श्री वंशी अलि

श्री वंशी अलि (1707- 1765) वृंदावन के एक रसिक हैं। ऐसा माना जाता है कि साक्षात श्री ललिता सखी ने उन्हें उपासना एवम गुरु दीक्षा दी थी। उन्हीं की आज्ञा से प्रारंभिक कुछ वर्ष उन्होंने बरसना में भजन किया, पुन वह वृन्दावन आ गए । इन्होंने वृंदावन में ललित संप्रदाय की स्थापना भी की है। इनकी समाधी वृंदावन में यमुना किनारे पुराने रास मंडल के समीप है ।इनके ही कृपा पात्र श्री किशोरी अलि एवं अलबेली अलि जी हुए हैं।

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  1. अहो कुँवरि तुब रूप यह - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (5)

    हे किशोरी जी (श्रीराधा)! आपका यह अनुपम सौन्दर्य किसी भी मर्यादा का पालन नहीं करता। आपकी स्मृति मुझे अपनी सुध-बुध भुला देती है और मेरे हृदय के मर्मस्थल को प्रेम-बाणों से निरन्तर बींधती रहती है।

  2. जय जय श्री बरसानों रससान्यौ - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (12)

    श्री बरसाना धाम की जय हो, जो रस का अथाह भण्डार है। श्री वृषभानु गोप का यह अद्भुत गृह समस्त दिशाओं में श्री कीर्तिदा जी के यश और महिमा का विस्तार कर रहा है।

  3. बृजे सख्य रसा विष्ठा सख्या - श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (45, 46)

    ब्रज में सख्य रस में निमग्न श्री ललितादिक सखियाँ हैं जो श्री राधा के चरण-कमलों के बिना आधे पल का भी वियोग सहन नहीं कर सकतीं। वे श्री राधिका को ही अपना पति मानती हैं और सदा उन्हीं के आश्रय में रहकर नथ, कड़े, चूड़ियाँ, झलका आदि सौभाग्य-चिह्न धारण करती हैं।

  4. कुँवरि मोहे देहु बास बरसाने - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (25)

    हे वात्सल्यमयी लाड़ली किशोरी जी! आप अकारण करुणा करके मुझे अपने परम पावन और रसमय धाम श्री बरसाना में सदा के लिए अखंड वास प्रदान कर दीजिये। इस संसार के नश्वर और भजन-प्रतिकूल समस्त भौतिक वासनाओं का सर्वथा परित्याग करके, मैं केवल आपके भजन में लीन रहूँ और आपके दिव्य महल में सदा अनुरागपूर्वक निवास करता रहूँ।

  5. इतनी कहि हिय विवस ह्वै रुदन कियौ ब्रजवाल - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (14)

    श्री राधा और सखियों के महारास-विलास में, जब श्री राधा रानी सहसा अंतर्धान हो गईं, तब समस्त ब्रजवालाएँ उनके विरह में पूर्णतः भाव-विह्वल हो उठीं। इतना कहकर वे हृदय से विवश हो गईं और आर्त होकर रुदन करने लगीं। जैसे ही उन्होंने अश्रु-पूरित नेत्रों से अपनी प्राण-प्रिया श्री राधा को रो कर पुकारा, ठीक उसी क्षण, मुख-कमल पर मंद-मंद मुस्कान बिखेरती हुई श्री राधा जू वहाँ साक्षात् प्रकट हो गईं।

  6. लालन तन नैनन भरि चितई - श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (21)

    श्री कृष्ण (लाल) ने प्रिया जी के श्रीअंगों को नेत्र भरकर निहारा। उस रूप माधुरी को देखकर वे मूर्छित होकर गिर पड़े और अपनी देह की सुधि भुला दी; ऐसा प्रतीत हुआ मानो श्री राधा के कटाक्षों की नोक उनके हृदय के पार हो गई हो।

  7. भजन्ति राधिकां येतु ते- श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (91)

    जो श्री राधिका का नित्य भजन करते हैं, वे सदा श्री राधिका के समीप ही रहते हैं। वे एक क्षण के लिए भी उनसे विलग नहीं होते अथवा यों कहें कि वे अष्ट सखियों के ही अंशावतारी हैं।

  8. श्री ललिता सिखवत रस परिकर की - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (26)

    निकुंज-सेवा की आचार्या श्री ललिता सखी समस्त सखी-परिकर को दिव्य निकुंज-रस की पद्धति और रस-रीति का बोध कराती हैं। हे सखी! ऐसी कृपा हो कि मुझे वृषभानपुर (बरसाना) का वास मिले—यह मेरे मन की पूजित आशा है।

