kunj

495 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं

  1. तू सुनि कान दैरी मुरली - श्री सूरदास मदनमोहन (गौड़ीय संत), श्री सूरदास मदनमोहन जी की पदावली (121)

    हे राधे! तुम कान लगाकर मुरली की धुन सुनो, कुंज-भवन में श्रीश्यामसुंदर तुम्हारे ही गुणों का गान कर रहे हैं। जो पवन तुम्हारे श्रीअंग का स्पर्श करके आती है, वे उसके सम्मुख होकर उसे प्रेमपूर्वक अपने हृदय से लगा लेते हैं।

  2. अब तो राधा चरन मन - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (146)

    अब मेरा मन पूर्णतः श्री राधा जी के चरणों में समर्पित हो गया है। कुँवरि किशोरी, अतिशय प्रिय प्रिया जी ने कृपा करके मुझे अपना बना लिया है।

  3. कुंज में बैठे स्यामा स्याम - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (665)

    श्री श्यामा-श्याम निकुंज में विराजमान हैं। उनके चारों ओर मालती, माधवी और विविध प्रकार के सुंदर पुष्प खिले हुए हैं, जिससे वह संपूर्ण धाम अत्यंत सुशोभित हो रहा है।

  4. लता कुंज वृंदा बिपिन बिहरें - श्री सरस माधुरी

    श्रीवृंदावन के लता-कुंजों में दोनों परम सुकुमार श्रीराधा-कृष्ण नित्य विहार कर रहे हैं। उनके श्रीमुख की मकरंद-रूपी माधुरी को प्राप्त करके भँवरे आनंदित होकर मधुर गुंजार कर रहे हैं (अथवा रसिक जन उनका सुंदर गुणगान कर रहे हैं)।

  5. जय जय राधे वृषभान सुता - श्री सरस माधुरी

    वृषभानु जी की लाडली श्री राधा की जय हो, महारानी कीर्ति की दुलारी की जय हो। अपने मस्तक पर सुंदर चंद्रिका धारण करने वाली और अपने श्रीअंगों पर नील वस्त्र धारण करने वाली श्रीजी की जय हो।

  6. ललित सरोवर ललित वन ललना लाल समेत - श्री ललितमोहिनी देव, विशिष्ट पद एवं साखी (17)

    अति सुंदर सरोवर, अत्यंत मनोहर वन, और प्रियतमा श्रीराधा (ललना) तथा प्रियतम श्रीकृष्ण (लाल) के सहित ये निकुंज और लीला-शैया ही श्री वृंदावन धाम के प्राकट्य का मुख्य प्रयोजन और परम प्रेम का स्वरूप हैं।

  7. करौ कृपा नव नागरी अद्भुत - श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (18)

    हे नव-नागरी (श्री राधिके)! आप अद्भुत करुणा की साक्षात् सागर हैं, मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए जिससे मुझे श्री वृंदावन धाम की रेणु (रज) में परम श्रद्धा हो और यह रज अत्यंत सरस तथा सुहावनी लगने लगे।

  8. धन-जोवन-जन-ज्ञान-बल सब गुमान के - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (2)

    धन, यौवन, स्वजन, ज्ञान और बल—ये सभी केवल अहंकार (गुमान) उत्पन्न करने के मूल कारण हैं. श्री कान्त किशोर जी कहते हैं कि इन साधनों के बल पर श्री वृन्दावन की रसमय केलि कदापि प्राप्त नहीं की जा सकती।

  9. प्रिया स्याम-सँग जागी है सोभित - श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (9)

    श्रीप्रिया जी रात भर प्रियतम श्यामसुंदर के साथ जागती रही हैं। उनके सुवर्ण के समान कांतियुक्त कपोलों की सुंदर आभा पर प्रियतम के वस्त्रों की छाप अंकित है, जो अत्यंत सुशोभित हो रही है।

  10. पुनि बैठी कुंज-महल मैं संग - श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (65)

    फिर श्रीराधा श्यामसुन्दर को अपने साथ लेकर कुंज-महल में विराजित हो गईं। वे दोनों परस्पर गले में बाँहें डालकर तकिये के सहारे लेटे हुए हैं, जहाँ उनके अंगों के स्पर्श और आलिंगन से ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो साक्षात् कामदेव ही सुशोभित हो रहा हो।

  11. वन्दौं श्रीराधा-हरिकौ अनुराग तन - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (03)

    मैं श्रीराधा और श्रीहरि के दिव्य अनुराग की वंदना करता हूँ। उन दोनों के तन और मन मिलकर एक हो गए हैं जो अनेक लीला-रसों के रंगों से भरे हैं, मानो जैसे राग और रागिनी परस्पर मिलकर एक हो गए हों।

  12. बसौ नित नैनन मांही लली - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (19)

    हे प्यारी किशोरी जी! आप सदैव मेरे नेत्रों में निवास करें। आप श्री वृन्दावन के निकुञ्ज भवन में वास करती हैं, जहाँ ललिता आदि सखियाँ निरंतर आपकी सेवा में आपके साथ रहती हैं।

  13. हिंडोरौ ब्रज के आँगन माँच्यौ - गोस्वामी श्री हरिराय जी

    ब्रज के आँगन में अलौकिक हिंडोला रचा गया है। श्री वृन्दावन की सघन कुंजों में इस अद्भूत उत्सव को देखकर स्वयं भगवान शंकर भी आनंदातिरेक में तांडव नृत्य करने लगे हैं।

  14. बैठे दोउ झूलत कुंज हिंडोरें - श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (386)

    श्री राधा-कृष्ण दोनों कुंज के हिंडोले पर बैठे हुए झूल रहे हैं। उस समय वन के सारे वृक्ष और लताएँ फूलों से लदी हुई हैं तथा आकाश में घने बादल उमड़कर सुंदर वर्षा कर रहे हैं।

  15. मोपै कहा कियौ तैं प्यारी - श्री रामराय जी, आदिवाणी (44)

    प्रियतम श्री कुंजबिहारी अपनी प्राणप्रिया श्री राधा से अत्यंत आकुल होकर कहते हैं कि हे प्यारीजू! तुमने मुझ पर ऐसा कौन सा सम्मोहन-बाण चला दिया है कि यह सघन निकुंजों में विहार करने वाला नवल श्याम सब प्रकार से तुम्हारे पूर्णतः अधीन हो गया है।