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  1. जै राधा मन हरनी मोहन - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (293)

    श्री कृष्ण के मन को हरने वाली, श्री राधा रानी की जय हो जिनके चरण-कमल मेरे शीश पर सदा सुशोभित हैं। उन्होंने अपनी कृपा-सुधा का सिंचन करके अपनी इस दासी के सूखे हुए जीवन रूपी धान को पुनः हरा-भरा कर दिया है।

  2. सब तजि कीजिये सतसंग भक्ति - श्री किशोरी अलि जी, मन शिक्षा (31)

    अन्य सब कुछ त्यागकर केवल सत्संग करना चाहिए, क्योंकि यह सत्संग ही भक्ति, ज्ञान और वैराग्य प्रदान करने वाला तथा युगल सरकार के अटूट व अखंड प्रेम को दिलाने वाला है।

  3. जो कोई प्रिया चरण मन - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (103)

    जो कोई अपने मन को श्रीप्रियाजी (श्रीराधा) के चरणों में सदा लगाए रखता है, आनन्दस्वरूप श्रीश्यामसुन्दर उस पर अपार प्रेम की वर्षा करते हैं।

  4. रस में रस पियें कुंजबिहारी - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (101)

    कुंजबिहारी श्री कृष्ण रस के सागर में मग्न होकर निरंतर प्रेम-रस का ही पान करते हैं। उनकी आपसी बातचीत और समस्त हाव-भाव भी केवल रस से ही ओत-प्रोत हैं तथा वे परस्पर एक-दूसरे को अत्यंत अनुराग और रसपूर्ण दृष्टि से निहारते हैं।

  5. राधेराधे नामकी जकलागै ये वीर - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (118)

    हे भाई! मेरे हृदय में निरंतर केवल 'राधे-राधे' नाम की ही लगन लगी रहे, और मैं श्रीधाम वृन्दावन की लताओं की शीतल छाया में बैठकर इस परम पावन नाम को उसी प्रकार रटता रहूँ, जैसे कोई तोता एक ही नाम निरंतर रटता है।

  6. अतन होय वन पायबौ गायौ - श्री किशोरी अलि

    अनेक महापुरुषों का यह मत है कि व्रज में किसी वृक्ष, लता, तृण अथवा अन्य रूप में जन्म प्राप्त होना अथवा वास करना यह तो महान सौभाग्य की बात है ही, तथापि, रसिकों की दृढ़ मान्यता यह भी है कि उनकी इस भौतिक देह का विसर्जन भी इसी चिन्मय व्रज-रज के अंक में ही संपन्न होना चाहिए।

  7. जो मन मोहन करत बस - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (94.3)

    जो मनमोहन (श्री कृष्ण) संपूर्ण संसार को अपने वश में कर लेते हैं और जो सभी के चित्त को चुराने वाले हैं, वे स्वयं भी इस ‘राधा’ नाम को, अत्यंत प्रेमपूर्वक, रात-दिन निरंतर जपते रहते हैं।

  8. बहुत दिवस देखे बिन बीते - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (86)

    हे ललित लाड़ैती श्री राधे! आपके दर्शन किए बिना बहुत दिन बीत गए हैं। यदि मुझसे कोई भूल हो गई हो और उसी के कारण आप मुझसे विमुख अथवा उदास हो गई हों, तो कृपापूर्वक उस अपराध को अब क्षमा कर दीजिए और मुझे अपने दर्शन प्रदान कीजिए।

  9. रस रसिकन को रस पान - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (01)

    रस ही रसिकों का जीवनाधार है। वही उनका आहार, भोग और आत्मिक पोषण है। श्री राधा और श्रीकृष्ण के संयोगमय (नित्य विहार) रस के बिना वे क्षणभर भी नहीं रह सकते।

  10. राधे जू रंग भीनी राजकुँवारि - श्री किशोरी अलि

    श्री राधा रानी के अनुपम सौंदर्य और प्रिया-प्रियतम के निकुंज-मिलन का गान करते हुए किशोरी अलि कहते हैं— हमारी स्वामिनी श्रीराधे जू प्रेम-रस के रंग में सराबोर नित्य किशोरी राजकुमारी हैं। वे अलौकिक लाड़िली, परम लजीली, अनुपम अलबेली और सदा सुकुमार हैं।

  11. वौरी ह्वै मग डोलिये - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (246.14)

