राधा सुधा शतक

वृंदावन धाम के रसिक श्री हठी जी द्वारा राधा सुधा शतक को लिखा गया है।श्री राधा सुधा शतक में श्री राधा ठकुरानी की महिमा के गुणगान में सौ दोहे वर्णित हैं।

56 लेख उपलब्ध हैं

  1. लीने लली ललतादिक संग उमंग - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (61)

    श्री वृषभानु-दुलारी श्रीराधा अपनी ललिता आदि सखियों के संग अत्यंत उमंग के साथ सुंदर फुलवारी में पधारी हैं जहाँ मालती, कुंद, निवारी तथा गुलाब आदि विविध पुष्पों से सुसज्जित फुलवारी चारों ओर अपनी सुगंध बिखेर रही है।

  2. हेलीरी तैं लखे आजु के ख्याल - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (34)

    हे सखी! क्या तूने आज प्रिया-प्रियतम के उस अनूठे और कौतुकभरे विलास को देखा? मेरी बुद्धि इतनी सामर्थ्यवान नहीं कि मैं उसका पूरी तरह से बखान कर सकूँ। आज हमारी प्यारी श्री राधा जी के शीश पर मोरपंख सुशोभित है, और उनके हाथों में वंशी तथा लकुटी (लाठी) है, एवं उनकी कमर में पीताम्बर की डोरी बंधी हुई है (अर्थात् श्री राधा ने श्री कृष्ण का भेष धारण किया है)।

  3. बैठी रंग भरी है रंगीली रंग रावटी में - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (18)

    प्रेम-रंग से सराबोर, रंगीली श्री राधा रंगमहल-रूपी दिव्य मंडप में अद्भुत शोभा के साथ विराजमान हैं। ऐसी परम सिरताज महारानी की अनुपम सुंदरता का वर्णन शब्दों की सीमा में कैसे समा सकता है।

  4. जात रूप तखत पै बैठी रूप रासि राधे - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (25)

    रूप-सौंदर्य की अनंत राशि श्री राधा महारानी जब स्वर्ण-सिंहासन पर विराजती हैं, तो उनके अंगों की प्रभा स्वयं सूर्य के तेज को भी लज्जित कर देती है।

  5. गिरि-पति लागी मेरु - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (96)

    पर्वतराज हिमालय स्वयं मेरु पर्वत के अधीन हैं। मेरु पर्वत पृथ्वी के अधीन है। पृथ्वी का आधार शेषनाग, वराह, कच्छप और जलमय स्वरूप हैं — अतः पृथ्वी इन आधारों के अधीन है।

  6. बन्दौं पद पंकज सदा नंदनंदन ब्रजचंद - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (6)

    मैं सदा व्रजचंद्र नंदनंदन श्रीकृष्णचंद्र के चरण कमलों में वंदन करता हूँ, जिनकी कृपा से “राधा शत” (राधा सुधा शतक) का वर्णन कर रहा हूँ, और प्रार्थना करता हूँ कि मैं पुनः इस भवरोग बंधन में न पड़ूँ।

  7. रम्भा रमासी उमासी हठी विमला नवला - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (83)

    रम्भा, लक्ष्मीजी, पार्वतीजी, विमला, नवला, और रति (कामदेव की पत्नी) सभी श्री राधा के रूप-सौंदर्य को निहारकर मानो छली हुई सी स्तब्ध खड़ी रह जाती हैं।

  8. कर कंजन जावक दै रूचि सौं - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (6)

    प्रेम में पूर्णतया आसक्त होकर श्री कृष्ण अपने हाथों से श्री राधा के चरण कमलों में जावक लगाते हैं। ब्रज की प्यारी ठकुरानी, श्री राधा के कमल जैसे चरणों को सुंदर बिछुओं से सुसज्जित करते हैं।

  9. श्री वृषभानुकुमारि के पग बंदौ कर जोर - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (1)

    मैं दोनों हाथ जोड़ कर वृषभानु नंदिनी श्री राधा के चरणों का वंदन करता हूँ क्योंकि जिनके ह्रदय में, दिन-रात, उनके चरण बसते हैं वे श्री कृष्ण के संग ब्रज का वास प्राप्त करते हैं (अथवा उन्हें श्री कृष्ण ब्रजवास देते हैं)।

  10. चंद की कलासी, नवलासी सखी संगबारी - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (48)

    चन्द्र के समान, नवल सखियों के संग सुसज्जित श्री राधिका की छवि अद्वितीय है। स्वर्ग की अप्सरा रम्भा, लक्ष्मी, पार्वती देवी एवं अन्य ऐसी कौन सी देवी है जिसकी उपमा श्री राधा से की जाए (अर्थात् उनके समक्ष सबकी छवि फीकी दिखती है)।

  11. जोग जज्ञ जप तप कछूवै न साधे ऐसे

    श्री हठी जी महाराज कहते हैं कि मैंने कोई भी साधन नहीं किया, न योग किया न यज्ञ, न जप किया न तप, मैंने तो एकमात्र श्री राधारानी के चरण कमलों की ही आराधना की है।