681 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं

  1. मोहिं मनमोहन मनभाय रे - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (80)

    मुझे तो केवल वे मन को मोहने वाले प्राणप्रिय मनमोहन (श्री कृष्ण) ही मनभावन लगते हैं। कोई जप करता है, कोई तप करता है, कोई व्रत रखता है, तो कोई जंगल में जाकर समाधि लगाता है।

  2. आरति करत नवल सुकुमारी - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी

    सखियाँ युगल की आरती कर रही हैं। युगल को पूर्ण श्रृंगार धारण कर जब वे दर्पण में उनका मुख उन्हें दिखाती हैं, तब प्रियतम और प्यारी परस्पर मंद-मंद मुस्कुराने लगते हैं। उनके अधरों पर पान की लाली और मुस्कान की मधुर आभा को देखकर सखियाँ उन पर बलिहारी जा रही हैं।

  3. चितवत चित करषत जिते - जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (54)

    श्री कृष्ण की एक रसमयी दृष्टि से बड़े-बड़े परमहंस समाधि भुला देते हैं और परमहंसों की तो गणना ही क्या, जब स्वयं देवाधिदेव भगवान् शिव ने भी उस रस के आस्वादन हेतु गोपी-देह को धारण कर लिया।

  4. देखोरी वृन्दावन शोभा - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी

    हे सखी! श्री वृन्दावन की इस अनुपम शोभा को देखो, जो समस्त सौंदर्य का सार है। यहाँ की छबि को देखकर साक्षात् युगल-चन्द्र (श्री राधा-कृष्ण) भी चकित रह जाते हैं और इसे निहारते हुए सुध-बुध खो देते हैं।

  5. जाकों कहिये मूढ जग - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह)

    जो जीव श्री यमुना जी के पावन तट और दिव्य श्री वृन्दावन धाम की अलौकिक रस-संपदा को त्यागकर, सांसारिक सुख-सुविधाओं की खोज में बीकानेर या अन्य स्थलों की ओर भागते हैं, वे ही वास्तविक मूर्ख हैं, मानो अनंत सुख का त्याग कर वे दुखों के दावानल के लिए भटक रहे हों।

  6. सखी सब, ह्वै गये लालहिं लाल - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, होरी माधुरी (24)

    एक सखी वृन्दावन की होली के दृश्य का वर्णन करती हुई अपनी अन्तरंग सखी से कहती है कि अरी सखी ! युगल सरकार की होली में पिचकारियों से ऐसा रंग चला और ऐसा गुलाल उड़ा कि जड़-चेतन सब लाल हो गये।

  7. नाम लियैं पातिक कटैं पहुँचै हरि के देस - श्री गुरु छौनाजी महाराज

    भगवान का नाम लेने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और जीव अंततः हरि के धाम को प्राप्त करता है। श्री छौना जी महाराज कहते हैं कि यह नाम चाहे गृहस्थ (गीरही) जपे या विरक्त संन्यासी (अतीत), दोनों को ही समान फल मिलता है। बाहरी भेष का इसमें कोई महत्व नहीं है, क्योंकि सार बात केवल ‘नाम-स्मरण’ है, न कि बाह्य रूप या वेशभूषा।

  8. रंगीली गलिन बिच हो हो होरी - श्री नागरीदास जी की वाणी, उत्सव माला (143)

    बरसाना की रंगी गली में अपार उमंग के साथ होली खेली जा रही है। एक ओर नन्दनन्दन रसिक श्रीकृष्ण हैं और दूसरी ओर वृषभानुनंदिनी श्रीराधा अपनी सखियों सहित विराजमान हैं।

  9. ऐसौ बरसानों निरखि गहबर आयो प्रेम - श्री नागरीदास जी की वाणी, तीर्थानंद (28)

    ऐसे दिव्य बरसाने के दर्शन कर, गह्वर वन आदि को निहारकर, हृदय में प्रेम की तरंग उमड़ पड़ी। जैसे ही इस पावन भूमि को भावपूर्वक दण्डवत प्रणाम किया और इसकी दिव्य रज में लोटा, समस्त राजसी नियम स्वतः ही छूट गए।

  10. कहो पिय किन तोहिं रसिक बनायो - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, विरह माधुरी (80)

    एक सखी कहती है कि हे प्रियतम ! यह तो बताओकि तुमको रसिक बनाया किसने है? तुम पूर्व शूकरावतार में अपने सौन्दर्य के बल पर कब 'मदन मोहन' कहलाये थे? मत्स्यावतार में तुमने मछली का शरीर धारण करके जल ही में रहते हुए कब गोपियों का चीर हरण किया था?

