27 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं

  1. जप नाम सदा प्रभु वल्लभ को - श्री रूपचंद जी ‘भूप’

    साधक को चाहिए कि वह सदा अपने प्राणप्रिय महाप्रभु श्री वल्लभ का नाम जपता रहे और उन्हीं के परम पावन यश का गान करता रहे। वह पुष्टिमार्ग के अलौकिक भगवद-रस के रंग में पूरी तरह रँग जाए और उनके द्वारा दिखाए गए, इस परम पवित्र मार्ग पर निरंतर चलता रहे।

  2. न तत्पुण्यैर्न तद्दानैर्न - स्कन्दपुराण, वैष्णवखण्डः (2), मार्गशीर्ष महात्म्य (5), अध्यायः (17), छंद (41)

    भगवान कहते हैं— मेरे परम पावन धाम ब्रज की प्राप्ति न तो पुण्य कर्मों से होती है, न दान से, न तपस्या से और न ही स्तुति-प्रार्थनाओं से। विविध प्रकार के योग-साधनों द्वारा भी इसे प्राप्त नहीं किया जा सकता। यह दिव्य धाम केवल मेरी अहैतुकी कृपा और अनुग्रह से ही प्राप्त होता है।

  3. रे मन कर वृन्दावन वास - श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली

    हे मन! अब तू श्री वृन्दावन में ही अखंड वास कर। संसार की व्यर्थ आशाओं को छोड़कर अब केवल अपनी स्वामिनी श्री राधा महारानी के चरणों का ही अनन्य आश्रय धारण कर।

  4. मूका जडांधबधिरास्तपो - स्कन्दपुराण, वैष्णवखण्डः (2), मार्गशीर्ष महात्म्य (5), अध्यायः (17), छंद (49)

    जो मनुष्य चाहे गूंगे, मूर्ख, अंधे, बहरे हों अथवा तप तथा नियमों से रहित हों— वे भी यदि ब्रज में मृत्यु को प्राप्त होते हैं, तो मेरे दिव्य लोक को प्राप्त होते हैं।

  5. सर्पदष्टाः पशुहताः पावकांबुविनाशिता - स्कन्दपुराण, वैष्णवखण्डः (2), मार्गशीर्ष महात्म्य (5), अध्यायः (17), छंद (50)

    जो भी ब्रज में मृत्यु को प्राप्त करते हैं, भले ही साँप के काटने से, जंगली पशुओं द्वारा, अग्नि में जलकर, जल में डूबने से अथवा किसी भी प्रकार की अकाल मृत्यु से, वे सभी मेरे दिव्य धाम को प्राप्त होते हैं।

  6. बाद ग्राम, मथुरा - श्री हित हरिवंश महाप्रभु का प्राकट्य स्थल

    मथुरा में स्थित बाद ग्राम राधावल्लभ संप्रदाय प्रवर्तक श्री हित हरिवंश महाप्रभु की जन्म भूमि है। इसलिए यह स्थान राधावल्लभ सम्प्रदायानुगत वैष्णवों के लिए एक तीर्थ स्थान है।

  7. फल भूमिर्व्रज भूमिर्दत्ता - स्कन्दपुराण, वैष्णवखण्डः (2), भागवतमाहात्म्यम् (6), अध्यायः (2), छंद (23)

    ब्रज की भूमि फल भूमि (अर्थात् साधना का फल) है जो पूर्व काल में उद्धव जी को प्राप्त हुई थी । जिस प्रकार यहाँ फल छुपे हुए हैं उसी प्रकार उद्धव जी भी यहाँ अदृश्य रहते हैं ।

  8. श्री ब्रज निधि जी की जीवनी (महाराजा सवाई प्रतापसिंह)

    महाराज प्रतापसिंहजी (ब्रजनिधिजी) सूर्यवंश की प्रख्यात शाखा कछवाहा-वंश के मानों सूर्य ही थे । महाराज श्री रामचंद्रजी से 196 वीं पीढ़ी में राजा सोढ़देवजी हुए, जो अपने वीर पुत्र दूलहरायजी सहित ढूँढाड़ देश में आकर यहाँ के यशस्वी राजा हुए ।

