श्री राधा सप्तशती

श्री राधा सप्तशती श्री वागीश शास्त्री द्वारा लिखित श्री राधा की महिमा पर सात सौ श्लोकों का संग्रह है।

22 लेख उपलब्ध हैं

  1. यस्याः स्ववशगः कृष्णो - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (1.104)

    रसस्वरूप श्रीकृष्ण सदा श्रीराधारानी के अधीन रहकर उनके रस की वृद्धि करते रहते हैं, उनके नेत्रों के कटाक्ष और भृकुटि-विलास के अनुसार (भौंहों के संकेत पर) सदा कठपुतली की भाँति नृत्य करते हैं।

  2. पुज्यं तच्चरणं ब्रजेन्द्रविपिनं - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.44)

    वे चरण परम पूज्य हैं, जो श्रीव्रजेन्द्रनन्दन के क्रीड़ा-कानन श्रीवृन्दावन की यात्रा करते हैं। वह रसना धन्य है, जो इस रसमन्दिर वृन्दावन की स्तुति करती है। वह हृदय परम पवित्र है, जो इस परम मनोरम विपिन का सदा चिन्तन करता है। तथा जो मनुष्य श्रीवृन्दावन में निवास करता है, वह तो ब्रह्मा और शिव आदि के लिए भी सम्माननीय है।

  3. तादत्ते्ऽर्पितवस्तूनि राधासंकेतमन्तरा - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (1.45)

    श्रीकृष्ण को अर्पित की गई वस्तुओं को भी वे श्री राधा के संकेत के बिना स्वीकार नहीं करते। श्री राधा के बिना केवल श्रीकृष्ण की आराधना को दोषकारक माना गया है।

  4. वृन्दावनं तद्गतवस्तुजातं सर्व नमस्यं - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधासप्तशती (5.54)

    श्रीवृन्दावन और उसकी समस्त वस्तुएँ नमस्कार करने योग्य हैं। उनकी निन्दा कभी नहीं करनी चाहिये । जो निन्दा करते हैं, उन अपराधियोंका संग मुझे स्वप्न में भी प्राप्त न हो ।

  5. वृन्दारण्यलतागृहेषु वसतां गोविन्दलीलासुधा - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधासप्तशती (5.65)

    जो श्रीवृन्दावनके लता-गृहों में निवास करते हैं, श्रीगोविन्दकी लीलासुधाको पान करके अविरल अश्रु बहाते रहते हैं, (निरन्तर) प्रेम से सुमधुर श्रीराधा-नाम का गान करते हैं, अधखुले नेत्रों से श्रीवृन्दावन की गलियों में विचरते है तथा जिनको अपने शरीरकी किंचिन्मात्र भी सुध नहीं है, अतएव जो कभी लड़खड़ाते हैं, कभी भावावेश में गिर भी जाते हैं ऐसे (प्रेमोन्मत्त) महात्माओंका जो जीवन हैं, वही वास्तव में धन्य जीवन है !

  6. रे चित्त मा त्यज वनं वृषभानुजाया - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधासप्तशती (5.61)

    हे चित्त ! तुझसे मेरी एकमात्र यही प्रार्थना है कि तू श्रीवृषभानुनन्दिनी (श्री राधा) के इस श्रीवृन्दावन धाम को कभी न छोड़ना। यदि तुझे ब्राह्मण से लेकर श्वपच पर्यन्त के घर सदैव भिक्षा माँगनी पड़े तो माँग लेना और उनके उच्छिष्ट को भी खा लेना; परंतु श्रीवृन्दावन से बाहर अन्य स्थान मे कदापि न जाना ।

  7. रे चित्त चिन्तय चिरं वृषभानुपुत्रिं - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधासप्तशती (7.67)

    अरे मेरे चित्त! तू सदा श्री वृषभानु नंदिनी श्रीराधा का ही चिन्तन किया कर — उन्हें एक क्षण के लिए भी कभी न भूलना, यही मेरी अभिलाषा है। हे रसने! तू ‘राधा’ — इस सरस, मधुर नाम का जप निरंतर करती रह तथा हे देह ! तू श्रीराधा की परम पावन चरण-रज से लिप्त होकर, इस रसरूपा श्री वृंदावन में सदाकाल प्रेमपूर्वक निवास कर।

  8. निरञ्जनं निर्गुणमद्वितीयं वदन्ति - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.63)

    विद्वान् लोग परम तत्त्वको निरञ्जन, निर्गुण और अद्वितीय बताया करते है; उनके लिये वह तत्त्व वैसा ही हो। परंतु मैंने तो अपने लिये श्रीवृन्दावनको ही परम तत्त्व निश्चित किया है; क्योंकि उसका श्रीअंग श्रीराधा के श्रीचरण-चिह्नोंसे भूषित है ।

  9. न विषय भोगो भाग्यं कीर्तिर्वा विस्तृता लोके - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.62)

    विषय-भोगों का बहुलता से सुलभ होना सौभाग्य नहीं है, संसार में कीर्ति का विस्तार हो जाए—यह भी सौभाग्य नहीं है। असली सौभाग्य है श्रीवृन्दावन वास प्राप्त हो जाए, जिसकी ब्रह्मा-इन्द्र आदि भी अभिलाषा करते हैं ।

  10. अर्धोन्मीलितलोचनस्य पिबतो राधेति नामामृतम् - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.35)

    अधखुली आँखों से देखता, ‘श्रीराधे! श्रीराधे!!’ इस नाम-अमृत का पान करता, नेत्रों से प्रेम के आँसू बहाता, सारे अंगों से पुलकित होता, कहीं लड़खड़ाता, कहीं गिरता और पड़ता हुआ मैं (देह की सुध-बुध खोकर) श्रीवृंदावन की गलियों में स्वच्छंद विचरूँ और इसी अवस्था में मेरे परम सुखदायक दिन व्यतीत हों—ऐसा शुभ समय कब आएगा?

