सिद्धांत के पद [श्री बिहारिन देव जी]
सिद्धांत के पद, ग्रंथ श्री बिहारिन देव जी की वाणी में श्री बिहारिन देव जू द्वारा लिखित सिद्धांत के पदों का संकलन है।
रचैयता: श्री बिहारिन देव जू
26 लेख उपलब्ध हैं
प्रभु जू हौं तेरा तू - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (35)
हे प्रभु! मैं केवल आपका हूँ और आप मेरे हैं। जब मेरे स्वामी मुझसे प्रसन्न हैं, तब यह संसार या कोई आलोचक मेरा क्या कर सकता है, चाहे लोग कितनी भी बातें क्यों न बनाते रहें।
सुनि मन मधुकर ज्ञान सिखाऊँ - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (40)
हे मन रूपी भँवरे! तू ठौर-ठौर पर डोल रहा है, अब मेरी बात सुन। मैं तुझे ऐसा ज्ञान दूँगा जिससे तेरी रुचि श्री चरण-कमलों में उत्पन्न होगी और तू अगाध सुख को प्राप्त करेगा।
हरि मोहिं यों अपनाय लियौ - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (118)
हे हरि! आपने मुझे ऐसे अपनाया कि जहाँ-जहाँ भी आपने मेरे जीवन में बाधाएँ देखीं, वहाँ-वहाँ आपने स्वयं ही उनका निवारण किया है ।
सुनि अहंकार भलौ न भिया - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (88)
हे भाई! मैं तुम्हें सत्य बता रहा हूँ कि किसी भी बात का अहंकार अच्छा नहीं होता। प्रभु के द्वारा दिए बिना, किसी को कुछ भी प्राप्त नहीं होता। अतः अपने या पराए के हानि-लाभ में तुम्हारा मन दुख-सुख क्यों मानता है?
स्याम सब ही के जिय की जानत हैं - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (107)
सबके स्वामी और सबके भीतर विराजमान श्रीबांके बिहारीजी सबके हृदय की बात भली भाँति जानते हैं । वे प्रत्येक व्यक्ति के अंतर्मन में उठने वाले सूक्ष्म से सूक्ष्म भाव और विचार को भी जानते हैं।
रुचे मोहिं ब्रजबासिन के टूक - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (142)
अब हमें इन ब्रजबासियों के ही घर-घर के टूक रुचते हैं, जो अभिमान अविद्या रूपी तृण के लिए मानो साक्षात अग्नि की ज्वाला स्वरूप हैं ।
संग न अब काहू कौ कीजै - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (108)
हे भाई! जगत में अब संग करने योग्य कोई नहीं रहा है । आज कल आध्यात्मिक जगत के जीव, अपने हाथों में माला लेकर नाम जप तो करते रहते हैं परंतु उनका उद्देश्य एवं ह्रदय का प्रेम तो कहीं और ही होता है, और साक्षात श्री हरि को ही धोखा देते रहते हैं । ऐसों का संग करने से क्या होना है ।
मेरौ मन श्रीवृन्दावन अटक्यौ - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (154)
मेरा मन श्री वृंदावन धाम में अटक गया है ।स्वामी श्रीहरिदास जी और श्री विट्ठल विपुल देव जी की कृपा से अब यह भूल कर भी इस निज महल श्री वृन्दावन धाम को छोड़कर कहीं इधर उधर नहीं भटकता । [1]
अब हौं कासौं बैर करौं - श्री बिहारिन देव , श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (98)
श्री बिहारीजी स्वयं अपने श्रीमुख से पुकार-पुकार के इस बात को कह रहे हैं कि "प्राणिमात्र के घट-घट में सदाकाल मैं ही विराजता हूँ, तब हम किससे वैर कर सकते हैं ?
