राग बसंत

श्याम: सुवेषः सुकुसुमवासाः पलाश पुष्पाभरणानि यस्य। सानदं वक्त्रो धृत चाप बाणो गजाधिवाहः कथितो वसंतः॥ - देवर्षि नारद, राग निरूपणम् (21) बसंत सांवले वर्ण के हैं और सुन्दर फूलों की पोशाक धारण करते हैं। उनका सुन्दर चेहरा है, धनुष और तीर को पकड़े हुए हैं, जिनका वाहन हाथी है। वह पलाश के फूल धारण करते हैं। राग बसंत ऋतु के परिवर्तन और वसंत की नविनता को दर्शाता है। यह राग अपने स्वार्थ को दूर करने के लिए मन को प्रोत्साहित करता है। यह राग वसंत के दौरान किसी भी समय गाया जाता है।

23 संकीर्तन उपलब्ध हैं

  1. नवल दोउ आजु बसंत-से फूले - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (11.3)

    आज दोनों नित्य किशोर (श्री राधा-कृष्ण) वसंत ऋतु के समान खिले हुए हैं। गोरी किशोरी जी द्वारा श्यामसुन्दर के कंधे (अंस) पर अपनी भुजा डाल दिये जाने से, श्यामसुंदर उनकी भुज-मूल (बाँहों के आश्रय) में छिपे हुए से सुशोभित हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो श्याम घटा छिप गई हो और गोरे वर्ण की वासन्ती सुषमा छा गई हो।

  2. वृषभानु कुँवरि खेलति बसंत - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (961)

    वृषभानु की लाड़ली श्री राधा बसंत ऋतु में क्रीड़ा कर रही हैं, जहाँ उनके नवल प्रियतम श्यामसुन्दर भी विराजमान हैं। सखियाँ हर्ष से खिल उठी हैं। मृदंग, ताल और नगाड़े आदि वाद्य बज रहे हैं, और सुख की खान श्री राधा महारानी क्रीड़ा के लिए महल से बाहर पधारी हैं।

  3. सजनी नव निकुञ्ज द्रुम फूले - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (14)

    हे सखि! इस वसंत में नव-नव विकसित मधुरता से युक्त वृक्ष और लताएँ पूर्णतः खिल उठी हैं। इन पुष्पों से उदित सौरभ की रसमादकता ने पूरे वन को मोह लिया है, जिससे मत्त भ्रमरावलि गुंजार करती हुई प्रेम और आनंद का संचार कर रही है और वातावरण में मन्मथ (कामदेव) का अद्भुत उद्रेक हो रहा है।

  4. चलि चलिहि वृंदावन वसंत आयौ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (326)

    आओ, चलें! वसंत का वृंदावन में आगमन हो गया है । खिलते हुए फूलों के गुच्छे लहरा रहे हैं, और मंद समीर उनकी मधुर सुगंध दूर-दूर तक बिखेर रही है।

  5. ललित बसंत सघन वृंदावन - श्री राधा प्रसाद देव जू

    वसंत ऋतु के आगमन से वृंदावन के हरे-भरे वन आनंद से खिल उठे हैं, और लताएँ लहराते हुए झूम रही हैं। नवीन पल्लव एवं रंग-बिरंगे पुष्प प्रस्फुटित हो रहे हैं, कमल और भ्रमर अपनी मधुर रस क्रीड़ा में मग्न हैं।

  6. चलि राधा! तोकौं स्याम बुलावै - श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (1194)

    सखी श्री राधा से कह रही है—“हे श्री राधे! चलो, तुम्हारे प्रियतम श्यामसुंदर तुम्हें बुला रहे हैं। ज़रा चलकर देखो, वे अपनी वंशी के मधुर स्वरों में तुम्हारे नाम का ही सुमधुर गान कर रहे हैं।”

  7. नवल बसंत नवल श्रीवृन्दावन - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (84)

    श्रीवृन्दाबिपिन में सर्वत्र वसन्त की शोभा छायी हुई है। इसमें विहार-परायण श्रीराधा-कृष्ण की जोड़ी नवल है। उनके समीपस्थ सारी साज-सज्जा भी नवल है। श्रीधाम वृन्दावन भी नवल है, नवल कुसुमावलि फूली हुई है तथा ऋतुराज वसन्त भी तो नवल ही है।

