maharaj
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निरतत रसिक सदा उजियारी थेई - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
रसिक शिरोमणि श्रीकृष्ण सदा परम उज्ज्वल कांति से प्रकाशित होकर नृत्य कर रहे हैं। वे 'थेई-थेई' शब्द का मधुर उच्चारण करते हुए समस्त ब्रज-युवतियों के मन का हरण कर लेते हैं तथा करोड़ों कामदेवों के मद का नाश करने वाले हैं।
हमें शास्त्र की समझ न परि हैं - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह) जी की वाणी, छूटक पद (153)
हमें शास्त्रों की कोई समझ नहीं है और न ही हम उन्हें समझना चाहते हैं। जो लोग इन्हें अब तक नहीं समझ पाए वे आगे भी नहीं समझेंगे, परंतु जिन महापुरुषों ने शास्त्रों के वास्तविक सार को समझा है, उन्होंने जो करने को कहा है, हम केवल उसी का पालन करेंगे।
लेत न सुख हरि भक्ति - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह)
जो मनुष्य समस्त सुखों के वास्तविक सार भगवान की भक्ति के आनंद को ग्रहण नहीं करता, उसका इस संसार में राजा बन जाना भी व्यर्थ ही है; वह तो केवल संसार का बोझ उठाने वाले एक बेगार मजदूर की भाँति अपना जीवन गँवा रहा है।
कहा कहौं शोभा सुभग कहत - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
श्री युगल सरकार की उस परम सुंदर और मंगलमयी शोभा का मैं क्या वर्णन करूँ, उसके विषय में कुछ भी कहते नहीं बनता है। दोनों एक ही समान किशोर अवस्था के हैं, जो अद्भुत सौंदर्य की कांति से परिपूर्ण हैं और उनके श्रीअंग अत्यंत सुंदर तथा सुकोमल हैं।
नारायण नवखण्ड में निरभय जिनको - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (20)
श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि इस सम्पूर्ण पृथ्वी के नौ खण्डों में जिनका सर्वथा भयरहित होकर शासन था, ऐसे जगत्प्रसिद्ध महान राजाओं को भी अंततः बलवान काल ने अपना ग्रास बना लिया।
जोग जज्ञ तप नाम बिनु - श्री गुरु छौनाजी महाराज
श्री भगवन्नाम के बिना योग, यज्ञ, तपस्या आदि समस्त साधन निष्फल हो जाते हैं। श्री गुरु छौना जी कहते हैं कि जैसे सेमर के वृक्ष का यत्नपूर्वक पालन करने पर, फल पकने पर भी भीतर से केवल व्यर्थ रुई (कपास) ही निकलती है, कोई खाने योग्य फल नहीं मिलता, वैसे ही नाम-हीन साधन भी निष्फल सिद्ध होते हैं।
वारि वारि अली पीवत पानी - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
The sakhīs repeatedly offer their very lives for Śrī Yugala, waving water over Them and drinking it—a loving and auspicious ritual in which water is waved over the beloved ones so that no obstacle or inauspiciousness may ever touch Them.
भक्ति बिन हैं सब लोग - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (132)
भक्ति के बिना मनुष्य का जीवन निष्फल है। ऐसे लोग आपस में निरन्तर लड़ते-झगड़ते रहते हैं, जैसे जंगली घोड़े एक-दूसरे से भिड़ते रहते हैं।
मोहिं मनमोहन मनभाय रे - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (80)
मुझे तो केवल वे मन को मोहने वाले प्राणप्रिय मनमोहन (श्री कृष्ण) ही मनभावन लगते हैं। कोई जप करता है, कोई तप करता है, कोई व्रत रखता है, तो कोई जंगल में जाकर समाधि लगाता है।
आरति करत नवल सुकुमारी - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
सखियाँ युगल की आरती कर रही हैं। युगल को पूर्ण श्रृंगार धारण कर जब वे दर्पण में उनका मुख उन्हें दिखाती हैं, तब प्रियतम और प्यारी परस्पर मंद-मंद मुस्कुराने लगते हैं। उनके अधरों पर पान की लाली और मुस्कान की मधुर आभा को देखकर सखियाँ उन पर बलिहारी जा रही हैं।
