किशोरी मेरी हरो विरह की - श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (115)
हे मेरी किशोरी जी! आप मेरे विरह के दुःख को दूर कीजिए। हे करुणा की सागर, परम दयालु और लाड़ली श्रीराधा जी! आप हर प्रकार से सर्वसमर्थ हैं।
भस्मांगलिप्तावयवः सुगात्रो भालस्थले शोभित शीत रश्मिः। त्रिशूलहस्तो वृषमाधिरूढ़ो स भैरव यः कथिता मुनींद्रैः॥ - देवर्षि नारद, राग निरूपणम् (55) भैरव के हाथ में एक त्रिशूल है, उनके सुंदर शरीर पर सम्पूर्णतः भस्म लगी है। वे ऋषि नारद के अनुसार बैल पर विराजमान हैं। ऋतु: "शरद" (सितंबर और अक्टूबर) समय: सुबह 5 बजे विवरण: राग भैरव का प्रतिनिधित्व दिव्य विशेषताओं से होता है, सीर पर जटा सुशोभित हो रही है, भगवान शिव की सीधी और असाधारण आकृति, ललाट पर तीसरी आंख प्रतिष्ठित है, उन्होंने सफेद वस्त्र धारण किया है और उनके गले में नरमुंडो की माला सुशोभित है। भाव: शिव के समान, भैरव एक अप्रतिष्ठित मुद्रा में और शांत मन से पूरी तरह से भगवान "विष्णु" के ध्यान में तल्लीन, "हरि" के पवित्र नाम का जप कर रहे हैं। औषधीय मूल्य: यदि शास्त्रों के अनुसार व्यवस्थित रूप से गाया या बजाया जाए तो राग भैरव में निम्नलिखित गुणात्मक मूल्य होते हैं: - यह खांसी तथा यकृत के रोग को ठीक करता है, हृदय की क्रिया को नियंत्रित करता है और जीवन शक्ति उत्पन्न करता है।
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हे मेरी किशोरी जी! आप मेरे विरह के दुःख को दूर कीजिए। हे करुणा की सागर, परम दयालु और लाड़ली श्रीराधा जी! आप हर प्रकार से सर्वसमर्थ हैं।
हे प्यारी किशोरी जी! आप सदैव मेरे नेत्रों में निवास करें। आप श्री वृन्दावन के निकुञ्ज भवन में वास करती हैं, जहाँ ललिता आदि सखियाँ निरंतर आपकी सेवा में आपके साथ रहती हैं।
सब प्रकार के सुखों को प्रदान करने वाली श्री यमुना जी की बारंबार जय हो, जय हो। आप भक्तों पर अत्यंत कृपा करने वाली और साक्षात् करुणा की मूर्ति हैं। आप सदा सबका मंगल (कल्याण) करने वाली और समस्त अमंगलों (दुखों व संकटों) को हरने वाली हैं।
श्री राधा जी के चरण कमलों की परम-पावन रज ही मेरा सर्वस्व धन है। मैं मन, वचन और कर्म से केवल अपनी श्री श्यामा महारानी की ही अनन्य दासी हूँ।
हे स्वामिनी! मेरी समस्त भूल-चूक और दोषों को त्यागकर, अपनी ओर (अपनी कृपा की ओर) देखते हुए मुझे निकुंज में वास प्रदान कीजिए। मैंने तीनों लोकों में तुम्हारी जोड़ी (अर्थात् श्री राधा-कृष्ण) के समान ऐसी ललित और मनोहारी जोड़ी न तो कभी सुनी है और न ही देखी है।
प्रभात बेला में जैसे ही सखियों के कानों में भौंरों की मधुर गुंजार पड़ी, वे आनंद-विभोर होकर महल की ओर बढ़ चलीं। उनकी चाल ऐसी प्रतीत हो रही थी मानो प्रेम की नदी उफनकर रूप के अपार महासागर की ओर प्रवाहित हो रही हो।
हे गुरुदेव! मैं आपका बालक हूँ, और आप मेरी सच्ची माता हैं, जो प्रत्येक क्षण मेरी रक्षा करती हैं।
हे प्यारीजू (राधे)! आपमें कोई भी दोष नहीं है (अर्थात् आपकी कृपा में कोई कमी नहीं है)। दोष तो मुझमें ही है, क्योंकि मैं तो अवगुणों की मोट (गठरी) हूँ।
मेरी मदन मोहन (श्रीकृष्ण) से एक अंतरंग यारी बन गई है। उनके टेढ़े मुकुट की लटक मेरे हृदय में ऐसे बस गई है कि अब उनके अतिरिक्त मेरी किसी और से लगन ही नहीं रही।
घने वृक्षों और प्रफुल्लित लताओं से सुसज्जित वन को देखकर, ब्रजवासियों के हृदय आनंद से भर उठते हैं।
मैंने सब प्रकार से बिगाड़ ली है । मैंने वेद-शास्त्रों की मर्यादा, संसार की लाज, और कुल की मान-मर्यादा, सभी का त्याग कर दिया है।
श्री कृष्ण नागरि (श्री राधा) के वशीभूत हो गये हैं। वे उन घोष (गोपालक) कुल को उजागर करने वाली श्री राधा के नेत्र-कटाक्ष और उनकी टेड़ी चितवन पर रीझे हुए हैं।
हे किशोरी जी (श्री राधा), मेरी समस्त भव-बाधाओं का हरण कीजिए, जिससे मैं आपकी कृपा को प्राप्त कर सकूँ। इस त्रिभुवन में मुझसे बड़ा पापी कोई नहीं है, यह मैं सत्य कहता हूँ।
श्री राधा के चरणों की जय हो जिनमें हमारे रसिकों के अनन्य मुकुट मणि, सदा काल, रमें रहते हैं ।
मैंने सुना है कि निर्बल के बल भगवान हैं। प्राचीन संत भी साक्षी हैं कि जो अपने आपको भगवान के भरोसे छोड़ देते हैं, उनके सभी बिगड़े काम प्रभु स्वयं संवार देते हैं।
अब मैं श्री राधा चरणों में पूर्ण रूप से आश्रित हो चुकी हूँ । वे मुझे जहां भी ले जायेंगीं, मैं वहीं चल दूँगी; अब मैं उनके द्वारा छली जा चुकी हूँ ।
दिव्य युगल किशोर-किशोरी की जोड़ी कुंज-भवन में केलि-परायण है।
मुझे मेरी स्वामिनी श्री राधिका बहुत प्यारी लगती हैं । उनके मृग के समान नैन हैं, कोयल के समान वाणी है, एवं प्रियतम श्री श्यामसुन्दर को सुख दान करने वाली हैं ।
हे सुख राशि लाड़ली [श्री राधे], आप ही बताओ, मेरे अवगुण तो कितने होंगे, परंतु आप तो अपार करुणा की समुद्र हो, अत: आप मेरे अवगुणों को न विचारते हुए मुझ पर अपनी कृपा बरसाइये ।
श्री राधा प्यारी प्रकट हुई हैं, जो रूप की राशि हैं जिनके प्रत्येक अंगों की माधुरी परम अद्भुत है जिसका वर्णन करना असंभव है ।