sakhi

1116 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं

  1. वृंदावन को चूहरौ बेचि खातु - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (43)

    श्रीवृन्दावन धाम में निवास करने वाला चूहड़ा समुदाय का वह व्यक्ति भी, जो छाज बेचकर अपना जीवन-निर्वाह करता है, इतना परम सौभाग्यशाली है कि किसी अन्य गाँव अथवा नगर का राजा भी उसकी बराबरी नहीं कर सकता। श्रीधाम वृंदावन के वास की महिमा सर्वोपरि है।

  2. सेज सुसंपति जुगल रति दंपति - श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (45)

    श्रीवृन्दावन के दिव्य निकुञ्ज-भवन में सुन्दर शय्या और समस्त मनोहर रस-सामग्रियों से सुशोभित श्रीप्रियाप्रियतम (श्रीराधा-कृष्ण) अपनी अनन्य गति, मति और प्रेम को एक-दूसरे में समर्पित कर परस्पर गहन प्रेम में लीन हैं। श्रीवृन्दावन रूपी उनके निज धाम में युगल दंपति के नित्य-बिहार के अलौकिक सुख का निरंतर दर्शन प्राप्त होता है।

  3. श्री वल्लभ वल्लभ रटत हो - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (08)

    मैं निरंतर 'श्री वल्लभ-श्री वल्लभ' नाम का रटन करता हूँ, क्योंकि श्री वल्लभ ही मेरे जीवन और प्राण हैं। मुझे अपने माता-पिता की सौगंध है, मैं श्री वल्लभ को कभी भी नहीं भूलूँगा और सर्वदा उनका ही स्मरण रखूँगा।

  4. प्यारी तू अद्भुत छबि की - श्री रूप सखी जी,श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (181)

    हे प्यारी जी (श्रीराधाजू)! आप अद्भुत रूप-सौंदर्य की राशि हैं। आपके अत्यंत मनोहर मुखारविंद की दिव्य आभा पर शरद पूर्णिमा के करोड़ों चंद्रमा भी न्योछावर हैं।

  5. नाम सुन्यौ हो गाँव बसि - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (442)

    जैसे किसी गाँव में एक ही नाम के अनेक व्यक्ति रहते हों, तो बिना परिचय और पहचान के केवल नाम जानकर किसी विशेष व्यक्ति को खोजना असंभव है। खोजते-खोजते मनुष्य अंततः थककर निराश हो जाता है। इसी प्रकार केवल भगवान् के नाम का जप पर्याप्त नहीं है। जब तक उनके किसी विशेष स्वरूप से प्रेमपूर्ण भाव-संबंध स्थापित न हो, तब तक उनकी वास्तविक प्राप्ति नहीं हो सकती।

  6. कुंज में बैठे स्यामा स्याम - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (665)

    श्री श्यामा-श्याम निकुंज में विराजमान हैं। उनके चारों ओर मालती, माधवी और विविध प्रकार के सुंदर पुष्प खिले हुए हैं, जिससे वह संपूर्ण धाम अत्यंत सुशोभित हो रहा है।

  7. अँग-सँगनि सँग लै सखी लेउ - श्री हरिव्यस देवाचार्य, महावाणी, सुरत सुख (122)

    हे सखियों! अपनी समस्त अंग-संगिनी सहचरियों को साथ लेकर आज श्रीप्रियाप्रियतम के प्रेम-विलास के संपूर्ण रस का भरपूर आनंद लूट लो। आज विजयादशमी की रात्रि है, अतः श्रीराधा-कृष्ण की यह दिव्य युगल जोड़ी अपने परस्पर प्रेमानंद से करोड़ों कामदेवों को परास्त कर पूर्ण विजय प्राप्त करे।

  8. कुंजबिहारिनि स्वामिनी अपनी निजु - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (182)

    कुंजबिहारिणी श्रीराधा महारानी जू ही मेरी एक मात्र स्वामिनी हैं, जिन्होंने मुझे पूर्णतः अपना निज जन बना लिया है। उन्होंने अपने अत्यंत अद्भुत रूप का दर्शन कराकर मुझे अपने परम प्रेम-रस में पूर्ण रूप से सराबोर कर दिया है।

