जो रस बरस रह्यो बरसाने - ब्रज के लोक गीत
बरसाने में जो मधुर प्रेम-रस बरस रहा है, वैसा रस तीनों लोकों में कहीं नहीं है। इतना ही नहीं, वह रस तो स्वयं वैकुण्ठ में भी दुर्लभ है।
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बरसाने में जो मधुर प्रेम-रस बरस रहा है, वैसा रस तीनों लोकों में कहीं नहीं है। इतना ही नहीं, वह रस तो स्वयं वैकुण्ठ में भी दुर्लभ है।
एक सखी श्री राधा से परिहास अथवा मनुहार करते हुए कहती है— हे सखी! तुम यह भली-भांति जानती हो कि गोपाल (श्री कृष्ण) के अंग कमल के समान अत्यंत कोमल हैं। मैं तुम्हारे बलैया लेती हूँ, तुम इतना नहीं पहचानती कि तुम्हारी केवल तनिक सी बेरुखी (मान) से श्री कृष्ण मुरझा जाते हैं?
श्रीधाम वृन्दावन के ललित-मोहिनी (रसमय) कुंज में श्री प्रिया-प्रियतम का अद्भुत स्वरूप विराजमान है। उन कुंजों में श्री ठाकुरदास जी रसों के सम्राट श्रीस्वामी (स्वामी हरिदास जी) द्वारा निरूपित नित्य-विहार-रस का अनन्य भाव से भजन करते हैं।
एक सखी दूसरी सखी से कहती है—"हे सखि! आज श्री वृन्दावन के वन की अनुपम शोभा तो देखो! श्री यमुना जी के पावन जल में निर्मल कमल के फूल अत्यंत खिले हुए हैं, जिनकी छटा देखते ही बनती है।"
लोग मुख से तो अनन्यता का बखान करते हैं— “मैं तो केवल ठाकुरजी का अनन्य भक्त हूँ, केवल ठाकुर जी ही मेरे हैं!” किंतु अपने भीतर की आसक्तियों को टोंठि सी (होठ बाँधकर) छिपा लेते हैं। ठाकुरजी के आगे केवल बाहरी चमक, कोरी पवित्रता का प्रदर्शन करते हैं, भीतर का अँधेरा, स्वार्थमय कलुष वैसा ही रहता है अर्थात् मन केवल धन, मान-प्रतिष्ठा, परिवार में ही रमा रहता है।
जो दीन को सहज ही श्री धाम वृन्दावन का वास प्रदान करते हैं, ऐसे स्वामी श्री हरिदास जी महाराज का भजन कर अपने मन को सदा उस परम शीतल, सुखद श्यामा कुंजबिहारी के नित्य-विहार-रस में ही लगाना चाहिए ।
एक सखी दूसरी से कहती है — अब तू क्या समझाएगी और कौन तुझे समझेगा? बदनामी का बीज तो तू पहले ही बो चुकी है। अब इतना सोच-विचार करने से क्या लाभ? जब स्वयं ही इस प्रेम-जाल में फँस गई है, तो अब दोष किसे देगी?
श्री ललित मोहिनी कुंज में प्रिया-प्रियतम के रस-सौंदर्य के अपार पुंज का दर्शन उनकी कृपा से ही संभव हुआ है । ठाकुरदास कहते हैं — वहाँ सहचरियाँ प्रेमरस में पूर्णतः उन्मत्त होकर, श्री श्यामा कुंजबिहारी की निष्काम सेवा में सदा तत्पर रहती हैं।
जो केवल नियम-आचार, विधि-निषेध एवं बाहरी रीति-रिवाज में फँसे होते हैं, उनसे ठाकुरजी (श्रीकृष्ण) दूर ही रहते हैं — उनके पास नहीं आते। परंतु सच्चे प्रेमी रसिक के संग तो ठाकुरजी उमंग में भरकर, रीझ-रीझ कर उन्हें हृदय से लगाते रहते हैं।
कमल की कोमलता, गुलाब की सुगंध और चंद्रमा की शीतल आभा को लेकर, हे श्रीराधा, तुम्हारा अनुपम रूप साकार हुआ है।
हे श्यामा जू (श्री राधा)! मेरा लाल (श्री कृष्ण) तो आपके ही रंग में रंगा हुआ है। तुम अपने मुख से कुछ बोलती क्यों नहीं, क्या लाल ने कुछ किया है?
हे विधाता! मुझे वृंदावन का मोर क्यों नहीं बनाया? जहाँ मैं गोवर्धन पर्वत पर वास करता और नंदकिशोर श्रीकृष्ण को निहारा करता।
श्री वृंदावन धाम की प्यारी मालिन धन्य-धन्य है! वह ठाकुरजी के द्वार पर बैठकर प्रेमपूर्वक उनके लिए सुंदर-सुंदर फूलों की मालाएँ पिरोती हैं।
श्री ललित मोहिनी देव जी की कृपा से, मैं युगल सरकार श्री बिहारी-बिहारिनी के अनुपम केली विलास के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त कर रहा हूँ। श्रीधाम वृंदावन नित्य नवीन रूप में प्रकट हो रहा है। श्री ठाकुरदास बारंबार अपने आपको बलिहार कर रहे हैं।
दिव्य युगल श्री राधा-कृष्ण एक-दूसरे के अद्वितीय सौंदर्य एवं माधुर्य में पूर्णतः निमग्न हैं। उनके अंग-अंग से नित्य नवीन प्रेम की रसधारा प्रवाहित हो रही है, जिसकी अलौकिक शोभा का वर्णन करना असंभव है।
जिस भूमि पर काँटेदार करील के वृक्ष हैं, और जहाँ हर ओर खारे जल से भरे कूप ही दिखाई देते हैं।
स्वामी श्री हरिदास जी का भजन करो जो समस्त सारों का सार है । श्री ठाकुर दास जी कहते हैं कि श्री ललित मोहिनी देव जी की कृपा से नित्य विहार के इस अमूल्य रस को प्राप्त करने का सौभाग्य मिला है।
आज दीपावली का शुभ दिन है । ब्रज की युवतियाँ नंदनंदन श्रीकृष्ण के आँगन में आनंदपूर्वक मंगल गीत गा रही हैं और आँगन को सजा रही हैं।
नंदनंदन श्री कृष्ण पर बार-बार बलिहारी जाइए । श्यामसुंदर की मनोहर छवि को निहार-निहार कर सुख का पान कीजिए।
श्री वृंदावन परम मंगल एवं सुखप्रद धाम है जहां युगल किशोर ठाकुर एवं ठकुरानी सदा नित्य विहार पारायण हैं ।