virah
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मन तन दृग राधा गहे - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (13)
श्रीराधा ने मेरे मन, शरीर और नेत्रों को पूरी तरह से अपने वश में कर लिया है, जिसके कारण अब मुझे किसी अन्य वस्तु या परिस्थिति की कोई सुधि नहीं रही है। हृदय में विरह का ऐसा तीव्र कोलाहल और व्याकुलता मची हुई है कि मन में जो कुछ भी उमड़ता है, मैं उन्मादवश वही बकने लगता हूँ।
हरिजन रोइ रोइ सुख पावें - श्री हित रूप लाल
श्रीहरि के वास्तविक प्रेमी भक्त उनके लिए आँसू बहाकर, अर्थात् हरि के लिए रो-रोकर ही परम सुख (रस) प्राप्त करते हैं। वे अपने तन को विरह की अग्नि-रूपी भट्टी में तपाकर, अपने हृदय में प्रियतम से मिलन की चाह-रूपी धातु को और अधिक सरस एवं प्रेममय बनाते हैं।
किशोरी मेरी हरो विरह की - श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (115)
हे मेरी किशोरी जी! आप मेरे विरह के दुःख को दूर कीजिए। हे करुणा की सागर, परम दयालु और लाड़ली श्रीराधा जी! आप हर प्रकार से सर्वसमर्थ हैं।
नैन बैन मन श्रवण सब - श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, विरह मंजरी (16)
विरहाकुल गोपी के नेत्र, वाणी, मन एवं कर्ण प्रियतम श्यामसुंदर के पास ही चली गई हैं। उनके शरीर-रूपी घट में केवल थोड़े-से प्राण ही इस आशा से शेष हैं कि प्रियतम पुनः लौटकर आएँगे।
किशोरी मैं तो भली बुरी सो तेरी - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (16)
हे किशोरी श्री राधे! मैं जैसी भी हूँ, भली या बुरी, केवल आपकी ही हूँ। मैं विरह की अग्नि में दिन-रात व्याकुल रहती हूँ, कृपा करके मेरी यह पुकार जल्दी सुन लीजिए।
टेरत श्यामाश्याम को दया विरह बिहाल - श्री दयाबाई
श्रीधाम वृन्दावन की पावन रज में श्यामा-श्याम के साक्षात्कार के दिव्य अनुभव को दयाबाई जी ने इस दोहे में व्यक्त किया है। वे कहती हैं कि विरह-वेदना से व्याकुल होकर जब वे निरंतर श्यामा-श्याम को पुकार रही थीं, तब एक दिन अचानक किसी कुंज में उन्हें श्री लाड़िली-लाल के दर्शन हो गए, और वे पूर्णतः कृतार्थ हो गईं।
लोचन स्याम सुधीर के मोचन विरह विसाल - श्रीभट्ट देवाचार्य, युगल शतक (63)
श्रीरंगदेवीजी श्रीललिताजी से कहती हैं- हे श्रीललिते ! श्री राधा के नेत्रों की ओर तो देख ! उनके ये नेत्र खंजन (पक्षी) की भाँति शोभायमान लग रहे हैं। यद्यपि श्रीप्रियाजी ने अपने नेत्रों में अञ्जन-धारण नहीं किया है, तथापि बिना अञ्जन के ही उनके ये खञ्जन-नेत्र वृन्दावन-बिहारी श्रीकृष्ण के हृदय की विरह-व्यथा को नष्ट करने वाले हैं।
गावत प्यारौ राधा तेरौ जसु - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (170)
हे श्रीराधे! तुम्हारे प्रियतम श्रीकृष्ण निरंतर तुम्हारा ही यश गा रहे हैं। वे केवल तुम्हारे ही नाम का जाप कर रहे हैं और विरह में बिलख (रो) रहे हैं। काम ने श्याम को इतना व्यथित कर दिया है कि वे तुम्हारे प्रेम में पूरी तरह व्याकुल हो उठे हैं।
आज सखि दोऊँ कुञ्जबिहारी - श्री दयाबाई
श्री दयाबाई जी की भगवद्प्राप्ति की प्रबल इच्छा को देखकर उनके गुरुदेव श्री चरणदास जी ने उन्हें आज्ञा दी कि वे वृन्दावन जाएँ और वहीं वास करें। तब उन्हें श्यामा-श्याम के जो दर्शन प्राप्त हुए, उनका वर्णन उन्होंने इस प्रकार किया है— हे सखी! आज दोनों कुञ्ज बिहारी (श्री लाड़ली लाल) निकुंज में अचानक मुझे मिल गए।
कहो पिय किन तोहिं रसिक बनायो - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, विरह माधुरी (80)
एक सखी कहती है कि हे प्रियतम ! यह तो बताओकि तुमको रसिक बनाया किसने है? तुम पूर्व शूकरावतार में अपने सौन्दर्य के बल पर कब 'मदन मोहन' कहलाये थे? मत्स्यावतार में तुमने मछली का शरीर धारण करके जल ही में रहते हुए कब गोपियों का चीर हरण किया था?
