सिद्धांत के पद [श्री वंशी अलि]

सिद्धांत के पद श्री वंशी अलि द्वारा लिखित सिद्धांत के पदों का संकलन है।

20 लेख उपलब्ध हैं

  1. जय जय श्री बरसानों रससान्यौ - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (12)

    श्री बरसाना धाम की जय हो, जो रस का अथाह भण्डार है। श्री वृषभानु गोप का यह अद्भुत गृह समस्त दिशाओं में श्री कीर्तिदा जी के यश और महिमा का विस्तार कर रहा है।

  2. कुँवरि मोहे देहु बास बरसाने - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (25)

    हे वात्सल्यमयी लाड़ली किशोरी जी! आप अकारण करुणा करके मुझे अपने परम पावन और रसमय धाम श्री बरसाना में सदा के लिए अखंड वास प्रदान कर दीजिये। इस संसार के नश्वर और भजन-प्रतिकूल समस्त भौतिक वासनाओं का सर्वथा परित्याग करके, मैं केवल आपके भजन में लीन रहूँ और आपके दिव्य महल में सदा अनुरागपूर्वक निवास करता रहूँ।

  3. श्री ललिता सिखवत रस परिकर की - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (26)

    निकुंज-सेवा की आचार्या श्री ललिता सखी समस्त सखी-परिकर को दिव्य निकुंज-रस की पद्धति और रस-रीति का बोध कराती हैं। हे सखी! ऐसी कृपा हो कि मुझे वृषभानपुर (बरसाना) का वास मिले—यह मेरे मन की पूजित आशा है।

  4. जिहिं जिहिं अंगनि दृष्टि परतहो लडैती - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (35)

    हे प्यारीजू! तुम्हारे जिस-जिस अंग पर मेरी दृष्टि पड़ती है, मेरा मन वहीं ठहर जाता है। मैं तुम्हारी सौगंध खाकर यह कहता हूँ कि मैं तुम्हारा ही नित्य दास हूँ।

  5. प्रीतम कुंवारि चरन बिनु को है - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (24)

    श्री राधा की परम अनन्यता धारण किए हुए एक सहचरी कहती है कि मेरा प्रियतम (प्रेम/लाड़ लड़ाने योग्य) किशोरी जी के चरणों के अतिरिक्त और कौन है? सम्पूर्ण जग अपना-अपना स्वार्थ सिद्ध करता है, यहाँ प्रेम का लवलेश भी नहीं है और न ही इस मिथ्या जगत में वह वास्तविक सुख है जो श्री राधा के चरणों में है।

  6. मो निर्धन की ललिता संपति - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (34)

    मेरे जैसे निर्धन की सम्पत्ति श्री ललिता सखी ही हैं। मेरा हृदय एक क्षण के लिए भी उन्हें विस्मृत नहीं कर पाता; वह निरंतर उनसे बँधा रहता है और हर पल उनके संग झूमता है।

  7. श्री बिशोक नंदिनी बिनु कौहै - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (37)

    श्री बिशोक नंदिनी, श्री ललिता जी के अतिरिक्त और कौन है जो मेरे जैसे पतित जीव का उद्धार और निर्वाह कर सके? ऐसी अहेतुकी करुणा और अनंत दया तो केवल श्री ललिता सखी को ही शोभा देती है।

  8. प्रीति तौ श्री राधा ही सों कीजै - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (23)

    यदि प्रेम करना है तो श्री राधा से ही कीजिए क्योंकि वे ही जीवन और मरण में अर्थात् सदा साथ निभाने वाली हैं, जिनके बिना यह मनुष्य शरीर धारण करना व्यर्थ है।

  9. सुनो जी कानैं नूपूररो झनकार - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (32)

    श्री राधा जू के चरणों के नूपुर की झंकार को अपने कानों से सुना है । हे किशोरी लड़ैती जू, अब ऐसी कृपा हो कि आप मुझे अपना बनाकर, अपने परम अंतरंग नित्य विहार का दर्शन करवाओ ।

  10. नृपति निकुंज विहारनि रानी - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (18)

    निकुंज की महाराज श्री निकुंज बिहारिनी श्री राधा हैं । ऐसे निकुंज की श्री ललिता जी मंत्री हैं जिनके विभिन्न परिकरों की सेना है और वहाँ के सेवक श्री लालजी (कृष्ण) हैं ।

  11. सहचरि करै सोइ मोइ भावै - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (28)

    प्रिया प्रियतम का विहार सहचरी की इच्छा के अनुकूल ही होता है । जो ललिता जी करती हैं वही प्रिया प्रियतम को भाता है और जो प्रिया प्रियतम की इच्छा होती है वैसी कामना ललिता जी के ह्रदय में उत्पन्न होने लगती हैं ।

  12. सखी लालन को पयोष प्रिया-पद-रस प्याइ - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (7)

    सखियाँ श्री कृष्ण का पोषण श्रीराधिका के चरणों का रस पिलाकर करती हैं और श्री कृष्ण सखियों को श्रीराधा के गुणों का गान कर प्रसन्नता देते हैं ।