मो मन गड्यौ स्याम सलोने - श्री नन्ददास
मेरा मन श्रीकृष्ण के अति सुंदर साँवले स्वरूप में रच-बस गया है और उनके अंग-प्रत्यंग की अपूर्व शोभा में डूबकर तैर रहा है।
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मेरा मन श्रीकृष्ण के अति सुंदर साँवले स्वरूप में रच-बस गया है और उनके अंग-प्रत्यंग की अपूर्व शोभा में डूबकर तैर रहा है।
हे राधे! तुम कान लगाकर मुरली की धुन सुनो, कुंज-भवन में श्रीश्यामसुंदर तुम्हारे ही गुणों का गान कर रहे हैं। जो पवन तुम्हारे श्रीअंग का स्पर्श करके आती है, वे उसके सम्मुख होकर उसे प्रेमपूर्वक अपने हृदय से लगा लेते हैं।
अब मेरा मन पूर्णतः श्री राधा जी के चरणों में समर्पित हो गया है। कुँवरि किशोरी, अतिशय प्रिय प्रिया जी ने कृपा करके मुझे अपना बना लिया है।
श्री श्यामा-श्याम निकुंज में विराजमान हैं। उनके चारों ओर मालती, माधवी और विविध प्रकार के सुंदर पुष्प खिले हुए हैं, जिससे वह संपूर्ण धाम अत्यंत सुशोभित हो रहा है।
श्रीवृंदावन के लता-कुंजों में दोनों परम सुकुमार श्रीराधा-कृष्ण नित्य विहार कर रहे हैं। उनके श्रीमुख की मकरंद-रूपी माधुरी को प्राप्त करके भँवरे आनंदित होकर मधुर गुंजार कर रहे हैं (अथवा रसिक जन उनका सुंदर गुणगान कर रहे हैं)।
वृषभानु जी की लाडली श्री राधा की जय हो, महारानी कीर्ति की दुलारी की जय हो। अपने मस्तक पर सुंदर चंद्रिका धारण करने वाली और अपने श्रीअंगों पर नील वस्त्र धारण करने वाली श्रीजी की जय हो।
अति सुंदर सरोवर, अत्यंत मनोहर वन, और प्रियतमा श्रीराधा (ललना) तथा प्रियतम श्रीकृष्ण (लाल) के सहित ये निकुंज और लीला-शैया ही श्री वृंदावन धाम के प्राकट्य का मुख्य प्रयोजन और परम प्रेम का स्वरूप हैं।
हे नव-नागरी (श्री राधिके)! आप अद्भुत करुणा की साक्षात् सागर हैं, मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए जिससे मुझे श्री वृंदावन धाम की रेणु (रज) में परम श्रद्धा हो और यह रज अत्यंत सरस तथा सुहावनी लगने लगे।
कुंज के अधिपति युगल किशोर की आरती उतारिए। इन नित्य नवीन लाड़िली जी और अलबेले लाल जी की अनुपम छवि को अपने नेत्रों से निहारकर पूर्ण रूप से तृप्त हो जाइए।
धन, यौवन, स्वजन, ज्ञान और बल—ये सभी केवल अहंकार (गुमान) उत्पन्न करने के मूल कारण हैं. श्री कान्त किशोर जी कहते हैं कि इन साधनों के बल पर श्री वृन्दावन की रसमय केलि कदापि प्राप्त नहीं की जा सकती।
श्रीप्रिया जी रात भर प्रियतम श्यामसुंदर के साथ जागती रही हैं। उनके सुवर्ण के समान कांतियुक्त कपोलों की सुंदर आभा पर प्रियतम के वस्त्रों की छाप अंकित है, जो अत्यंत सुशोभित हो रही है।
फिर श्रीराधा श्यामसुन्दर को अपने साथ लेकर कुंज-महल में विराजित हो गईं। वे दोनों परस्पर गले में बाँहें डालकर तकिये के सहारे लेटे हुए हैं, जहाँ उनके अंगों के स्पर्श और आलिंगन से ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो साक्षात् कामदेव ही सुशोभित हो रहा हो।
मैं श्रीराधा और श्रीहरि के दिव्य अनुराग की वंदना करता हूँ। उन दोनों के तन और मन मिलकर एक हो गए हैं जो अनेक लीला-रसों के रंगों से भरे हैं, मानो जैसे राग और रागिनी परस्पर मिलकर एक हो गए हों।
हे बनवारी! अब भला मेरी बात कौन सुनेगा? मुझे आपके समान कोई दूसरा सामर्थ्यवान दिखाई नहीं देता, फिर मैं अपनी अंतःकरण की पीड़ा और किससे जाकर कहूँ?
हे प्यारी किशोरी जी! आप सदैव मेरे नेत्रों में निवास करें। आप श्री वृन्दावन के निकुञ्ज भवन में वास करती हैं, जहाँ ललिता आदि सखियाँ निरंतर आपकी सेवा में आपके साथ रहती हैं।
ब्रज के आँगन में अलौकिक हिंडोला रचा गया है। श्री वृन्दावन की सघन कुंजों में इस अद्भूत उत्सव को देखकर स्वयं भगवान शंकर भी आनंदातिरेक में तांडव नृत्य करने लगे हैं।
The sakhīs repeatedly offer their very lives for Śrī Yugala, waving water over Them and drinking it—a loving and auspicious ritual in which water is waved over the beloved ones so that no obstacle or inauspiciousness may ever touch Them.
श्री राधा-कृष्ण दोनों कुंज के हिंडोले पर बैठे हुए झूल रहे हैं। उस समय वन के सारे वृक्ष और लताएँ फूलों से लदी हुई हैं तथा आकाश में घने बादल उमड़कर सुंदर वर्षा कर रहे हैं।
श्री वृन्दावन की सघन कुंजों में नवीन पत्ते और पुष्पों के समूह खिले हुए हैं, और वहाँ शीतल, मंद तथा सुगंधित त्रिविध पवन धीरे-धीरे बह रही है।
प्रियतम श्री कुंजबिहारी अपनी प्राणप्रिया श्री राधा से अत्यंत आकुल होकर कहते हैं कि हे प्यारीजू! तुमने मुझ पर ऐसा कौन सा सम्मोहन-बाण चला दिया है कि यह सघन निकुंजों में विहार करने वाला नवल श्याम सब प्रकार से तुम्हारे पूर्णतः अधीन हो गया है।