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  1. नीके द्रुम फूले-फूल सुभग - श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (29)

    परम पावन श्री यमुनाजी के पुलिन पर समस्त तरु-लताओं में अलौकिक पुष्प विकसित हो रहे हैं। आकाश में सघन श्याम-घटाओं के मध्य सतरंगी इंद्रधनुष की अनुपम छटा सुशोभित हो रही है।

  2. परयौ हो जगत भव भरयौ - श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (101)

    जगत अज्ञान के विषैले रस में डूबा है, जैसे मछली अपने सिर में विष घुले। वह स्थान काल के प्रवाह से भरा है जहाँ लोग क्षण‑क्षण गिनते हैं पर नाम जप में लगे रहते हैं। कलियुग की आशा‑फ़ँस से मन को मुक्त कर प्रेम से भर दिया गया है, और अलबेली ने प्रिय को वन‑कुंज के घर में स्थापित किया है।

  3. नमो कृष्ण जै नित्य विहारी - श्री गोविंद शरण देवाचार्य, श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की वाणी (3)

    नित्य निकुंज में विहार करने वाले श्री कृष्ण को नमस्कार है। वे अपनी प्राणप्रिया श्री राधा जी के साथ नित्य-नवीन केलि-विलास करते हुए सर्वदा जययुक्त (सुशोभित) हैं।

  4. जय जय जमुना सब सुखकारी - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (141)

    सब प्रकार के सुखों को प्रदान करने वाली श्री यमुना जी की बारंबार जय हो, जय हो। आप भक्तों पर अत्यंत कृपा करने वाली और साक्षात् करुणा की मूर्ति हैं। आप सदा सबका मंगल (कल्याण) करने वाली और समस्त अमंगलों (दुखों व संकटों) को हरने वाली हैं।

  5. लाड़ो तुम ही हो मम भाग - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (43)

    हे लाड़ली (श्री राधा)! आप ही मेरा परम सौभाग्य हैं। मैं सेवाकुञ्ज में आपको खोजती हुई भटकती रहती हूँ, न जाने कब मेरे हृदय में आपके प्रति पूर्ण अनुराग जागृत होगा।

  6. निकसत जीवहिं बाँधि के तासौं राखति बाल - श्री मतिराम, मतिराम सतसई (380)

    हे श्यामसुंदर! यमुना जी के परम पावन तट पर उस कुंज में आपने जो वनमाला दी थी, वह वनमाला ही अब निकलते हुए प्राणों को बाँधकर रखने का काम कर रही है अर्थात् आपकी दी हुई वह वस्तु ही इस विरह में प्राणों का एकमात्र आधार बनी हुई है।

  7. सेवाकुंज सो कुँज निज सम्पति दम्पति सेव - श्री चरणदास

    यह सेवाकुंज ही हमारा परम निज-धाम कुंज है, जहाँ निरंतर श्री प्रिया-प्रियतम की सेवा करना ही हमारा परम लक्ष्य है। यह सेवा ‘तत्सुख-सुख’ के भाव से की जाती है—अर्थात् प्रिया-प्रियतम के सुख में ही अपना सुख मानना है। यही भाव अत्यंत उज्ज्वल और सर्वदा सरस है। हमारा गोत्र ‘अच्युत’ है—अर्थात् हमारा सर्वस्व श्रीकृष्ण से ही सम्बन्धित है।

  8. ऐसैं बसिऐ ब्रज की बीथिनि - श्री सूरदास, सूरसागर (1108)

    ब्रह्मा कहते हैं— ब्रज की गलियों में बसने की रीति ऐसी ही होनी चाहिए जहाँ हम ब्रजवासियों और ग्वालों के जूठे पत्तलों से अन्न के दानों (सीथ) को चुन-चुनकर अपना पेट भरें।

  9. टेरत श्यामाश्याम को दया विरह बिहाल - श्री दयाबाई

    श्रीधाम वृन्दावन की पावन रज में श्यामा-श्याम के साक्षात्कार के दिव्य अनुभव को दयाबाई जी ने इस दोहे में व्यक्त किया है। वे कहती हैं कि विरह-वेदना से व्याकुल होकर जब वे निरंतर श्यामा-श्याम को पुकार रही थीं, तब एक दिन अचानक किसी कुंज में उन्हें श्री लाड़िली-लाल के दर्शन हो गए, और वे पूर्णतः कृतार्थ हो गईं।

