रसिक मोहिनी

रसिक मोहिनी श्री प्रियदास द्वारा रचित वृंदावन एवं राधा कृष्ण की महिमा को समर्पित ग्रंथ है।

26 लेख उपलब्ध हैं

  1. निपट प्रबल साधन करें तऊ मिलै तन त्याग - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (8)

    श्री धाम वृन्दावन की अपार महिमा का वर्णन करते हुए श्री प्रिया दास जी कहते हैं कि कठिन साधनाओं से जहाँ अंत में केवल देह-त्याग ही होता है, भगवद्-प्रेम होना तो बहुत दूर की बात है; वहीं वृन्दावन-वास के प्रभाव से तन के कठोर साधन किए बिना देहाभिमान स्वतः ही गल जाता है और भगवद्-प्रेम की पाग (मगनता) स्वयं ही चढ़ जाती है।

  2. ढिंग विलास-गढ़ दान-गढ़ और मान-गढ़ नाम - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (23)

    बरसाना के विलासगढ़, दानगढ़ और मानगढ़ नामक दिव्य लीला-स्थलों में गौरवर्णी श्री राधा की प्रेम-घटा निरंतर उमड़ती रहती है, जहाँ श्री कृष्ण, चातक के समान, उस प्रेम-रस का निरंतर पान करते रहते हैं।

  3. प्रभुता दासी ह्वैं रहे - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (14)

    श्रीधाम वृंदावन वह भूमि है जहाँ साक्षात प्रभुता भी दासी स्वरूप धारण कर निवास करती है जिसका मूल ढूँढने से भी नहीं मिलता। जब कोई जीव इस श्री धाम में अनन्य भाव से वास करता है तो सम्पूर्ण सृष्टि उसके अनुकूल हो जाती है।

  4. लाख अंग हरि भक्ति के, चौसठ महा प्रकास - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (4)

    रसिकों ने श्री हरि भक्ति के लाखों अंगों में से चौंसठ अंगों को विशेष रूप से महत्वपूर्ण बताया है। उन चौंसठ में भी पाँच अंगों को अत्यंत विशेष माना गया है, और उन पाँचों में सर्वोत्तम है — श्री वृंदावन वास।

  5. रीझि परे छवि धाम पर करि नौंछावरि देह - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (20)

    जब कोई जीव श्री वृंदावन धाम से रीझकर स्वयं को श्रीधाम पर न्योछावर कर देता है, तब स्त्री, पुत्र, धन, घर आदि की आसक्ति उसे परम तुच्छ प्रतीत होने लगती है।

  6. तजि के सब पौरस प्रबल मानें तन गुण हीन - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (6)

    समस्त पौरुष बल और अहंकार का परित्याग करके, स्वयं को गुणहीन और असहाय मानते हुए, श्रीधाम वृंदावन में सदा ऐसे निवास करना चाहिए, जैसे कोई मछली जल में ही वास करती है।

  7. जब वृन्दावन धाम के प्यारे लागें रूष - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (19)

    जब श्रीधाम वृंदावन के वृक्ष लातायें-पताएँ आदि ह्रदय को प्रिय लगने लगती हैं तब समस्त सम्पति एवं भौतिक सुख तुच्छ लगते हैं और इनकी भूख स्वतः ही समाप्त हो जाती है ।

  8. फिरति रहे वन भूमि में झूमि नैन अकुलाय - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (21)

    मैं श्री वृंदावन धाम की परम पावन भूमि में आनंदपूर्वक झूमते हुए विचरण करूँ, जहाँ मेरे नयन सदैव दिव्य दंपति श्री राधा-कृष्ण के दर्शन की लालसा में व्याकुल रहें। वहाँ की रज में अपने तन को बार-बार लोटाऊँ, फिर उठकर प्रिया प्रियतम के अनुपम रूप और गुणों का प्रेमपूर्वक गान करूँ।​

  9. राधा वल्लभ लाल को दुर्लभ दरसन पाय - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (68)