  11. तेनापि सहसा प्रोक्तं तत्र वासेऽतिदुष्कर - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (1.21)

    श्री वृंदावन में वास करना बहुत कठिन कार्य है क्योंकि धाम में रहने पर जो धाम अथवा धाम वासियों में दोष देखने लगते हैं वे पतित हो जाते हैं।

  12. योऽभूद् व्रजस्योज्ज्वलकामकेल्या - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.33)

    हे श्रीवनराज (श्री वृंदावन)! तुम्हारी रसरंगमयी भूमि में जो ब्रज की उज्जवल कामकेली का रास-रसोत्सव हुआ था, उस रस को श्री राधा और श्री कृष्ण तुम्हारे बिना (वृंदावन के अभाव में) कुरुक्षेत्र में परस्पर मिलकर भी नहीं पा सके। (अर्थात् हे वृंदावन, इस रस के तो एक मात्र तुम्हीं अधिष्ठान हो)

  13. राधां ध्यायन् राधिकां वन्दमाना - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधासप्तशती (5.49)

    मेरी एकमात्र यही इच्छा है कि मैं (सदा) श्रीराधिका का ही ध्यान, श्रीराधिका की ही वन्दना, श्रीराधिका का ही दर्शन, श्रीराधिका की ही कीर्तन-कथाओं का श्रवण, श्रीराधा (नाम एवं गुणों) का ही गान तथा श्रीराधिका की ही सेवा करता हुआ श्रीराधिका के क्रीड़ा-कानन श्रीवृन्दावन में ही अपना यह (जीवन) काल व्यतीत करूँ।

  14. वस्तुतः प्रेयसी प्रेष्ठप्रेमामृतरसात्सकम्‌ - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (6.4)

    वास्तव में प्रिया श्री राधा एवं प्रियतम श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण के पारस्परिक प्रेम का जो आंतरिक अमृतमय रस है, वही श्री वृंदावन का स्वरूप है । इसीलिए यह वृंदावन रसिक जनों की प्रीति का विषय है ।

  15. वृन्दावननिवासेऽपि तद्रसानुभवं विना - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (6.3)

    अरे मित्र! रस का पिपासु रसिक भक्त तो श्री वृंदावन में निवास हो जाने पर भी, जब तक उस रस का स्वयं अनुभव न कर ले, तब तक कभी संतोष नहीं पाता।

  16. यस्याः स्फुरत्पदनखेन्दुततिच्छटाया - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (7.90)

    जिसके चमकते हुए श्रीचरण-नख-चन्द्रों की छवि की छटासे (क्षणभरमें) माधुर्य-सार-रसके करोड़ों महासमुद्रों की सृष्टि हो जाती है, वह श्रीराधा यदि कभी किसी जीवपर अपनी कृपा दृष्टि डाल दें तो वह धन्य हो जाय। (इसकी पहचान यह है कि उस जीवके लिये भुक्ति और मुक्ति दोनों नीरस हो जाती हैं, वह उन्हें चाहता ही नहीं)।

  17. राधा नामास्ति जिह्वाग्रे - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (7.91)

    जिसकी जिह्वा पर श्रीराधा-नाम आ गया, उसे किसी भी सुन्दर से सुन्दर साधन की आवश्यकता नहीं रहती; और यदि किसी को श्रीराधा-रस-सुधा का आस्वादन मिल गया तो उसके लिये दूसरे कोटि-कोटि साध्यों की भी क्या आवश्यकता है अर्थात् उसके लिए वे सब उत्तमोत्तम साध्य निरर्थक हो जाते हैं।

  18. शस्त्रवद्घातकं शास्त्रं - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधासप्तशती (7.105)

    जिसने श्रीराधा का यशोगान नहीं किया, वह शास्त्र शस्त्र के समान घातक है तथा जिसने श्री राधा के नाम और गुण नहीं गाये, वह मनुष्य गुण सम्पन्न होने पर भी कसाई के समान क्रूर है।

  19. राधे ते चरणौ विहाय शरणं - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधासप्तशती (7.69)

    हे श्रीराधे ! तुम्हारे श्रीचरणोंको छोडकर मुझे कहीं भी शरण नहीं मिली । मेरा तो सुदृढ़ विश्वास है कि इस भूमण्डल में एकमात्र आप ही सेवा करने योग्य हैं । अक्रूर ने आपका प्रियतम से वियोग करा दिया, तो भी आपने उनकी कभी निन्दा नहीं की। हे देवि ! विशुद्ध दया तो केवल आपमें ही देखनेको मिलती है ; क्योंकि आपके दृष्टि-पथ में किसी के दोष आते ही नहीं ।

  20. पलाशार्क करीलाद्या राधे राधे रटन्ति ताम् - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधासप्तशती (6.67)

    वृन्दावन के तृण, गुल्म और लता आदि सभी इनकी (श्रीराधारानी की) उपासना करते हैं। सखे! श्रीवृन्दावन में क्षुद्र चराचर जीव तथा आक, ढाक और करील आदि भी “राधे! राधे!” कहकर उनकी रट लगाये रहते हैं, फिर मनुष्यों की तो बात ही क्या।