किशोरी मैं तो भली बुरी सो तेरी - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (16)
हे किशोरी श्री राधे! मैं जैसी भी हूँ, भली या बुरी, केवल आपकी ही हूँ। मैं विरह की अग्नि में दिन-रात व्याकुल रहती हूँ, कृपा करके मेरी यह पुकार जल्दी सुन लीजिए।
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हे किशोरी श्री राधे! मैं जैसी भी हूँ, भली या बुरी, केवल आपकी ही हूँ। मैं विरह की अग्नि में दिन-रात व्याकुल रहती हूँ, कृपा करके मेरी यह पुकार जल्दी सुन लीजिए।
श्रीधाम वृन्दावन की पावन रज में श्यामा-श्याम के साक्षात्कार के दिव्य अनुभव को दयाबाई जी ने इस दोहे में व्यक्त किया है। वे कहती हैं कि विरह-वेदना से व्याकुल होकर जब वे निरंतर श्यामा-श्याम को पुकार रही थीं, तब एक दिन अचानक किसी कुंज में उन्हें श्री लाड़िली-लाल के दर्शन हो गए, और वे पूर्णतः कृतार्थ हो गईं।
श्रीरंगदेवीजी श्रीललिताजी से कहती हैं- हे श्रीललिते ! श्री राधा के नेत्रों की ओर तो देख ! उनके ये नेत्र खंजन (पक्षी) की भाँति शोभायमान लग रहे हैं। यद्यपि श्रीप्रियाजी ने अपने नेत्रों में अञ्जन-धारण नहीं किया है, तथापि बिना अञ्जन के ही उनके ये खञ्जन-नेत्र वृन्दावन-बिहारी श्रीकृष्ण के हृदय की विरह-व्यथा को नष्ट करने वाले हैं।
हे श्रीराधे! तुम्हारे प्रियतम श्रीकृष्ण निरंतर तुम्हारा ही यश गा रहे हैं। वे केवल तुम्हारे ही नाम का जाप कर रहे हैं और विरह में बिलख (रो) रहे हैं। काम ने श्याम को इतना व्यथित कर दिया है कि वे तुम्हारे प्रेम में पूरी तरह व्याकुल हो उठे हैं।
श्री दयाबाई जी की भगवद्प्राप्ति की प्रबल इच्छा को देखकर उनके गुरुदेव श्री चरणदास जी ने उन्हें आज्ञा दी कि वे वृन्दावन जाएँ और वहीं वास करें। तब उन्हें श्यामा-श्याम के जो दर्शन प्राप्त हुए, उनका वर्णन उन्होंने इस प्रकार किया है— हे सखी! आज दोनों कुञ्ज बिहारी (श्री लाड़ली लाल) निकुंज में अचानक मुझे मिल गए।
एक सखी कहती है कि हे प्रियतम ! यह तो बताओकि तुमको रसिक बनाया किसने है? तुम पूर्व शूकरावतार में अपने सौन्दर्य के बल पर कब 'मदन मोहन' कहलाये थे? मत्स्यावतार में तुमने मछली का शरीर धारण करके जल ही में रहते हुए कब गोपियों का चीर हरण किया था?
श्री अलबेली अलि, श्री राधा के दर्शन की व्याकुलता में अपने विरह की दशा का वर्णन करती हैं— “नयन अचंभित हैं, हृदय और शरीर में निरंतर कंपन हो रहा है। अश्रुधारा ऐसे प्रवाहित हो रही है मानो कोई झरना फूट पड़ा हो और वे यमुना तट पर श्री किशोरी जी के चिंतन में बेसुध पड़ी हुई हैं ।”
हे श्रीश्यामा! मेरी विनती स्वीकार कीजिए। मैं आपकी निज दासी हूँ, आपके चरणों की उपासिका हूँ। मैं जन्म-जन्म से केवल आपकी ही हूँ।
मैं तो तुम्हारे दर्शन की भिखारिन हूँ, हे भानु दुलारी श्री राधा! मेरी प्रार्थना सुन लीजिए। हे सर्वेश्वरी श्यामा! आप मेरा जीवन-धन हो, आप सब गुणों की खान और अति मनोहारिणी हो।
युगल विहार करने वाले श्री राधा-कृष्ण का वियोग अब और सहन नहीं होता। श्री ललित किशोरी कहते हैं कि हे किशोरीजी! कृपा कर अब मुझे वृन्दावन का वास प्रदान कीजिए ।
जो अखंड, एकरस और अनंत होता है, जहाँ मिलन में भी व्याकुलता कम नहीं होती, अपितु निरंतर बढ़ती रहती है उसी को प्रेम कहा जाता है।
हे प्रियाजी (श्री राधे), मैं तो आपकी दासियों की भी दासी हूँ । अब मुझ पर कृपा करें, हे लाड़िली, क्योंकि बहुत अधिक विलंब हो चुका है।
मेरे मनमीत मोहन (श्रीकृष्ण) ने हँस-हँसकर प्रेम का खंजर चलाकर मुझे घायल कर दिया है।
जब श्रीकृष्ण ने परम प्रीतिपूर्वक श्री राधा के चरणों का स्पर्श किया, तो उनका मान समाप्त हो गया, और वे प्रसन्नचित्त हो गईं जिससे दोनों के विरह-संताप का शमन हो गया ।
हे किशोरी जी, मेरी विनती को शीघ्र सुनिए। मैं चाहे जितना भी प्रयत्न कर लूँ, लेकिन करोड़ों जन्मों में भी मेरे पाप नहीं मिटेंगे।
रसिक संत बहुत अधिक नहीं होते (अर्थात् वे अत्यंत दुर्लभ हैं), जैसे सिंह का कोई झुंड नहीं होता। विरह रूपी बेल सब जगह प्रकट नहीं होती, और न ही घट घट में प्रेम होता है।
जिस रस से नैनों को सुख प्रदान करने वाला सुख ही नष्ट हो जाय, वह सुख सच्चा सुख नहीं है । सच्चा सुख तो वह है जिससे वियोग की व्यथा सदा-सदा के लिए मिट जाय ।
हे श्री राधे, आपके अतिरिक्त मैं किससे विनती करूँ? हे श्यामा प्यारी, मेरी विनती सुनिये या फिर मुझे बता दीजिए कि मैं कब तक तुम्हारे विरह ताप को सहन करता रहूँ ।
जैसे जलचर जल में रहते हुए जल-वियोग की पीड़ा से अनभिज्ञ रहता है, परंतु उससे पृथक होते ही उसकी वेदना का अनुभव करता है, वैसे ही प्रभु-वियोग की वास्तविक पीड़ा वही जान सकता है जिसे उनके संयोग का साक्षात् अनुभव हुआ हो।
श्री सहचरीशरण देव जी का जन्म 1773 में कश्मीर के अवन्तिपुरी में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था । इनका नाम सखाराम था । इनके पिता का नाम सिखरराम था ।