  11. अब तो कहिबे की न रही - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह) जी की वाणी, छूटक पद (123)

    हे श्री राधारानी! अब मेरे पास कहने को कुछ भी नहीं बचा। आपने करुणा करके मुझे अपनी बाहों से पकड़कर, अपने चरण-कमलों की शीतल छाया में आश्रय दिया और श्री धाम वृन्दावन की परम पावन भूमि में वास प्रदान किया है।

  12. ललितप्रिये हरिदासि जू नित्य केलि सुख दानि - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (65)

    श्री ललिता सखी के अवतार, स्वामी श्री हरिदास जी महाराज, प्रिया-प्रियतम की नित्य-केली-रस के प्रदाता अनन्य रसिकाचार्य हैं। उनकी कृपा से साक्षात्‌ रस की खान, कुंजबिहारिणी लाड़िली, श्री राधा महारानी सहजता से भक्त के सम्मुख प्रकट हो जाती हैं।

  13. रास-रस रसिक रँगीली राधा - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (35)

    श्री किशोरी जी रास रस से विभोर रसिकों को रिझाने वाली हैं, जिनके चरण कमलों की नखमणि रूपी चन्द्रमा के प्रकाश को ब्रह्म जान कर योगीराज शम्भु सरीखे समाधि में ध्यान करते हुए निर्विकल्प रहते हैं।

  14. छौना छाँड़ि तू जगत को श्याम सुमिर सुख लेह - श्री गुरु छौनाजी महाराज

    गुरु छौना कहते हैं कि जगत की प्रीति को त्याग कर, अपना मन श्यामसुंदर में लगाओ क्योंकि सच्चा सुख केवल उनके स्मरण से ही मिलता है। परिजन और मित्र तुम्हारे मरने के बाद तुम्हारे साथ नहीं जा सकते और अंत में तुम्हारी देह भी जलाकर राख कर देंगे।

  15. जयति जय जयति ललितादि वर भामिनी - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी

    श्रीवृंदावन की रज परम शुभता का मूल है। जिस रज का ध्यान मुनिजन लगाते हैं,जिसका स्पर्श ब्रह्मा आदि के लिए भी परम दुर्लभ है।

  16. आदि अंत वृन्दाविपिन, निरदोषिक करि बास - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (440)

    सृष्टि की रचना से पूर्व और प्रलय के पश्चात भी जो सतत एकरस भूतल पर विद्यमान रहता है, वह केवल श्रीवृन्दावन धाम ही है। वहाँ जो जन समस्त अपराधों से रहित होकर अखंड वास करते हैं, उन पर अति प्रसन्न होकर श्रीस्वामी हरिदास जी महाराज उन्हें अति अद्भुत, सुखदायक और सर्वोपरि नित्य-विहार रस प्रदान कर देते हैं।

  17. माँगना हो तो माँगो सेवा श्याम श्यामा - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, श्यामा श्याम गीत (55)

    यदि कुछ माँगना ही है तो केवल श्यामा-श्याम की सेवा माँगो। उस सेवा के लिए निष्काम प्रेम की याचना करनी चाहिये। इसके अतिरिक्त कोई अन्य इच्छा या याचना हृदय में न आने पाए — यही सच्ची भक्ति का मार्ग है।

  18. बहुत भूमि इत-उत फिरयौ - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी

    बहुत समय से मैं माया से मोहित होकर संसार में यहाँ-वहाँ भटक रहा हूँ। हाय! वह शुभ दिन कब आएगा जब मेरे पाँव वास्तव में सफल होंगे — जब वे वृंदावन की ओर बढ़ेंगे और कभी वापस नहीं लौटेंगे।

  19. श्री राधे जू को, अधाधुंध दरबार - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (46)

    श्री राधा जू के दरबार में अधाधुंध (बेहिसाब) कृपा बरसती है। जिन ब्रज की वनचारी स्त्रियों का आचरण संसार की दृष्टि में निंदनीय और व्यभिचारी कहा जाता है क्योंकि वे पति के घर में रहते हुए भी, श्रीकृष्ण को (उन्हें पूर्ण ब्रह्म रूप में न जानते हुए भी) परपुरुष मानकर अनन्य प्रेम करती थीं, उन्हीं गोपिकाओं को श्री राधा ने अपनी निज-सहचरियाँ बना लिया।