चितवत चित करषत जिते - जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (54)
श्री कृष्ण की एक रसमयी दृष्टि से बड़े-बड़े परमहंस समाधि भुला देते हैं और परमहंसों की तो गणना ही क्या, जब स्वयं देवाधिदेव भगवान् शिव ने भी उस रस के आस्वादन हेतु गोपी-देह को धारण कर लिया।
देखोरी वृन्दावन शोभा - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
हे सखी! श्री वृन्दावन की इस अनुपम शोभा को देखो, जो समस्त सौंदर्य का सार है। यहाँ की छबि को देखकर साक्षात् युगल-चन्द्र (श्री राधा-कृष्ण) भी चकित रह जाते हैं और इसे निहारते हुए सुध-बुध खो देते हैं।
जाकों कहिये मूढ जग - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह)
जो जीव श्री यमुना जी के पावन तट और दिव्य श्री वृन्दावन धाम की अलौकिक रस-संपदा को त्यागकर, सांसारिक सुख-सुविधाओं की खोज में बीकानेर या अन्य स्थलों की ओर भागते हैं, वे ही वास्तविक मूर्ख हैं, मानो अनंत सुख का त्याग कर वे दुखों के दावानल के लिए भटक रहे हों।
सखी सब, ह्वै गये लालहिं लाल - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, होरी माधुरी (24)
एक सखी वृन्दावन की होली के दृश्य का वर्णन करती हुई अपनी अन्तरंग सखी से कहती है कि अरी सखी ! युगल सरकार की होली में पिचकारियों से ऐसा रंग चला और ऐसा गुलाल उड़ा कि जड़-चेतन सब लाल हो गये।
नाम लियैं पातिक कटैं पहुँचै हरि के देस - श्री गुरु छौनाजी महाराज
भगवान का नाम लेने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और जीव अंततः हरि के धाम को प्राप्त करता है। श्री छौना जी महाराज कहते हैं कि यह नाम चाहे गृहस्थ (गीरही) जपे या विरक्त संन्यासी (अतीत), दोनों को ही समान फल मिलता है। बाहरी भेष का इसमें कोई महत्व नहीं है, क्योंकि सार बात केवल ‘नाम-स्मरण’ है, न कि बाह्य रूप या वेशभूषा।
रंगीली गलिन बिच हो हो होरी - श्री नागरीदास जी की वाणी, उत्सव माला (143)
बरसाना की रंगी गली में अपार उमंग के साथ होली खेली जा रही है। एक ओर नन्दनन्दन रसिक श्रीकृष्ण हैं और दूसरी ओर वृषभानुनंदिनी श्रीराधा अपनी सखियों सहित विराजमान हैं।
ऐसौ बरसानों निरखि गहबर आयो प्रेम - श्री नागरीदास जी की वाणी, तीर्थानंद (28)
ऐसे दिव्य बरसाने के दर्शन कर, गह्वर वन आदि को निहारकर, हृदय में प्रेम की तरंग उमड़ पड़ी। जैसे ही इस पावन भूमि को भावपूर्वक दण्डवत प्रणाम किया और इसकी दिव्य रज में लोटा, समस्त राजसी नियम स्वतः ही छूट गए।
कहो पिय किन तोहिं रसिक बनायो - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, विरह माधुरी (80)
एक सखी कहती है कि हे प्रियतम ! यह तो बताओकि तुमको रसिक बनाया किसने है? तुम पूर्व शूकरावतार में अपने सौन्दर्य के बल पर कब 'मदन मोहन' कहलाये थे? मत्स्यावतार में तुमने मछली का शरीर धारण करके जल ही में रहते हुए कब गोपियों का चीर हरण किया था?
अब तो कहिबे की न रही - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह) जी की वाणी, छूटक पद (123)
हे श्री राधारानी! अब मेरे पास कहने को कुछ भी नहीं बचा। आपने करुणा करके मुझे अपनी बाहों से पकड़कर, अपने चरण-कमलों की शीतल छाया में आश्रय दिया और श्री धाम वृन्दावन की परम पावन भूमि में वास प्रदान किया है।
ललितप्रिये हरिदासि जू नित्य केलि सुख दानि - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (65)
श्री ललिता सखी के अवतार, स्वामी श्री हरिदास जी महाराज, प्रिया-प्रियतम की नित्य-केली-रस के प्रदाता अनन्य रसिकाचार्य हैं। उनकी कृपा से साक्षात् रस की खान, कुंजबिहारिणी लाड़िली, श्री राधा महारानी सहजता से भक्त के सम्मुख प्रकट हो जाती हैं।