यस्याः स्ववशगः कृष्णो - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (1.104)
रसस्वरूप श्रीकृष्ण सदा श्रीराधारानी के अधीन रहकर उनके रस की वृद्धि करते रहते हैं, उनके नेत्रों के कटाक्ष और भृकुटि-विलास के अनुसार (भौंहों के संकेत पर) सदा कठपुतली की भाँति नृत्य करते हैं।
