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  1. अब तो राधा चरन मन - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (146)

    अब मेरा मन पूर्णतः श्री राधा जी के चरणों में समर्पित हो गया है। कुँवरि किशोरी, अतिशय प्रिय प्रिया जी ने कृपा करके मुझे अपना बना लिया है।

  2. जापै चढ़े युगल को रंग - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, युगल-अनुराग (36)

    जिस जीव पर श्रीराधा-कृष्ण के युगल प्रेम का रंग चढ़ जाता है, वह दंपति सरकार के श्रीअंगों की शोभा निरखते ही एक पल में तीनों लोकों के समस्त सुखों को भूल जाता है।

  3. कुंजबिहारिनि स्वामिनी अपनी निजु - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (182)

    कुंजबिहारिणी श्रीराधा महारानी जू ही मेरी एक मात्र स्वामिनी हैं, जिन्होंने मुझे पूर्णतः अपना निज जन बना लिया है। उन्होंने अपने अत्यंत अद्भुत रूप का दर्शन कराकर मुझे अपने परम प्रेम-रस में पूर्ण रूप से सराबोर कर दिया है।

  4. स्वामी श्री हरिदास जू बीठल - श्री किशोरी अलि (रत्न अलि को पत्र-व्यवहार)

    स्वामी श्री हरिदास जी, श्री विट्ठल विपुल जी, श्री विनोद जी, दासी श्री बिहारिनिदास जी तथा श्री व्यास जी की पावन रज प्राप्त करके परम आनंद पाया है। इन महान रसिक आचार्यों के चरणों की रज का आश्रय ही समस्त दिव्य सुख और उल्लास को प्रदान करने वाला है।

  5. अँग अँग माहीं जव लगै - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (238.3)

    जब श्रीधाम वृंदावन की परम-पावन रज मेरे अंग-अंग को स्पर्श करती है और नेत्रों से निष्काम प्रेम के अश्रु बहने लगते हैं, तभी इस जीवन में सच्चे सुख और परम शांति की अनुभूति होती है।

  6. किशोरी तोरी किरपा को आधार - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (118)

    हे किशोरी जी (श्री राधा)! मेरे जीवन का एकमात्र आधार आपकी अहैतुकी कृपा ही है; मैं प्रतिपल इसी आस में आपकी बाट जोहता हूँ कि कब आपके अपार रूप-सौंदर्य के दर्शन होंगे।

  7. प्यारी की सहेली निज जानिक - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (55)

    मुझे अपनी प्यारी श्री राधा की सखी जानकर चतुर शिरोमणि श्रीलाल जी (श्रीकृष्ण) अत्यन्त प्रेमपूर्वक मेरे गले में बाँहें डालकर प्रेमपूर्वक क्रीड़ा करते हैं। [1]

  8. बधाई हो बाजत श्री वृषभान - श्री किशोरी अलि जी

    श्री वृषभान जी के राजद्वार पर मंगलमयी बधाई बज रही है। रानी कीर्ति के यहाँ लाडली श्रीराधा जी पुत्री रूप में प्रकट हुई हैं, मानो संसार को समस्त निधियों की प्राप्ति हो गई है, जिसके उत्सव में प्रचुर दान दिया जा रहा है।

  9. बिहरत दोऊ रसिकवर सहज अजन्मा - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (559)

    सहज और अजन्मा रूप वाले दोनों श्रेष्ठ रसिक निरंतर परस्पर विहार करते हैं। मैं निरंतर एकरस होकर उसी अनुपम केलि का भजन करता हूँ, जो श्री हरिदासी पद्धति की अत्यंत विलक्षण और अद्वितीय क्रीड़ा है।

  10. हों सबभांति विगारी प्यारी तुम - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (121)