    हे सजनी! तुम लोक-लाज का सर्वथा त्याग करके श्रीधाम वृन्दावन की कुंज-गलियों में केवल श्यामा-श्याम के प्रेम में विह्वल (बौरी) होकर विचरण करो। हे भटू (सखी)! यदि मार्ग में कोई तुमसे कुछ पूछे भी, तो उसके उत्तर में अपनी रसना से केवल 'श्यामाश्याम' का ही उच्चारण करो, इसके अतिरिक्त अन्य किसी भी चर्चा में न पड़कर सर्वथा मौन धारण कर लो।

  12. चारुमुखी चंद्रानना चतुरा चतुर सुजान - श्री किशोरी अलि, राधा नामावलि (39)

    श्री राधा का मुखमण्डल अत्यन्त सुन्दर तथा चन्द्रमा के समान मनोहर है। वे परम चतुर, विवेकशील और सुजान हैं। समस्त स्त्रियों में वे शिरोमणि हैं तथा अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के प्राणों की भी प्राणस्वरूपा हैं।

  13. कुँवरि मोहे देहु बास बरसाने - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (25)

    हे वात्सल्यमयी लाड़ली किशोरी जी! आप अकारण करुणा करके मुझे अपने परम पावन और रसमय धाम श्री बरसाना में सदा के लिए अखंड वास प्रदान कर दीजिये। इस संसार के नश्वर और भजन-प्रतिकूल समस्त भौतिक वासनाओं का सर्वथा परित्याग करके, मैं केवल आपके भजन में लीन रहूँ और आपके दिव्य महल में सदा अनुरागपूर्वक निवास करता रहूँ।

  14. अली किशोरी मनहि लगाये गरे लगावत प्यारी

    श्री अलि किशोरी जी कहते हैं कि हमारी सामर्थ्य तो केवल इतनी ही है कि हम किसी प्रकार अपने इस चंचल मन को स्वामिनी श्री राधा प्यारी में लगाने का प्रयास करते हैं; परन्तु हमारी लाड़ली जू इतनी परम करुणामयी और वात्सल्यमयी हैं कि वे हमारे इस लघु प्रयास पर ही रीझकर, अत्यंत प्रेमपूर्वक हमें अपने श्रीकंठ (गले) से लगा लेती हैं।

  15. वृन्दावनधाम नीको व्रजको विश्राम नीको - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (85)

    श्री वृन्दावन धाम अत्यंत सुंदर है, ब्रज मंडल का परम विश्राम सुखद है। श्यामा श्याम का नाम परम सुंदर एवं कल्याणकारी है और उनका यह धाम आनंद का साक्षात मंदिर है।

  16. एक राधा ब्रज में बसै - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (714-716)

    एक राधा ब्रज में ब्रजेश्वरी स्वरूप से विराजमान हैं, एक राधा रास-लीला में रासेश्वरी स्वरूप से विलास करती हैं, और तीसरी राधा नित्य निकुंज-विहारिणी स्वरूप से निकुंजों में नित्य विहार करती हैं, जिन्हें रसिक-शिरोमणि स्वामी हरिदास जी लाड़ लड़ाते हैं।

  17. करुणा करि वन वास दीजिए - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (08)

    हे स्वामिनी! कृपा करके मुझे अपने निज धाम श्री वृन्दावन का वास प्रदान कीजिये। हे करुणामयी! क्या कारण है कि आपने मुझे अपनी स्मृति से विस्मृत कर दिया है? हा राधे! आपने मुझे अपने महल की टहल (सेवा) से क्यों वंचित कर दिया? मुझसे ऐसा कौन सा अपराध बन पड़ा है जिसे आपने अपने हृदय में धारण कर लिया है?

  18. श्रीस्वामी के पद कमल - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (394)

    ललिता अवतार स्वामी श्री हरिदास जी के चरण-कमलों को हृदय रूपी शुभ स्थान में बड़े ही प्रेम से विराजमान कर गौर और श्यामल वर्ण की आभा से युक्त श्री युगल-सरकार (राधा-कृष्ण) को मनभावने भाव से स्वेच्छापूर्वक लाड़ लड़ाओ।

  19. लोग कुटुम सुख अर्थ अनन्तहि - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (32)

    मैंने लोक-परलोक, परिवार के सुख और अनन्त भौतिक कामनाओं को दूर से ही त्याग दिया है। इतना ही नहीं, जप, व्रत तथा परमार्थ सम्बन्धी समस्त श्रेष्ठ साधनों से भी दीर्घकाल तक अभ्यास करने पर निराश होकर उन्हें छोड़ दिया है।