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  1. लीने लली ललतादिक संग उमंग - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (61)

    श्री वृषभानु-दुलारी श्रीराधा अपनी ललिता आदि सखियों के संग अत्यंत उमंग के साथ सुंदर फुलवारी में पधारी हैं जहाँ मालती, कुंद, निवारी तथा गुलाब आदि विविध पुष्पों से सुसज्जित फुलवारी चारों ओर अपनी सुगंध बिखेर रही है।

  2. बार बार नन्दनंद इत आतुर - श्री ब्रजवासीदास, ब्रज विलास

    श्रीकृष्ण अत्यन्त व्याकुल होकर बार-बार उसी मार्ग की ओर निहार रहे हैं, जहाँ श्री राधा के चरण पड़े हैं। उनके चकोर-रूपी नेत्र अपनी प्रियतमा श्रीराधा के मुखचन्द्र के दर्शन के लिए परम लालायित हैं।

  3. बास बरसाने को मोहि दीजे - श्री सरस माधुरी

    हे किशोरी जी! मुझे अपने परम पावन धाम बरसाने का वास प्रदान कीजिए। हे कीर्ति मैया के कुल को सुशोभित करने वाली नवल कुँवरि श्री राधा! मेरी इस प्रार्थना को सुनिए और दया करके मुझे अपनी निज दासी बना लीजिए।

  4. सुघर सुजान स्वामिनी मेरी - श्री हित परमानंद दास जी, श्री हित परमानंद दास जी की वाणी, पदावली (74)

    संपूर्ण सौंदर्य की पराकाष्ठा और समस्त कलाओं की परम ज्ञाता (सुजान) श्री राधा महारानी जू ही मेरी एकमात्र आराध्या स्वामिनी हैं।

  5. पिय कौ मन प्यारी प्रिया - ब्रज के दोहे

    श्री राधा श्रीकृष्ण के हृदय की अधीश्वरी हैं और श्रीकृष्ण श्री राधा के हृदय के अधीश्वर हैं। वे परस्पर एक-दूसरे के हृदय में विराजमान हैं। इसी एकात्म भाव के कारण वे एक-दूसरे के वर्ण के अनुरूप वस्त्र धारण करते हैं (अर्थात् श्री राधा नीले वस्त्र तथा श्रीकृष्ण पीले वस्त्र धारण करते हैं) और साथ-साथ एक ही चाल से विहार करते हैं।

  6. नमो कृष्ण जै नित्य विहारी - श्री गोविंद शरण देवाचार्य, श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की वाणी (3)

    नित्य निकुंज में विहार करने वाले श्री कृष्ण को नमस्कार है। वे अपनी प्राणप्रिया श्री राधा जी के साथ नित्य-नवीन केलि-विलास करते हुए सर्वदा जययुक्त (सुशोभित) हैं।

  7. जब परसे प्यारी-चरन परम-प्रीति - श्री सूरदास, सूर सागर (3446.36)

    जब परम स्नेही नन्दनन्दन श्रीकृष्ण ने अत्यधिक प्रेम के साथ अपनी प्यारी श्रीराधा के चरणों का स्पर्श किया, तब प्रियाजी का मान (रूठना) समाप्त हो गया और वे प्रसन्न हो उठीं, जिससे विरह का सारा दुःख और द्वंद्व पूरी तरह मिट गया।

  8. प्यारी अति रस प्रेम प्रवीन - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (185)

    परम रसीली तथा प्रेम की कलाओं में निपुण हमारी श्री प्यारी जू (राधा) अत्यंत सुकोमल और लाडली हैं, जो अपने प्रीतम को नित्य-नवीन लाड लड़ाती हैं।

  9. प्यारी पग नूपुर मधुर, धुनि सुनिवे के हेत - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली

    श्री राधा के चरणों में सुशोभित नूपुरों की मधुर ध्वनि इतनी मनोहर है कि ऐसा प्रतीत होता है मानो श्रीकृष्ण के कान उसी ध्वनि को सुनने के लिए उनके चरणों में आकर बस गए हैं। श्री राधा के चरण परम सुख प्रदान करते हैं।

  10. लाड़ो तुम ही हो मम भाग - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (43)

    हे लाड़ली (श्री राधा)! आप ही मेरा परम सौभाग्य हैं। मैं सेवाकुञ्ज में आपको खोजती हुई भटकती रहती हूँ, न जाने कब मेरे हृदय में आपके प्रति पूर्ण अनुराग जागृत होगा।

