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  1. वह कंज सो कोमल - श्री ठाकुर जी

    एक सखी श्री राधा से परिहास अथवा मनुहार करते हुए कहती है— हे सखी! तुम यह भली-भांति जानती हो कि गोपाल (श्री कृष्ण) के अंग कमल के समान अत्यंत कोमल हैं। मैं तुम्हारे बलैया लेती हूँ, तुम इतना नहीं पहचानती कि तुम्हारी केवल तनिक सी बेरुखी (मान) से श्री कृष्ण मुरझा जाते हैं?

  2. ललित मोहिनी कुंज में राजत अद्भुत रूप - श्री ठाकुर दास जी की वाणी, साखी (4)

    श्रीधाम वृन्दावन के ललित-मोहिनी (रसमय) कुंज में श्री प्रिया-प्रियतम का अद्भुत स्वरूप विराजमान है। उन कुंजों में श्री ठाकुरदास जी रसों के सम्राट श्रीस्वामी (स्वामी हरिदास जी) द्वारा निरूपित नित्य-विहार-रस का अनन्य भाव से भजन करते हैं।

  3. आज सखि वन की सोभा देखि - श्री ठाकुर दास जी

    एक सखी दूसरी सखी से कहती है—"हे सखि! आज श्री वृन्दावन के वन की अनुपम शोभा तो देखो! श्री यमुना जी के पावन जल में निर्मल कमल के फूल अत्यंत खिले हुए हैं, जिनकी छटा देखते ही बनती है।"

  4. मुख सो भाषे अनन्यता तन में राखे टोंठि- श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (30)

    लोग मुख से तो अनन्यता का बखान करते हैं— “मैं तो केवल ठाकुरजी का अनन्य भक्त हूँ, केवल ठाकुर जी ही मेरे हैं!” किंतु अपने भीतर की आसक्तियों को टोंठि सी (होठ बाँधकर) छिपा लेते हैं। ठाकुरजी के आगे केवल बाहरी चमक, कोरी पवित्रता का प्रदर्शन करते हैं, भीतर का अँधेरा, स्वार्थमय कलुष वैसा ही रहता है अर्थात् मन केवल धन, मान-प्रतिष्ठा, परिवार में ही रमा रहता है।

  5. देत दीन कूँ दान नित सदा वृन्दावन वास - श्री ठाकुर दास जी की वाणी, साखी (2)

    जो दीन को सहज ही श्री धाम वृन्दावन का वास प्रदान करते हैं, ऐसे स्वामी श्री हरिदास जी महाराज का भजन कर अपने मन को सदा उस परम शीतल, सुखद श्यामा कुंजबिहारी के नित्य-विहार-रस में ही लगाना चाहिए ।

  6. अब का समुझावती को समुझै - श्री ठाकुर जी

    एक सखी दूसरी से कहती है — अब तू क्या समझाएगी और कौन तुझे समझेगा? बदनामी का बीज तो तू पहले ही बो चुकी है। अब इतना सोच-विचार करने से क्या लाभ? जब स्वयं ही इस प्रेम-जाल में फँस गई है, तो अब दोष किसे देगी?

  7. ललित मोहिनी कुंज में दई पुंज दरसाय - श्री ठाकुर दास जी की वाणी, साखी (3)

    श्री ललित मोहिनी कुंज में प्रिया-प्रियतम के रस-सौंदर्य के अपार पुंज का दर्शन उनकी कृपा से ही संभव हुआ है । ठाकुरदास कहते हैं — वहाँ सहचरियाँ प्रेमरस में पूर्णतः उन्मत्त होकर, श्री श्यामा कुंजबिहारी की निष्काम सेवा में सदा तत्पर रहती हैं।

  8. आचारी सौं ठाकुर डरैं - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (113)

    जो केवल नियम-आचार, विधि-निषेध एवं बाहरी रीति-रिवाज में फँसे होते हैं, उनसे ठाकुरजी (श्रीकृष्ण) दूर ही रहते हैं — उनके पास नहीं आते। परंतु सच्चे प्रेमी रसिक के संग तो ठाकुरजी उमंग में भरकर, रीझ-रीझ कर उन्हें हृदय से लगाते रहते हैं।

  9. धन धन वृन्दावन की मालिन प्यारी - श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (114)

    श्री वृंदावन धाम की प्यारी मालिन धन्य-धन्य है! वह ठाकुरजी के द्वार पर बैठकर प्रेमपूर्वक उनके लिए सुंदर-सुंदर फूलों की मालाएँ पिरोती हैं।

  10. ललित मोहिनी कृपा तें निरखत केलि विलास - श्री ठाकुर दास जी की वाणी, साखी (5)

    श्री ललित मोहिनी देव जी की कृपा से, मैं युगल सरकार श्री बिहारी-बिहारिनी के अनुपम केली विलास के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त कर रहा हूँ। श्रीधाम वृंदावन नित्य नवीन रूप में प्रकट हो रहा है। श्री ठाकुरदास बारंबार अपने आपको बलिहार कर रहे हैं।

  11. प्रिया श्याम रूप रंग माती - श्री ठाकुर दास जी

    दिव्य युगल श्री राधा-कृष्ण एक-दूसरे के अद्वितीय सौंदर्य एवं माधुर्य में पूर्णतः निमग्न हैं। उनके अंग-अंग से नित्य नवीन प्रेम की रसधारा प्रवाहित हो रही है, जिसकी अलौकिक शोभा का वर्णन करना असंभव है।

  12. काँटेदार करील के वृक्ष जिस भूमि पर - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (30)

    जिस भूमि पर काँटेदार करील के वृक्ष हैं, और जहाँ हर ओर खारे जल से भरे कूप ही दिखाई देते हैं।

  13. श्री स्वामी हरिदास भजि सब सारनि कौ सार - श्री ठाकुर दास जी

    स्वामी श्री हरिदास जी का भजन करो जो समस्त सारों का सार है । श्री ठाकुर दास जी कहते हैं कि श्री ललित मोहिनी देव जी की कृपा से नित्य विहार के इस अमूल्य रस को प्राप्त करने का सौभाग्य मिला है।