    हे प्यारी जी! मैं सब प्रकार से बिगड़ा हुआ हूँ, अब आप पतितों का उद्धार करने के अपने विरद (स्वभाव) को संभालिए। मैंने अपने अनेक जन्म अज्ञानता की नींद में सोकर ही गँवा दिए हैं, इसलिए अब आप मुझ पर अपनी कृपादृष्टि डालिए।

  11. जा रज ही के लोभ सौं वत्स रूप गहि स्याम- श्री किशोरी अलि (रत्न अलि को पत्र-व्यवहार)

    जिस श्रीवृंदावन रज के परम लोभ के कारण ही श्यामसुंदर श्रीकृष्ण ने बछड़े का रूप धारण किया और दिन-रात अपनी जिह्वा से उस रज का आस्वादन करते हुए वन-वन में विचरते रहे।

  12. कबहूँ गहवर बन विचर कबहुँ - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, माधुर्य रस दोहावली (82)

    कभी बरसाना के गहवर वन में और कभी श्री धाम वृंदावन में विचरण करते हुए, परम सुंदर और आनंददायक गौर वर्ण की श्री राधा और श्याम वर्ण के श्री कृष्ण की अत्यंत मनमोहक युगल छवि का निरंतर अवलोकन करता रहूँ।

  13. झूलत दोऊ ललित हिंडोरें झूमत - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, वन कुंजन झूलन लीला (28)

    श्री राधा-कृष्ण दोनों ही अत्यंत सुंदर हिंडोले पर झूल रहे हैं। झूलते समय वे परस्पर एक-दूसरे के ऊपर झुकते और गिरते हैं, जिससे उनके अंग-अंग से अद्भुत सौंदर्य की हिलोरें उठ रही हैं।

  14. किशोरी मेरी हरो विरह की - श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (115)

    हे मेरी किशोरी जी! आप मेरे विरह के दुःख को दूर कीजिए। हे करुणा की सागर, परम दयालु और लाड़ली श्रीराधा जी! आप हर प्रकार से सर्वसमर्थ हैं।

  15. लगी समाधि बिहार की छुटै - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (319)

    श्री हरिदासी (स्वामी श्री हरिदास जी) के निकुंज-धाम में श्री गौर-श्याम (श्री राधा-कृष्ण) सदैव निरंतर विहार करते रहते हैं। इस दिव्य युगल-विहार की ऐसी अखंड समाधि लग गई है, जो दिन-रात कभी भी भंग नहीं होती है।

  16. जै राधा मन हरनी मोहन - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (293)

    श्री कृष्ण के मन को हरने वाली, श्री राधा रानी की जय हो जिनके चरण-कमल मेरे शीश पर सदा सुशोभित हैं। उन्होंने अपनी कृपा-सुधा का सिंचन करके अपनी इस दासी के सूखे हुए जीवन रूपी धान को पुनः हरा-भरा कर दिया है।

  17. सब तजि कीजिये सतसंग भक्ति - श्री किशोरी अलि जी, मन शिक्षा (31)

    अन्य सब कुछ त्यागकर केवल सत्संग करना चाहिए, क्योंकि यह सत्संग ही भक्ति, ज्ञान और वैराग्य प्रदान करने वाला तथा युगल सरकार के अटूट व अखंड प्रेम को दिलाने वाला है।

  18. जो कोई प्रिया चरण मन - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (103)

    जो कोई अपने मन को श्रीप्रियाजी (श्रीराधा) के चरणों में सदा लगाए रखता है, आनन्दस्वरूप श्रीश्यामसुन्दर उस पर अपार प्रेम की वर्षा करते हैं।

  19. रस में रस पियें कुंजबिहारी - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (101)

    कुंजबिहारी श्री कृष्ण रस के सागर में मग्न होकर निरंतर प्रेम-रस का ही पान करते हैं। उनकी आपसी बातचीत और समस्त हाव-भाव भी केवल रस से ही ओत-प्रोत हैं तथा वे परस्पर एक-दूसरे को अत्यंत अनुराग और रसपूर्ण दृष्टि से निहारते हैं।