435.10)

    श्रीहित भोरीसखी जी कहती हैं कि अरी सोहनी ! करोड़ों विश्व के वैभव से प्राप्त होने वाला सुख, इस वृन्दावन की रज के एक कण की समता नहीं कर सकता है। इस रज को झाड़कर फेंकना तू अपना एक खेल मात्र ही समझती है, जब कि यह मेरी प्राण संजीवनी है।

  6. कौंन भाग्य भरि नैंन निहारौ - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (267)

    हे प्यारी जू! मेरा ऐसा भाग्य कब उदित होगा कि मैं अपने नेत्रों से आपके दर्शन करूंगीं? आपके श्रीचरणों की नख रूपी चन्द्रमाओं की परम अद्भुत चाँदनी को देखे बिना, मुझे तो इस संसार में सर्वत्र अँधेरा ही अँधेरा नजर आ रहा है।

  7. कबहूँ तौ लाड़िली ऐसी कृपा करौ री - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (348)

    हे श्री राधा! आप मेरे ऊपर कभी तो ऐसी कृपा करो कि जब आप एक कुंज से दूसरी कुंज में जाने के लिये जो रास्ता अपना रही हों, मैं उस रास्ते पर लेट जाऊँ और आपके श्रीचरण मेरे हृदय के ऊपर पड़ जाँय ।

  8. प्रीति की बाजी खेलिये प्यारी - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (104)

    हे प्यारी जू! आप मेरे साथ प्रीति की बाजी लगायें। मैं यह जानती हूँ कि मेरी प्रीति कच्ची और आपकी प्रीति सच्ची है; अतः मेरा हारना और आपका जीतना निश्चित ही है। मैं आपसे निवेदन करती हूँ कि आप बाजी जीतकर मुझे अपनी आज्ञा पालन करने वाली दासी बना लें।

  9. रसिक संग बिनु प्रेम न होई़ - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (162)

    प्रेम-रस के अनन्य उपासक अर्थात् रसिक संतों के संग के बिना हृदय में अति दुर्लभ प्रेम की उत्पत्ति नहीं हो सकती और जब तक अलबेली स्वामिनी श्रीराधा के चरण-कमलों में सहज प्रीति नहीं होगी, तब तक सांसारिक बन्धनों से छुटकारा मिलना असम्भव ही है।

  10. कोटि जन्म लगि यह हठ मोरी - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (331)

    हे करुणा की अगाध समद्र, श्री राधा प्यारी जू! अब आपके चरण कमलों के अतिरिक्त मेरी अन्य कोई अभिलाषा नहीं है, चाहे उनको प्राप्त करने के लिये मुझे करोड़ों जन्म ही क्यों न लेने पड़ें। यही मेरा दृढ़ निश्चय है।

  11. जीवन सफल कमल पग पेखे - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (53)

    हे श्रीराधे! आपके चरण-कमलों के दर्शन प्राप्त करने पर, मैं अपने जीवन को परम सफल अनुभव करूँगी। उस समय मुझे, श्रुतियों द्वार प्रतिपादित मार्ग पर चलना, संयम-नियम आदि अध्यवसाय करना तथा अनेकानेक साधनों को अपनाना - ये सभी निरर्थक प्रतीत होने लगेंगे।

  12. सुख अपनौ चाहै नहीं - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (443.2)

    है श्री राधा! स्वयं का सुख न चाहकर आपको सुख पहुँचाना ही प्रीति की रीति है। परंतु मेरे ये लालची नेत्र, आपके दर्शन की लालसा से, प्रति पल लालच में भर कर, बर्बस अनीति करते रहते हैं ।

  13. महिमा अमित कही न परै - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (33)

    हे श्री राधे! तुम्हारी अगाध महिमा कहते नहीं बनती । जो शिव, एवं ब्रह्म भगवान श्री कृष्ण के चरणों की रज चाहते हैं, वही श्री कृष्ण तुम्हारे चरणों में पड़े रहते हैं ।

  14. ऐसौ स्वपन मोहि अति भावै - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (112)

    हे प्यारी जू [श्री राधा]! मेरे मन को ऐसा स्वप्न देखना बहुत अच्छा लगता है, जिसमें मन को मोहने वाली आपकी सुंदर छवि, मेरी आँखों के आगे आकर खड़ी हो जाए और मंद मंद मुस्कुराए ।

  15. श्री यमुना के नीर लौं दिन दिन आपहि आप - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (443.4)

    हे प्यारी जू! आपके दर्शनाभाव में मेरे नेत्रों से अश्रुधारा उसी प्रकार निरंतर बहती रहती है, जैसे श्री यमुना का जल प्रतिदिन बहकर नवीन रूप में प्रवाहित होता रहता है।

  16. लटकि रहै मन लटकी लट सौं - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (32)

    श्री प्रिया जी के मुखारविन्द पर आ गई घुँघराली अलकों में श्री लाल जी का मन झूलता-झूमता रहता है । प्रेम के रंग में रँगी हुई श्री प्रिया जी, विविध प्रकार के रंगों से भरे हुए यमुना के किनारे को, एक क्षण के लिये भी छोड़कर, अन्यत्र कहीं नहीं जाती हैं ।

  17. कब बसिहौं ब्रज कुंजन माहीं - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (143)

    हे प्यारी जू ! मुझे ब्रज की कुंज निकुंजों में निवास करने का सुयोग कब मिलेगा ? ऐसा कब होगा कि मैं हिरण बनकर हिरण जैसे नेत्रों वाली आपको श्रीवन में निरन्तर कदम्ब वृक्षों से गुज़र कर ढूँढ़ती रहूँगी ।

  18. सुनहु कृपालु किशोरी ऐसी, आसा कौन पुजैहै - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (419)

    हे परम कृपालु किशोरी राधा! मेरी बात सुनिए! मेरी आशा को आपके अतिरिक्त कोई भी पूर्ण नहीं कर सकता है। आपके अतिरिक्त और कौन है जो मेरी बाँह पकड़कर मुझे अपना बना ले।

  19. अब तौ क्या इस छबि पर वारौं - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (459)

    श्रीहित भोरीसखी जी कहती हैं कि मैं हमेशा यही सोचती रहती हूँ कि प्रेम की अद्वय युगल मूर्त्ति श्रीहित लाड़िली-लाल के अद्भुत सौन्दर्य सम्पन्न रूप की अनुपम शोभा पर क्या न्यौछावर किया जाय ।