को सरि करै हमारी राधा - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (151)
हमारी सर्वोपरि नित्यबिहारिनी स्वामिनी स्वरूपा श्री राधा की समानता कौन कर सकता है? यद्यपि श्री राधा नाम महात्म के आधार पर उपासक श्री राधा को एक समान ही समझते हैं, परंतु श्री राधा का भी सूक्ष्म से सूक्ष्म से अति सूक्ष्म रस है, अर्थात् श्री राधा के भी अन्य वैस [स्वरूप] इस अति अद्बुत नित्य विहार रस में बाधा ही हैं ।
जब तें प्रभुहिं नवायो माथ - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (129)
जो भी व्यक्ति सच्चे हृदय से एक बार श्रीबिहारीजी महाराज की शरण में आ जाता है, उसकी भविष्य की सारी जिम्मेदारी ये अपने ऊपर ले लेते हैं और उसका हाथ पकड़ कर, सुख ही सुख [रस] बरसाते हैं।
प्रीति न भली भजन बिन और - श्री बिहारिन देव जी
भजन के अतिरिक्त कहीं और प्रीति करना जीव की भलाई नहीं है । ऐसा कौन है जो एक मन को दो ठौर [जगह] लगाकर सुख प्राप्त कर सका है [ठौर अर्थात या तो संसार की भक्ति होगी या भगवान की, दोनों की एक साथ भक्ति असम्भव है] ?
को सरि करै हमारी राधा
सर्वोच्च स्वामिनी श्री राधा महारानी की तुलना किससे की जा सकती है [सर्वथा असम्भव]?
मेरे गति ब्रजपति कैं ब्रजवासी - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (145)
ब्रजवासी जन ही मेरे जीवन के एकमात्र शरण्य हैं, जो श्री राधा कृष्ण के निजी जन हैं। उनके प्राण जीवन धन एक मात्र श्री राधा श्यामसुंदर हैं, जो सदैव श्री वृंदावन में विलास परायण हैं।
मेरो मन एक ही ठौर भलौ - श्री बिहारिन देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (173)
मेरा मन तो एक ही ठौर लगा हुआ है [श्री राधा कृष्ण में], इसी में मेरी भलाई है । नित्य ही जागते और सोते एवं सपने में भी यह कहीं और नहीं जाता [एवं जाया करे] ।
मेरे विषै विसन वर वाम - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त के पद (132)
श्री बिहारिनदेव जी कह रहे हैं कि प्रेमी रसिको की चरण रज के प्रताप से मेरे प्राण और मन के विष (दुर्गुण) एवं व्यसन (दुराचरण) सर्वसिरोमनि, सर्वश्रेष्ठ एक मात्र श्री किशोरी जी के हो गए हैं। जो क्षण-क्षण नव-नवायमान नवकिशोरता से भरी, गौर छवि छटा है, तथा नवलकिशोरी श्री राधा जिनका नाम हैं। [1
कृपा मैं जानी अब ब्रज भूप - श्री बिहारिन देव जु, सिद्धान्त के पद (141)
हे ब्रजभूप! आपकी मुझ पर कितनी कृपा है, इस बात को अब मैं भली-भांति जान गया हूँ।
मोहिं ब्रजबासिन सों बनि आई - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की बानी, सिद्धान्त के पद (144)
श्री बिहारिन देव जी कहते हैं, कि ब्रजबासिन से हमारा प्रेम पुराना है, जिनके तन, मन में निरंतर एकमात्र श्री बिहारी-बिहारिनीजू का ही आसरा है, तथा जिन की कृपा से अद्भुत नित्य विहार का अवलोकन किया है। ऐसे ब्रजबासिन पर ही चारों प्रकार की मुक्ति एवं चार पदार्थ लोकों को ठुकरा दिया जा सकता है।
मेरे विषै विसन वर वाम - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की बानी, सिद्धांत के पद (132)
सर्वोपरि प्रेमियों की चरण रज यह वृन्दावन रज के प्रताप से मेरे प्राण और मन के विषय एवं विसन सर्वश्रेस्ठ वर वाम एक मात्र श्री नित्य बिहारिणी जू हो गयी हैं। वह छिन्न छिन्न नव नवायमान नव किशोरिता से भरी हैं, गौर छवि वारी हैं , अति भोरी हैं और राधा उनका नाम है। उनके अंग अंग को हम सोते जागते सतत निहारते रहते हैं।
मेरे गति ब्रजपति के ब्रजवासी - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की बानी, सिद्धांत के पद (145)
मेरी गति तो साक्षात् श्री बिहारी बिहारिनि जू के दृढ़ उपासक श्री ब्रजवासी ही हैं, जिनकी प्राण जीवनी धन एक मात्र श्री वृन्दाविपिन विलासिनी प्यारी जू श्री राधा हैं।