pyari

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  1. प्यारी तू अद्भुत छबि की - श्री रूप सखी जी,श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (181)

    हे प्यारी जी (श्रीराधाजू)! आप अद्भुत रूप-सौंदर्य की राशि हैं। आपके अत्यंत मनोहर मुखारविंद की दिव्य आभा पर शरद पूर्णिमा के करोड़ों चंद्रमा भी न्योछावर हैं।

  2. जय जय राधे वृषभान सुता - श्री सरस माधुरी

    वृषभानु जी की लाडली श्री राधा की जय हो, महारानी कीर्ति की दुलारी की जय हो। अपने मस्तक पर सुंदर चंद्रिका धारण करने वाली और अपने श्रीअंगों पर नील वस्त्र धारण करने वाली श्रीजी की जय हो।

  3. तेरौ मुख पीयूष पंक प्यारी - श्री रामराय जी, आदिवाणी (20)

    श्री कृष्ण कहते हैं—हे प्यारी श्रीराधे! आपका मुख अमृतमय सरोवर के समान है और उसमें आपके दोनों नेत्र दो नीलकमलों के समान प्रकट हो रहे हैं। मेरा मन मतवाले भ्रमर के समान होकर उन दोनों नीलकमल रूपी नेत्रों में जा बसा है, यहाँ तक कि वह उनकी पुतलियों के भीतर ही निवास करने लगा है।

  4. श्रीवृन्दावन लता वेलि तरु करौ - श्री हित गोपाल दास, निकुंज रस वल्लरी, आशीष दोहा

    हे श्रीवृन्दावन की समस्त लताओं, बेलों और वृक्षों! आप सब मिलकर मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए जिससे परम सुकुमारी प्यारी श्रीराधाजी हमसे हिल-मिलकर अत्यंत लाड़-दुलार करें।

  5. प्यारी की सहेली निज जानिक - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (55)

    मुझे अपनी प्यारी श्री राधा की सखी जानकर चतुर शिरोमणि श्रीलाल जी (श्रीकृष्ण) अत्यन्त प्रेमपूर्वक मेरे गले में बाँहें डालकर प्रेमपूर्वक क्रीड़ा करते हैं। [1]

  6. ब्रज की बलि आजु निकुञ्जन - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (80)

    आज निकुंजों में ब्रज के प्राण-सर्वस्व असीम सुख की वर्षा कर रहे हैं, जहाँ प्रियतम श्रीकृष्ण अपनी लाड़ली श्रीराधा के आलस्य से युक्त मुखचंद्र को निहारकर परम आनंद प्राप्त कर रहे हैं।

  7. रसिकन की सत संगत कीजै - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (164)

    हे श्रीराधा प्यारीजू! ऐसी कृपा कीजिए कि मुझे रसिक संतों का संग प्राप्त हो। उनके पावन संग के प्रभाव से मेरे हृदय में विशुद्ध राधा-किंकरी-भाव जागृत हो और मन निरंतर भगवद-प्रेम के रस में भीगा रहे।

  8. हों सबभांति विगारी प्यारी तुम - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (121)

    हे प्यारी जी! मैं सब प्रकार से बिगड़ा हुआ हूँ, अब आप पतितों का उद्धार करने के अपने विरद (स्वभाव) को संभालिए। मैंने अपने अनेक जन्म अज्ञानता की नींद में सोकर ही गँवा दिए हैं, इसलिए अब आप मुझ पर अपनी कृपादृष्टि डालिए।

  9. कौन दिन ऊँचे सुर राधिका - श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (57)

    वह दिन कब आएगा जब मैं श्री वृन्दावन की लताओं के मध्य ऊँचे स्वर में 'श्री राधिका! श्री राधिका!' पुकारूँगी और श्री धाम के उस परम-रस में मेरी गति और बुद्धि पंगु (स्तब्ध) हो जाएगी?

  10. जै राधा मन हरनी मोहन - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (293)

    श्री कृष्ण के मन को हरने वाली, श्री राधा रानी की जय हो जिनके चरण-कमल मेरे शीश पर सदा सुशोभित हैं। उन्होंने अपनी कृपा-सुधा का सिंचन करके अपनी इस दासी के सूखे हुए जीवन रूपी धान को पुनः हरा-भरा कर दिया है।

  11. मोपै कहा कियौ तैं प्यारी - श्री रामराय जी, आदिवाणी (44)

    प्रियतम श्री कुंजबिहारी अपनी प्राणप्रिया श्री राधा से अत्यंत आकुल होकर कहते हैं कि हे प्यारीजू! तुमने मुझ पर ऐसा कौन सा सम्मोहन-बाण चला दिया है कि यह सघन निकुंजों में विहार करने वाला नवल श्याम सब प्रकार से तुम्हारे पूर्णतः अधीन हो गया है।

  12. प्यारी जू सहज सुहाग तिहारौ - श्री मनमोहन दास जी (शुक संप्रदाय के भक्त)

    हे प्यारी जू! आपका यह सुहाग अत्यंत सहज और स्वाभाविक है। अपने प्रियतम के साथ आपका यह सुखद मिलन सदा अविचल बना रहे, यही सुख हमारे प्राणों और जीवन का एकमात्र आधार है।

  13. श्यामा प्यारी सखियन की सरदार - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, प्रेम फुलवारी (85)

    श्री श्यामा जू समस्त सखियों की स्वामिनी एवं सरदार हैं। वे अत्यन्त भोली, गौरवर्णा, मन को मोह लेने वाली तथा स्वभाव से ही परम उदार हैं।

  14. लीने लली ललतादिक संग उमंग - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (61)

    श्री वृषभानु-दुलारी श्रीराधा अपनी ललिता आदि सखियों के संग अत्यंत उमंग के साथ सुंदर फुलवारी में पधारी हैं जहाँ मालती, कुंद, निवारी तथा गुलाब आदि विविध पुष्पों से सुसज्जित फुलवारी चारों ओर अपनी सुगंध बिखेर रही है।

  15. बार बार नन्दनंद इत आतुर - श्री ब्रजवासीदास, ब्रज विलास

    श्रीकृष्ण अत्यन्त व्याकुल होकर बार-बार उसी मार्ग की ओर निहार रहे हैं, जहाँ श्री राधा के चरण पड़े हैं। उनके चकोर-रूपी नेत्र अपनी प्रियतमा श्रीराधा के मुखचन्द्र के दर्शन के लिए परम लालायित हैं।