  9. श्री ललितलड़ैती जी की जीवनी 

    श्री ललितलड़ैती जी उन महात्माओं की परम्परा में आते हैं, जिन्होंने रासमंच के लिये लीलाओं को लिख कर रासानुकरण की विधा को समृद्ध किया है। इनका 'दम्पतिविलास' लीला-साहित्य की दृष्टि से एक ऐसा कोश-ग्रन्थ है, जिसमें लीला-सामग्री अपने फुटकर एवं संग्रथित - दोनों रूपों में विद्यमान है।

  10. श्री प्रियादास जी की जीवनी 

    भक्त प्रवर श्री प्रियादास जी का जन्म सूरत-नगर के राजपुरा नामक ग्राम में हुआ था। इनका जन्म 1683 से कुछ पूर्व का अनुमानित है।

  11. श्री हित रामदास जी की जीवनी 

    श्री रामदास जी वछवन ग्राम के निवासी थे जो कि ब्रज चौरासी कोस में इस नाम से विख्यात है। इनका जीवन काल 17th शताब्दी अनुमानित किया गया है।

  12. श्री किशोरदास जी की जीवनी 

    मत्स्य देश ढुंढाहर में आमेर नगर में महान् विद्वान्, धर्मी, गुणों के धाम तथा परम भागवत घासीराम सारस्वत ब्राह्मण रहते थे। वे कथा कहने में बड़े प्रवीण थे। उनकी पत्नी खेमा लक्ष्मी जी के समान सुन्दर, उदार और हरिभक्ता थी। उसी की कोख से श्री किशोरदास जी ने जन्म लिया।

  13. श्री हरिराय जी की जीवनी

    श्री हरिरायजी श्री गुसाईं श्री विट्ठलनाथ जी के प्रपौत्र और श्री कल्याणराय जी के पुत्र थे। श्री कल्याणरायजी श्री गोविंदलालजी (श्री गुसाईंजी के दूसरे पुत्र) के पुत्र थे।

  14. श्री गोविन्द स्वामी की जीवनी

    श्री गोविन्द स्वामी (1505 - 1586) मध्य प्रदेश के ग्वालियर के निकट आंतरी ग्राम में रहते थे। वहां ये इसी नाम से जाने जाते थे। इनके मन में सदा यही प्रश्न उठता की "भगवान के चरणारविन्दों की प्राप्ति कैसे होगी ?" इसी प्रश्न का सदैव विचार करते थे।

  15. श्री कृष्णदास अधिकारी जी की जीवनी

    गुजरात प्रान्त के चिलोत्रा ग्राम में 1496 में श्री कृष्णदास जी का जन्म हुआ था। ये शूद्र वर्ण के थे। कालांतर में महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य की कृपा से श्री कृष्णदास जी को श्रीनाथजी की सेवा प्राप्त हुई और ये पद रचना करते तथा श्रीनाथजी को सुनाते।

  16. श्री कुम्भनदास जी की जीवनी

    श्रीकुम्भनदास जी का जन्म 1499 की चैत्र कृ० 11 को गोवर्द्धन के पास जमुनावता नामक ग्राम में हुआ था। आप गौरवा क्षत्रिय थे।

  17. श्री हित रूपलाल जी की जीवनी

    1681 ई. के वैशाख कृ० 7 को श्रीहित हरिवंशजी महाराज के कुल में गोस्वामी श्रीरूप लालजी का जन्म हुआ। इनके पिता गोस्वामी श्रीहरिलालजी तथा माता श्रीकृष्णकुँवरि थीं।

  18. श्री पीताम्बर देव जी की जीवनी

    नारनौल ग्राम में सांझापुर नामक स्थान है जहाँ एक गौड़ ब्राम्हण कुल के धर्मात्मा रहते थे जिनका नाम श्री चौबेलाल था। ये वेद शास्त्र के पूर्ण ज्ञाता थे तथा बहुत धनवान भी थे। इनका वंश चौबे नाम से विख्यात था। इनकी पत्नी का नाम श्रीमती रामकुँवरि था।

  19. वृन्दावन कुम्भ

    कुम्भ (कलश) का सम्बन्ध अमृत कलश से है। जब अमृत कलश के लिए देवता और दैत्यों में युद्ध हुआ, तब अमृत कलश से पृथ्वी पर ४ स्थानों पर अमृत की कुछ बूँदें गिरी, जिसमे प्रयाग राज, हृषिकेश, नाशिक और उज्जैन है।