हिंडोरौ ब्रज के आँगन माँच्यौ - गोस्वामी श्री हरिराय जी
ब्रज के आँगन में अलौकिक हिंडोला रचा गया है। श्री वृन्दावन की सघन कुंजों में इस अद्भूत उत्सव को देखकर स्वयं भगवान शंकर भी आनंदातिरेक में तांडव नृत्य करने लगे हैं।
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ब्रज के आँगन में अलौकिक हिंडोला रचा गया है। श्री वृन्दावन की सघन कुंजों में इस अद्भूत उत्सव को देखकर स्वयं भगवान शंकर भी आनंदातिरेक में तांडव नृत्य करने लगे हैं।
The sakhīs repeatedly offer their very lives for Śrī Yugala, waving water over Them and drinking it—a loving and auspicious ritual in which water is waved over the beloved ones so that no obstacle or inauspiciousness may ever touch Them.
अति चतुर और सुंदर सखी श्री ललिता जी अपने हाथों में वीणा लेकर खड़ी होकर मधुर सुरों में गा रही हैं। शय्या पर लेटे हुए श्री श्यामा-श्याम इस मधुर तान को सुन रहे हैं, जिससे उनके कानों में इस संगीत को सुनने की रुचि और अधिक बढ़ रही है।
श्री नागरीदास जी कहते हैं कि उन्हें श्री विट्ठलविपुल देव जी तथा श्री बिहारिन देव जी का पूर्ण सत्संग प्राप्त हुआ है। ऐसे अनन्य रसिकों के प्रभाव से श्री प्रिया-प्रियतम के प्रति जो अनन्य अनुराग प्रकट हुआ है, उससे उनका चित्त नित्य प्रफुल्लित और आनंदित रहता है।
जो रसिक संत श्री श्यामा-श्याम की रूप-रस माधुरी में मग्न हैं, महाप्रेम के पुंज में रंगे हुए हैं और समस्त संसारी नातों का त्याग करके मन को जीतकर अवधूत बन गए हैं।
श्री वृन्दावन की सघन कुंजों में नवीन पत्ते और पुष्पों के समूह खिले हुए हैं, और वहाँ शीतल, मंद तथा सुगंधित त्रिविध पवन धीरे-धीरे बह रही है।
परम चतुर श्री श्यामा-श्याम के मुखारविंद की दिव्य आभा, उनके अंग-अंग की परस्पर मिलन के लिए व्याकुलता और अधरों की मंद मुस्कान ही उनके नित्य विहार का मुख्य आधार तथा प्राणों का एकमात्र आहार है।
कुंजबिहारी श्री कृष्ण रस के सागर में मग्न होकर निरंतर प्रेम-रस का ही पान करते हैं। उनकी आपसी बातचीत और समस्त हाव-भाव भी केवल रस से ही ओत-प्रोत हैं तथा वे परस्पर एक-दूसरे को अत्यंत अनुराग और रसपूर्ण दृष्टि से निहारते हैं।
'रा' अक्षर को सुनते ही मेरा मन प्रेम-विह्वल होकर लालायित हो उठता है। नम्र सखी उस परम पावन "राधा" नाम पर अपना तन, मन, कर्म, वचन, प्राण तथा सर्वस्व न्यौछावर करती है।
श्री श्यामा जू समस्त सखियों की स्वामिनी एवं सरदार हैं। वे अत्यन्त भोली, गौरवर्णा, मन को मोह लेने वाली तथा स्वभाव से ही परम उदार हैं।
श्री बरसाना धाम की जय हो, जो रस का अथाह भण्डार है। श्री वृषभानु गोप का यह अद्भुत गृह समस्त दिशाओं में श्री कीर्तिदा जी के यश और महिमा का विस्तार कर रहा है।
सांसारिक जीव का मन व्यर्थ की बातों और हँसी-मज़ाक में तो सहज ही लग जाता है, किन्तु श्रीहरि के भजन के समय वह टालमटोल करने लगता है। श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि ऐसे जीव की भजन-विमुखता देखकर भक्ति स्वयं पुकारती हुई उनकी देहली से ही लौट जाती है।
हे सखी! साँवरे (श्रीकृष्ण) के दर्शन किए बिना मुझे तनिक भी चैन नहीं पड़ता। प्रत्येक क्षण मेरा मन व्याकुल रहता है, क्योंकि मेरे नेत्र उनके अनुपम रूप के दर्शन के लिए निरन्तर प्यासे हैं।
श्री वृषभानु-दुलारी श्रीराधा अपनी ललिता आदि सखियों के संग अत्यंत उमंग के साथ सुंदर फुलवारी में पधारी हैं जहाँ मालती, कुंद, निवारी तथा गुलाब आदि विविध पुष्पों से सुसज्जित फुलवारी चारों ओर अपनी सुगंध बिखेर रही है।
हे स्वामिनी! मैंने तुम्हें ही अपने कुल की पूज्या और अपनी एकमात्र ठकुरानी (स्वामिनी) माना है। मैं तुम्हें ही नित्य अपनी आँखों में और अपने हृदय में धारण करती हूँ।
हे सखी! सुनो, अब प्रेम-रस की वर्षा होने वाली है। मैं अभी उनके घर से यह बात सुनकर आई हूँ कि हमारे प्यारे श्री राधा-कृष्ण का परस्पर मंगलमय विवाह होने वाला है।
श्री हरिव्यास देवाचार्य कहते हैं कि इस रसोपासना मार्ग के साधक को चाहिए कि वह प्रातःकाल उठकर सखी का बाह्य वेश धारण न करे, अपितु सखीभाव को अपने अंतःकरण में धारण करे। उस अन्तःचिन्तित सखीभाव के द्वारा वह अपने निज स्वरूप—अर्थात् निकुञ्ज में स्थित अपने नित्य सेवामय (या गुरुप्रदत्त सिद्ध) स्वरूप—से भावपूर्वक एकरूप हो। नित्य सहचरी-स्वरूप की सेवा में प्रविष्ट होने का यही एक उपाय है।
स्वामी श्रीहरिदास जी (ललिता सखी) के आँगन में अत्यंत सुखदाई बधाई बज रही है, क्योंकि रसिक भक्तों को परमानंद प्रदान करने के लिए निकुंज महल से साक्षात् श्रीबाँकेबिहारी जी प्रकट हो गए हैं।
चारों दिशाओं से उमड़-उमड़कर कामदेव के अनुराग से सराबोर श्याम घटाएं घिर आई हैं। उन मेघों में सौंदर्य रूपी अमृत से भरी हुई बिजली चमक रही है, जिससे संपूर्ण वन की शोभा अत्यंत हरी-भरी हो गई है।
श्री गोविन्ददेव जी की सदैव जय हो, और गोपीनाथ ब्रह्मचारी की भी जय हो।