याही रस-मय नाम सौं राखत प्रेम अपार - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (94.2)
जिसके प्रभाव के सामने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे चारों पुरुषार्थ भी तुच्छ प्रतीत होते हैं, उस परम रसमय “राधा” नाम से श्रीकृष्ण अपार प्रेम रखते हैं।
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जिसके प्रभाव के सामने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे चारों पुरुषार्थ भी तुच्छ प्रतीत होते हैं, उस परम रसमय “राधा” नाम से श्रीकृष्ण अपार प्रेम रखते हैं।
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये उत्तम चार पुरुषार्थ यदि जगत में अत्यन्त उत्कृष्ट माने भी जाते हों, तो वे भले ही बने रहें। मुझे तो उनकी व्यर्थ चर्चा करने की भी तनिक अभिलाषा नहीं है।
एक सखी कहती है कि हे प्रियतम ! यह तो बताओकि तुमको रसिक बनाया किसने है? तुम पूर्व शूकरावतार में अपने सौन्दर्य के बल पर कब 'मदन मोहन' कहलाये थे? मत्स्यावतार में तुमने मछली का शरीर धारण करके जल ही में रहते हुए कब गोपियों का चीर हरण किया था?
जैसे दूध का सार तत्व घी होता है, वैसे ही समस्त धामों में वृन्दावन परम श्रेष्ठ है। जैसे सम्पूर्ण देह का आधार प्राण है, वैसे ही सब धर्मों का सार, मूल और प्राण स्वरूप तत्त्व हरि-भक्ति ही है।
अब मेरा मन श्री राधा-कृष्ण के युगल चरणों में अटक गया है। इस संसार में मैंने अनगिनत जन्म लिए और धर्म-कर्म की उलझनों में भटकता रहा।
प्रिया-प्रियतम के एकान्तिक एवं अखंड नित्य विहार रस रूपी भक्ति-भाव का सतत पालन करने वाला स्वामी श्री हरिदास जी का सर्वोपरि प्रेम-धर्म, सुमेरु पर्वत के समान अत्यंत ऊँचा है। इसके समक्ष अन्य नाना धर्म तो मानो डूँगरी (छोटी पहाड़ी) के समान तुच्छ प्रतीत होते हैं।
श्री हित हरिवंश जी श्री राधा के चरण-कमलों के सुदृढ़ उपासक हैं, अर्थात् उनकी उपासना का मुख्य आधार केवल श्री राधा चरणों की आराधना ही है । वे सदा निकुंज की मधुर केली लीलाओं में संलग्न युगल दंपति की परम खवासी (सेवा) करते हैं ।
प्रियतम श्री लाल जी (श्री कृष्ण) की यही प्रतिज्ञा है कि वे सदा प्रेम के वशीभूत ही रहते हैं, किन्तु प्रेम से विहीन कोटि-कोटि धर्माचरण करने वालों की ओर दृष्टि उठा कर भी नहीं देखते ।
कोई तो विद्या, वेद, विधि-विधान में, कोई धन, धर्म, कर्मकांड आदि कार्यों के जालों में जकड़े हुए हैं। कोई यम-नियम, संयम-व्रत तथा जप-तप आदि में, तो कोई-कोई उदासीन पथ में ही भ्रमते डोलते हैं।
रसिक चूड़ामणि श्री कृष्ण से जहां के राजा हैं एवं सखियों की मुकुट मणि श्री राधा जहां की महारानी हैं।
साधक को जिस इष्टदेव (श्री राधा कृष्ण) की उपासना प्राप्त है, उसे केवल उन्हीं को प्राप्त करने की इच्छा बनानी चाहिए। उन्हीं के नाम, रूप, लीला एवं गुणों का गान करना चाहिए।
एक नित्य विहार का अनन्य उपासक कहता है कि कर्म, धर्म, ज्ञान, विज्ञान एवं नाना प्रकार की भक्ति को हम अपने ह्रदय में आने नहीं देते । और तो और वेद प्रतिपादित तत्व, साक्षात श्री वैकुण्ठनाथ, भगवान श्री राम, एवं श्री व्रजेंद्र नंदन श्री कृष्ण आदि भगवत स्वरूप का भी हम बखान नहीं करते ।
श्री वृंदावन धाम प्रेम की राजधानी है जहां के राजा नायक शिरोमणि श्री श्याम सुन्दर और रानी तरुणि-मणि श्री राधिका हैं । पाताल से वैकुंठ तक के सब लोकों का स्वामी यह वृंदावन धाम है ।
ठौर-ठौर पर श्रद्धा रखने वाले जन सर्वोपरी नित्य-विहार-रस रूपी हीरे को ललचाते हैं, परंतु उन्हें इस वस्तु के स्वरूप का ठीक से ज्ञान नहीं है; अर्थात् वे अनन्य धर्म के मर्म को नहीं जानते। इस नित्य-विहार-रस में प्रवेश बिना अनन्य धर्म का पालन किए कदापि नहीं हो सकता।
जब तक हृदय में सच्चा प्रेम प्रकट नहीं होता, तब तक वर्णाश्रम धर्म, व्रत और नियमों का बंधन गले की फाँसी के समान बना रहता है। प्रेम के उदय होते ही ये बाह्य बंधन स्वतः शिथिल हो जाते हैं।
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थों सहित समस्त सुख प्रदान करने वाले श्री गोवर्धनधर प्रभु श्रीकृष्ण ही गोकुल के त्राता और भक्तों के रक्षक हैं; अतः उनकी ही शरण ग्रहण करनी चाहिए।
श्री कृष्ण का प्रेमपूर्वक कीर्तन करने से जो सुख (रस) प्राप्त होता है, वह जप, तपस्या और करोड़ों तीर्थों में स्नान करने से भी नहीं प्राप्त होता ।
यद्यपि ब्रज की गोपिकाएँ योग, यज्ञ, जप, तप, तीर्थ, ज्ञान, धर्म, व्रत और नियम आदि में प्रवृत्त नहीं थीं, फिर भी श्रीकृष्ण ने उन्हें केवल उनके निष्काम और अनन्य प्रेम के पर बल ही अपना सर्वाधिक प्रिय स्वीकार किया था।
श्री हित ध्रुवदास जी रसिक उपासकों को उपदेश करते हैं कि तुम श्री राधावल्लभ का ही भजन करो, केवल श्री राधावल्लभ का ही भजन करो और अन्य धर्मों को सर्वथा त्याग दो ।
कोई वर्णाश्रम धर्म में ही उलझे हुए हैं, कोई विधि-निषेध, व्रत-नियम के चक्करों में उलझकर समय बर्बाद कर रहे हैं, विरले ही वे सौभाग्यशाली हैं जिनके हृदय में प्रेम प्रकट हुआ है और जो श्री राधा-कृष्ण को प्रेम से लाड़ लड़ाते हैं।