  9. मोसों हँसि हो लाडिली हौं हँसिंहों तेहि सँग - श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (40)

    मेरे साथ श्रीलाड़िलीजी (राधा) हँसती-खेलती हैं और मैं भी उनके साथ हँसती हूँ। जब वे प्रेम में भरकर मुझे गुदगुदी करके हँसाती हैं, तब मैं भी उनके अंगों को गुदगुदी कर देती हूँ।

  10. कुंज महल रंग हो हो होरी - श्री वंशी अली जी, वर्षोत्सव, बसंत के पद (15)

    निकुंज रूपी महल में होली के रंगों की धूम मची हुई है, जहाँ नित्य किशोर श्री कृष्ण और नित्य किशोरी श्री राधा प्रेम की होली खेल रहे हैं। ताल, मृदंग, झाँझ और ढप जैसे वाद्य यंत्र बज रहे हैं और झोलियों से भर-भर कर अबीर और गुलाल उड़ाया जा रहा है।

  11. श्रीराधा भजनीया च तद्‌भक्तकानां - श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (97)

    श्री राधा का भजन करना और उनके अनन्य भक्तों का संग करना चाहिए। बुद्धिमानों को यह नित्य करना चाहिए, जिससे किशोरीजी के चरणों में भक्ति दृढ़ होती है — यही सिद्धान्त का मत है।

  12. निरये स्थिति रेवास्तु - श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (101)

    भले ही मुझे नरक का वास मिले, भले ही कभी भी परम पद की प्राप्ति न हो, जहाँ-तहाँ कहीं भी जन्म मिलता रहे—परंतु श्री राधा के चरणों की अनन्य भक्ति अथवा उन श्री चरणों की सेवा से मेरा मन कभी भी विचलित न हो।

  13. श्री वृषभान कुमार नित नाम कुँवर नंदनन्द - श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (4)

    श्रीवृषभानु-कुमारी श्रीराधा एवं नन्दनन्दन श्रीकृष्ण सदा नित्य-विहार-रस में निमग्न रहते हैं और अपनी सखियों के हृदयों को आनन्दरस में अभिषिक्त करते रहते हैं।

  14. नित्यं भक्तपराधीना तेन राधा बिहारिणी - श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (21)

    श्री राधिका महारानी नित्य ही भक्त के आधीन हैं। श्री कृष्ण उनके अनन्य भक्त हैं, उनकी भक्ति के आधीन होकर, स्वामिनीजी समान भाव से, श्री कृष्ण के संग विहार करती हैं । अपने भक्त की रुचि के अनुसार ही स्वामिनी जी उस रस से ही भक्त को भी भजती हैं।

  15. किं करिष्यन्ति नो वेदा - श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (102)

    श्री राधा के अनन्य भजन में न मुझे वेद–शास्त्र की आज्ञा की आवश्यकता है और न ही किसी अन्य देवता या ईश्वर को प्रसन्न करने अथवा उनसे भयभीत होने की आवश्यकता है। चाहे वे मेरे लिए शुभ हों या अशुभ — मुझे इसकी कोई परवाह नहीं । मुझे तो केवल स्वामिनीजी की चरण–सेवा चाहिए, जो देवताओं की कृपा या वेद–विधान से नहीं, केवल श्री राधा महारानी की कृपा से ही प्राप्त होती है।

  16. जिहिं जिहिं अंगनि दृष्टि परतहो लडैती - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (35)

    हे प्यारीजू! तुम्हारे जिस-जिस अंग पर मेरी दृष्टि पड़ती है, मेरा मन वहीं ठहर जाता है। मैं तुम्हारी सौगंध खाकर यह कहता हूँ कि मैं तुम्हारा ही नित्य दास हूँ।

  17. न लोकाच्च भयं किंचित न - श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (99)

    श्री राधा के चरणों की भक्ति में ऐसा कमाल है कि न तो लोक का कोई भय रह जाता है, न ही वेद-शास्त्र आदि के बंधनों का कोई भय रहता है। इतना ही नहीं, ऐसे अनन्य श्री चरणों के भक्त को किसी विशेष संप्रदाय को धारण करने की इच्छा भी नहीं रहती। उसे तो केवल श्री राधा के चरणों की अनन्य एवं निष्काम भाव से सेवा करने की ही एकमात्र लालसा रह जाती है।