चकित नैन कंपत हियौ महा विरह की पीर - श्री अलबेली अलि
श्री अलबेली अलि, श्री राधा के दर्शन की व्याकुलता में अपने विरह की दशा का वर्णन करती हैं— “नयन अचंभित हैं, हृदय और शरीर में निरंतर कंपन हो रहा है। अश्रुधारा ऐसे प्रवाहित हो रही है मानो कोई झरना फूट पड़ा हो और वे यमुना तट पर श्री किशोरी जी के चिंतन में बेसुध पड़ी हुई हैं ।”
श्रीश्यामा मानो विनती मोरी - श्री सरस माधुरी जी
हे श्रीश्यामा! मेरी विनती स्वीकार कीजिए। मैं आपकी निज दासी हूँ, आपके चरणों की उपासिका हूँ। मैं जन्म-जन्म से केवल आपकी ही हूँ।
मैं तो तेरे दर्शन की हूँ भिखारी - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (125)
मैं तो तुम्हारे दर्शन की भिखारिन हूँ, हे भानु दुलारी श्री राधा! मेरी प्रार्थना सुन लीजिए। हे सर्वेश्वरी श्यामा! आप मेरा जीवन-धन हो, आप सब गुणों की खान और अति मनोहारिणी हो।
जुगल बिहारी विरह में - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय श्रृंगार शतक (98)
युगल विहार करने वाले श्री राधा-कृष्ण का वियोग अब और सहन नहीं होता। श्री ललित किशोरी कहते हैं कि हे किशोरीजी! कृपा कर अब मुझे वृन्दावन का वास प्रदान कीजिए ।
एक अखंडित एकरस निरवधि रति जो होइ - श्री रसिक देव जी की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (4)
जो अखंड, एकरस और अनंत होता है, जहाँ मिलन में भी व्याकुलता कम नहीं होती, अपितु निरंतर बढ़ती रहती है उसी को प्रेम कहा जाता है।
प्रिया मैं तो हूँ चेरिन की चेरी - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (125)
हे प्रियाजी (श्री राधे), मैं तो आपकी दासियों की भी दासी हूँ । अब मुझ पर कृपा करें, हे लाड़िली, क्योंकि बहुत अधिक विलंब हो चुका है।
प्रेम कटारी हँसि हँसि मारी - श्री गुरुछौना जी महाराज
मेरे मनमीत मोहन (श्रीकृष्ण) ने हँस-हँसकर प्रेम का खंजर चलाकर मुझे घायल कर दिया है।
जब परशे प्यारीचरण परम प्रीति नन्दनंद - श्री ब्रजवासीदास, ब्रज विलास
जब श्रीकृष्ण ने परम प्रीतिपूर्वक श्री राधा के चरणों का स्पर्श किया, तो उनका मान समाप्त हो गया, और वे प्रसन्नचित्त हो गईं जिससे दोनों के विरह-संताप का शमन हो गया ।
किशोरी मेरी सुनियो अरज सबेरी - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (114)
हे किशोरी जी, मेरी विनती को शीघ्र सुनिए। मैं चाहे जितना भी प्रयत्न कर लूँ, लेकिन करोड़ों जन्मों में भी मेरे पाप नहीं मिटेंगे।
रसिक जन बहु ना मिले सिंह यूथ नहिं होय - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (51)
रसिक संत बहुत अधिक नहीं होते (अर्थात् वे अत्यंत दुर्लभ हैं), जैसे सिंह का कोई झुंड नहीं होता। विरह रूपी बेल सब जगह प्रकट नहीं होती, और न ही घट घट में प्रेम होता है।