  10. नवल कुंज नवनागरी, नव नागर नंदनन्द - श्री ब्रजवासीदास, ब्रज विलास

    नवल निकुंजों में नवीन-नागरी (श्री राधा) और नूतन-नागर नंदनन्दन (श्री कृष्ण) विराजमान हैं। आज प्रेम का सागर अपनी मर्यादाओं को त्यागकर उमड़ पड़ा है, जहाँ ये दोनों आनंद के साथ परस्पर मिल रहे हैं।

  11. श्यामा चरण कमल की आस - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (32)

    हे श्यामा जू! मुझे केवल आपके चरण-कमलों की ही आशा है। हे श्री वृन्दावन की स्वामिनी श्री राधे! कृपा करके मुझे अपने समीप ही स्थान दीजिए। जहाँ यमुना जी का प्यारा तट सुशोभित है और आपका अपना निज-खास स्थली श्री सेवाकुञ्ज है, वहीं मुझे वास दीजिए।

  12. दोउ मिलि झूलैं आज हिंडोरैं - श्री रसिक गोविंद

    आज युगल सरकार (श्री प्रिया-प्रियतम) मिलकर हिंडोले पर झूल रहे हैं। झूलते हुए वे अत्यंत प्रफुल्लित हैं और परस्पर मंद-मंद मुस्कुराते हुए एक-दूसरे को निहार कर चित्त चुरा रहे हैं। सघन कुंजों के निकट श्री यमुना जी बह रही हैं, जहाँ शुक (तोता), कोयल और मयूर मधुर स्वर में गुंजार कर रहे हैं।

  13. ललित मोहिनी कुंज में राजत अद्भुत रूप - श्री ठाकुर दास जी की वाणी, साखी (4)

    श्रीधाम वृन्दावन के ललित-मोहिनी (रसमय) कुंज में श्री प्रिया-प्रियतम का अद्भुत स्वरूप विराजमान है। उन कुंजों में श्री ठाकुरदास जी रसों के सम्राट श्रीस्वामी (स्वामी हरिदास जी) द्वारा निरूपित नित्य-विहार-रस का अनन्य भाव से भजन करते हैं।

  14. विहारिणि सर्वोपरि शिरताज - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी

    श्री विहारिणी जी (श्री राधा) ही सर्वोपरि हैं और सभी की सिरताज (शिरोमणि) स्वामिनी हैं। साक्षात् श्री बिहारी जी (श्री कृष्ण) भी सदैव उनकी आज्ञा का पालन करते हैं और वे अपनी सखियों के समूह के संग शोभायमान रहती हैं। समस्त कुंजें-निकुंजें रसमय पुंजों से भरी हैं, जहाँ स्वाभाविक रूप से ही रस की अविरल धारा बहती है।

  15. सुनियें अरज हमारी श्रीवृषभानु कुमारि - श्री हित परमानंद दास जी की वाणी, पदावली (87)

    हे श्रीवृषभानु-नन्दिनी श्री राधा! मेरी इस करुण विनय को कृपापूर्वक स्वीकार कीजिए। हे प्रियतम (श्रीकृष्ण) के प्राणाधार स्वरूपा स्वामिनी! अपनी करुणा-दृष्टि से मुझे अनुग्रहित कर अपने दिव्य एवं मनोहर स्वरूप का दर्शन प्रदान करें।

  16. जय राधा माधव गोपीजन श्री वृन्दावन धाम - ब्रज के दोहे

    युगल सरकार, श्री राधा माधव की जय हो, व्रज गोपीजनों की जय हो, तथा परम पावन श्रीधाम वृन्दावन की जय हो। यमुना जी की जय हो, दिव्य लताओं की जय हो और उन सुंदर, सुखद कुंजों की जय हो, जो अत्यंत मनमोहक और आनंददायी हैं।

  17. कुंज महल रंग हो हो होरी - श्री वंशी अली जी, वर्षोत्सव, बसंत के पद (15)

    निकुंज रूपी महल में होली के रंगों की धूम मची हुई है, जहाँ नित्य किशोर श्री कृष्ण और नित्य किशोरी श्री राधा प्रेम की होली खेल रहे हैं। ताल, मृदंग, झाँझ और ढप जैसे वाद्य यंत्र बज रहे हैं और झोलियों से भर-भर कर अबीर और गुलाल उड़ाया जा रहा है।