    श्री राधा वल्लभ लालजी के दुर्लभ दर्शन केवल श्रीधाम वृंदावन की कृपा से सुलभ होते हैं, जिनके दर्शन पाकर शरीर प्रेम से रोमांचित हो उठता है।

  10. रसिक जननी के संग सों - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (83)

    जीव को हर स्थिति में रसिक संतों का संग सदा करते रहना चाहिए क्योंकि जो एकांत साधना से जीव के ह्रदय में भाव आता है वह रसिकों के संग से एक क्षण में आ जाता है ।

  11. कौन भूमि की माधुरी डोलनि परमानंद - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (60)

    ब्रज भूमि के अतिरिक्त ऐसी कौन सी भूमि है जिसकी ऐसी विशेष माधुरी है जहां पर परमानंद डोलता हुआ फिरता है । ऐसा कौन सा रसिक कवि है जो इसकी महिमा कहने में समर्थ है, इसे तो केवल ब्रज चन्द्र श्री कृष्ण ही जानते हैं ।

  12. ताते वृंदावन बसो वृंदावन लेवो नाम - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (99)

    यह मानव देह रूपी अत्यंत दुर्लभ संयोग है, अतः सर्वस्व त्यागकर श्रीवृंदावन का ही आश्रय लो, श्रीवृंदावन नाम का ही सुमिरन करो और एक पल के लिए भी इस रज का परित्याग मत करो; न जाने पुनः कब इस दिव्य धाम का सौभाग्य प्राप्त हो।

  13. श्री वृंदावन माधुरी मदलों चढ़ी विसाल - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (17)

    जब श्री वृंदावन की माधुरी का दिव्य प्रभाव हृदय पर छा जाता है, तब श्री राधा-मोहनलाल के अनुपम गुण, सौंदर्य और छवि का उफान भीतर उमड़ने लगता है।

  14. प्रेम सरोवर प्रेम सों पूरन परम रसाल - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (25)

    बरसाना स्थित प्रेम-सरोवर प्रेम से पूर्ण और परम रसाल है, जहाँ श्री राधा-कृष्ण के प्रेमाश्रु प्रवाहित हुए थे। उस दिव्य जल के तनिक से भावपूर्ण स्पर्श से साधक के हृदय में प्रिया-लाल बस जाते हैं।

  15. जो है तो में मति कछू वस वृन्दावन षेत - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (100)

    यदि भगवान की कृपा से अंतःकरण में थोड़ा भी विवेक प्रकट हुआ है, तो साधक को वृंदावन-रूपी रस-भूमि में ही निवास करना चाहिए, जहाँ अपनी सेज पर सोते हुए (विश्राम अवस्था) भी श्री हरि हृदय में प्रेम-भक्ति का संचार करते रहते हैं।

  16. प्रगट करी व्रज भूमि मधि श्री वृंदावन धाम - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (3)

    श्री प्रिया-प्रियतम ने ब्रज-भूमि के मध्य श्री वृंदावन धाम को प्रकट किया। इसके गुणों का वर्णन करते-करते रसिक संत भी थक जाते हैं, क्योंकि यह धाम सबके मन को मोहित कर लेता है।

  17. श्री बैकुंठ गोलोक लों गए परम रस चाह - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (18)

    जब तक मन में खान-पान, विषय-वासना और संसार के भौतिक सुख भोगों की लालसा बनी रहती है, तब तक श्री वृन्दावन धाम के वृक्ष और यहाँ की रज-वीथियाँ हृदय को प्रिय नहीं लगती।

  18. श्री बैकुंठ गोलोक लों गए परम रस चाह - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (93)

    परम रस की खोज में अनेक जन श्री वैकुण्ठ और गोलोक तक गए, किन्तु उस रस की पूर्ण तृप्ति न पाकर वे पुनः श्री वृन्दावन धाम लौट आए। यह वृन्दावन वह पावन स्थान है जहाँ प्रिया-प्रियतम के अगाध विहार रस का अनुभव होता है।