  8. सहज प्रीति गोपालै भावे - श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (605)

    श्री गोपाल जी को केवल सहज प्रेम ही प्रिय है, जिसमें कोई बनावट नहीं होती। हे सखी, जब मैं अपने प्रियतम श्री कृष्ण का मुख देखती हूँ, तो उससे मुझे अपार सुख की प्राप्ति होती है, और जब वे नैन से नैन मिलाते हैं, तब तो आनंद की सीमा ही नहीं रहती।

  9. विहरत विपिन भरत रंग ढुरकी - श्री नागरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (48)

    श्रीवृंदावन में नित्यविहार-परायण लाड़िली (श्री राधा) प्रसन्न होकर लाल (श्री कृष्ण) पर प्रेम-रंग की वर्षा कर रही हैं। हर्ष से भरकर उन्होंने कुसुम-पराग रुपी गुलाल हाथों में भरकर आकाश में उड़ा दिया है।

  10. खेलत मदन गोपाल बंसत - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (1165)

    श्री मदन गोपाल आज बसंत खेल रहे हैं । उनके संग में नवल रसिक चूड़ामणि श्री राधिका हैं जिनके संग राधिका कंत श्री श्यामसुन्दर शोभायमान हैं ।

  11. खेल बसंत फाग श्रीदम्पति - श्री सरस माधुरी

    नित्य दम्पति श्री श्यामा श्याम प्रेम रंग में भींजे हुए वसंत ऋतु का होली खेल रहे हैं। दोनों अति अनुराग में भरे मदमस्त हैं एवं एक-दूसरे को गलबहियाँ दिए हुए हैं।

  12. जुगल किसोर मेरे कुंजबिहारी प्यारी - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (15)

    बसंत की छवि का वर्णन करते हुए सखी कहती है कि हमारे युगल बिहारी बिहारिनी वन विहार करते हुए नव नव रंगों को प्रकाशित कर रहे हैं ।

  13. देखोऊ प्यारी कुंजबिहारी मूरति - श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (57)

    हे सखी, बसंत के इस मौसम में श्री कुंजबिहारी को मूर्ति की भाँति अर्थात् अहर्निश निहार। उनके तरुण एवं नित्य नवीन तन से रस की वर्षा हो रही है।

  14. चलि री भीर तें न्यारेई खेलैं - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (100)

    श्री कृष्ण श्री राधिका से कहते हैं: हे प्यारी जी! भीड़ से हट एकान्त में क्यों न हम और आप कुंजों एवं निकुंजों के मध्य कोई न्यारा खेल खेलें ।

  15. श्रीबिहारीजू खेलत बसंत - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (20)

    श्रीबिहारी जी वसन्तका खेल-खेल रहे हैं । आनन्द से भरी सब सखियाँ भी वहाँ उपस्थित हैं और हैं श्री किशोरी जी जिनके प्रत्येक अंग में रूप खिला है ।

  16. सजनी नव निकुंज सु केलि - श्री हित कमलनैन जी की वाणी, अष्टायामी पदावली (180)

    हे सखी, श्री प्रिया प्रियतम की नव निकुंज की केलि परम अद्बुत है । गौर वर्ण श्री राधिका श्याम वर्ण श्री कृष्ण से ऐसे आनंद से लिपटी हैं मानों तमाल वृक्ष से बेलि लिपटी हुई रहती हैं ।

  17. खेलत आजु प्रिया नव - श्री ललित मोहिनी देव जू, श्री ललित मोहिनी देव जू की वाणी (45)

    आज श्री प्रिया जी [श्री राधा] अद्बुत ही रंग में नित्य विहार रस में उन्मत्त हैं । श्री ललित मोहिनी जी की नित्य संगी श्री प्रिया जी चमक रही हैं, झूमते हुए श्री श्याम सुंदर के उर से लगी हुई उन्मत्तता में भरकर विहार कर रही हैं ।