  9. चाँपत पायँ मुदित मन सखियाँ - श्री मधुर प्रिया जी

    सखियाँ अत्यंत प्रसन्नचित्त होकर श्री युगल सरकार के चरणों की सेवा कर रही हैं। वे बड़ी कोमलता से धीरे-धीरे उनके चरणों को दबा रही हैं और श्री युगल की रसमयी बातों का आनंद ले रही हैं।

  10. मेरे नंद कौ लाल जिय बस्यौ - श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (429)

    हे सखी! जब से नंदजी का लाडला श्रीकृष्ण मेरे हृदय में आ बसा है, तब से मुझे समस्त सुखों की प्राप्ति हो गई है; उसने बस मेरी ओर थोड़ा-सा देखकर और मुड़कर जो मंद-मंद मुस्कान बिखेरी थी, उसी ने मेरे मन को पूरी तरह से हर लिया है।

  11. रसिक रसीली रसभरी रसरूपा रस - श्री रूप माधुरी जी की वाणी, श्री राधा नाम अंक (02)

    समस्त रसिकों को परम रस प्रदान करने वाली श्रीराधारानी स्वयं रसस्वरूपिणी और दिव्य प्रेम-रस की सारस्वरूपा हैं। वे ही समस्त रसिकों की एकमात्र जीवन-प्राण तथा समस्त सखियों की परम स्वामिनी हैं।

  12. जय जय राधे वृषभान सुता - श्री सरस माधुरी

    वृषभानु जी की लाडली श्री राधा की जय हो, महारानी कीर्ति की दुलारी की जय हो। अपने मस्तक पर सुंदर चंद्रिका धारण करने वाली और अपने श्रीअंगों पर नील वस्त्र धारण करने वाली श्रीजी की जय हो।

  13. आजु दोउ दामिनि मिलि बहसीं - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (55)

    हे सखी! आज दो दामिनियों में परस्पर होड़ लगी है। दोनों अत्यंत नवीन श्याम घटाओं के बीच रहकर उनके श्यामल रंग में रंगी हैं। एक दामिनी (बिजली) आकाश की श्याम घटाओं के बीच चमक रही है और दूसरी श्रीराधा हैं, जो श्याम मेघ के समान वर्ण वाले श्रीकृष्ण के संग शोभायमान हो रही हैं।

  14. ललित सरोवर ललित वन ललना लाल समेत - श्री ललितमोहिनी देव, विशिष्ट पद एवं साखी (17)

    अति सुंदर सरोवर, अत्यंत मनोहर वन, और प्रियतमा श्रीराधा (ललना) तथा प्रियतम श्रीकृष्ण (लाल) के सहित ये निकुंज और लीला-शैया ही श्री वृंदावन धाम के प्राकट्य का मुख्य प्रयोजन और परम प्रेम का स्वरूप हैं।

  15. व्यास विझूका खेतकौ दुःख न काहू देइ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (146)

    श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि जैसे खेत में खड़ा बिजूका (पुतला) देखने में भय उत्पन्न करता है, पर वास्तव में वह किसी को कोई हानि नहीं पहुँचा सकता, वैसे ही संसार के भय और बाधाएँ भी केवल भयभीत करती हैं। जो साधक प्रभु पर भरोसा रखकर, सब प्रकार की भय-बाधायों से निःशंक होकर आगे बढ़ता है, वह भक्ति और प्रेम-रस की अपार संपदा प्राप्त करता है।

  16. पुरुष भाव धीरि लाल पै त्रिया भाव करि प्रिय - श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (13)

    प्रियतम लाल (श्रीकृष्ण) में ही एकमात्र पुरुष भाव को रखकर तथा स्वयं में उनके प्रति 'त्रिया भाव' (सखी या गोपी भाव) धारण करके, युगल सरकार के पारस्परिक लाड़-विहार और उनके 'तत्सुख' (केवल उनके सुख के लिए) की प्राप्ति हेतु युगल प्रेम में सर्वथा निष्ठावान और स्थिर होना चाहिए।