  11. मोहन मोपै कही न जाई - श्री दयाबाई

    हे सखी! मोहन की वह अत्यंत प्यारी दिव्य चितवन (दृष्टि) का प्रभाव मुझसे शब्दों में कहा नहीं जाता। उनकी वह चितवन मेरे हृदय के भीतर इस प्रकार गहरे धँस गई है कि अब मेरे बार-बार निकालने का प्रयास करने पर भी वह बाहर नहीं निकलती।

  12. रहौ मेरे उर में ऐंन करि प्यारी - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (69)

    हे प्यारी जू, मेरी प्रार्थना पर विचार कीजिए - आपकी यह मृदुल एवं माधुर्यमयी मूर्ति की छटा रात-दिन मेरे हृदय में सदा बनी रहे और यह छवि मेरे ध्यान से टालने पर भी कभी न टले।

  13. जहँ राजत नवल निकुंजन प्यारी - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (157)

    नित्य-नवीन निकुंजों से सुशोभित रस-धाम श्री वृन्दावन में हमारी प्राणप्यारी श्री राधा सदा सर्वदा नित्य विहार परायण होकर विराज रही हैं। वे दिव्य रूप से सुशोभित हैं; जहाँ स्वयं श्री कृष्ण परम अनुरागवश उनके श्री चरणों में महावर लगाते हैं, और जहाँ अत्यंत लाड़-चाव के साथ उनकी सुंदर वेणी (चोटी) को सँवारकर बाँधते हैं।

  14. अली किशोरी मनहि लगाये गरे लगावत प्यारी

    श्री अलि किशोरी जी कहते हैं कि हमारी सामर्थ्य तो केवल इतनी ही है कि हम किसी प्रकार अपने इस चंचल मन को स्वामिनी श्री राधा प्यारी में लगाने का प्रयास करते हैं; परन्तु हमारी लाड़ली जू इतनी परम करुणामयी और वात्सल्यमयी हैं कि वे हमारे इस लघु प्रयास पर ही रीझकर, अत्यंत प्रेमपूर्वक हमें अपने श्रीकंठ (गले) से लगा लेती हैं।

  15. कानन मो गति कानन मो पति - श्री वृंदावन दास जी

    यह दिव्य कानन (श्री वृन्दावन अथवा बरसाना धाम) ही मेरी एकमात्र गति (आश्रय) है, यही मेरा स्वामी (पति) है, और यही मेरी माता, पिता तथा भाई है। मैं इस पावन कानन में नित्य निर्भय होकर वास करूँ, और मेरा यह मन इस कानन को त्यागकर कभी भी किसी अन्य स्थान पर न भटके।

  16. आरति करत नवल सुकुमारी - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी

    सखियाँ युगल की आरती कर रही हैं। युगल को पूर्ण श्रृंगार धारण कर जब वे दर्पण में उनका मुख उन्हें दिखाती हैं, तब प्रियतम और प्यारी परस्पर मंद-मंद मुस्कुराने लगते हैं। उनके अधरों पर पान की लाली और मुस्कान की मधुर आभा को देखकर सखियाँ उन पर बलिहारी जा रही हैं।

  17. भुजा परस्पर अंश दे - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्रीनिकुञ्ज प्रकाश अष्टयाम मानसी सेवा

    एक-दूसरे के कंधों पर परस्पर अपनी भुजाएँ रखे हुए, श्री राधा कृष्ण मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं। रसात्मक भावों से परिपूर्ण श्री प्रिया-प्रियतम के अंग-अंग से दिव्य रस की आभा छलक रही है।

  18. प्यारी नित ऐसे ही तुमें निहारूंहै - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, प्रेम परीक्षा लीला (21)

    हे प्यारी जू! मेरी यही अभिलाषा है कि मैं नित-निरंतर आपको इसी प्रकार निहारता रहूँ। आपके इस चंद्रमा के समान सुंदर मुखमंडल की नज़र उतारने के लिए मैं तिनका तोडूँ और राई-नमक न्योछावर करूँ।

  19. राधा प्यारी तेरे नैंन सलोल - श्री हित हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (23)

    हित सखी (श्री हरिवंश महाप्रभु) भाव-विभोर होकर कहती हैं— हे प्यारी राधे! आज तुम्हारे नेत्र अत्यंत चंचल और मदमाते हैं। तुमने अपनी अनन्य प्रीति, अनुराग और कंचन के समान कांतिवान गौर देह से रसिकलाल श्रीकृष्ण को पूर्णतः अपने वश में कर लिया है।