राग धनाश्री
दूर्वादलश्यामतनुमनोज्ञा कांतं लिखति विरहवेदना।
श्वेते कपोले नयनोद बिन्दु निष्पंद निर्धूत कुचा धनाश्री॥
- देवर्षि नारद, राग निरूपणम्
धनाश्री बसंत की पत्नी हैं और हरे घास के वर्ण की हैं। वह अपने पति को एक पत्र लिखकर वियोग की पीड़ा व्यक्त कर रही हैं। उनकी आँखों से बहते आँसू उसके गोरे गालों को गीला कर रहे हैं जबकि उनकी छाती गहरी साँसों के कारण हिल रही है।
राग धनाश्री को दोपहर के समय गाया जाता है।
48 संकीर्तन उपलब्ध हैं
दूलह मदनगोपाल राधा नव दुलही - श्री सूरदास मदनमोहन जी की पदावली (47)
श्री मदनगोपाल (कृष्ण) दूल्हा हैं और श्री राधा उनकी नवल दुलहन हैं। इन दोनों की युगल छवि ऐसी सुशोभित हो रही है, मानो किसी नवीन तमाल के वृक्ष से लिपटकर कोई कंचन (स्वर्ण) की बेल विकसित होकर लहरा रही हो।
राधा प्यारी तेरे नैंन सलोल - श्री हित हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (23)
हित सखी (श्री हरिवंश महाप्रभु) भाव-विभोर होकर कहती हैं— हे प्यारी राधे! आज तुम्हारे नेत्र अत्यंत चंचल और मदमाते हैं। तुमने अपनी अनन्य प्रीति, अनुराग और कंचन के समान कांतिवान गौर देह से रसिकलाल श्रीकृष्ण को पूर्णतः अपने वश में कर लिया है।
राखि दृढ़ भरोसो तोको पोषैगी जय श्रीराधा - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी, विनयावली (161)
श्रीराधा पर अटूट विश्वास रख, ऐसा निश्चित मान कि स्वयं साक्षात् श्रीराधा ही तेरा पालन-पोषण करेंगी।
मेरी सुधि लीजौ हो, ब्रजराज - श्री सूरदास, सूर सागर
हे व्रज के नाथ, श्री कृष्ण! कृपा कर मेरी सुधि लीजिए। इस संसार में मेरा और कोई नहीं है । आप ही मेरी बिगड़ी को बनाने वाले हैं!
छबीली राधे कब दरसन दैहौ - ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रजनिधि पद संग्रह (25)
हे छबीली राधे! मुझे कब आप अपने दर्शन से तृप्त करेंगीं? मेरी अँखियाँ चकोरी पक्षी की भाँति आपके चंद्रमुख की सुधा-रस पान करने के लिए व्याकुल हैं।
बेसर कौन की अति नीकी - श्री हित दामोदर दास
बेसर (बुलाक) कौन की अधिक सुंदर है ? इस बात पर प्रिया-प्रियतम में होड़ लग गई और हृदय की चौंप बढ़ गई ।
प्यारी तोहि वुरी वान जह मान की - श्री रामराय जी, आदिवाणी (36)
श्रीकृष्ण श्रीराधा से कहते हैं, “हे प्यारी जू! आपकी यह मान करने की आदत मेरे लिए अत्यंत कष्टदायक है”। यदि आपकी थोड़ी सी भी टेढ़ी भौंहें देख लेता हूँ, तो मेरे प्राण अति व्याकुल हो उठते हैं, अपनी सुधि-बुधि खो बैठता हूँ ।
तेरौ बुरौ न कोऊ मानै - श्री सूरदास, सूर सागर
हे ज्ञान मार्गी उद्धव! हम तेरी ब्रह्म ज्ञान की बातों का कोई बुरा नहीं मानते क्योंकि हमारी रस की बातें तो कोई रसिक ही समझ सकता है, कोई नीरस (रस विहीन) ह्रदय वाला कैसे समझेगा ?
मोहनलाल के रसमाती - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (20)
हे राधे ! तू मोहन लाल के रस में उन्मत्त है। हे नव वधू ! उस एकान्त मिलन की गोप्य बात को क्यों मुझसे छिपा रही है? इसीलिये न कि प्रथम स्नेह के कारण संकोच है !
प्रान पिया प्रीतम प्यारे को - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष
एक सखी कहती है कि आज मैं अपने प्राण प्रियतम श्री कृष्ण को रंग में डुबा दूंगी। प्यारे को अपने ह्रदय से लगा लुंगी, किसी कलंक से नहीं डरूंगी, सब लोक-लाज तृण के समान त्याग दूंगी।
जापै कृपा कर श्रीराधा - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (140)
जिस पर श्री राधा कृपा करतीं हैं केवल उसे ही श्री वृन्दावन का वास प्राप्त होता है। श्री वृन्दावन दिव्य एवं अलौकिक है, यहाँ की भूमि सुहावनी है, जो युगल दम्पति श्री श्यामाश्याम का निज धाम कहलाता है।
जौ हम भले बुरे तौ तेरे - श्री सूरदास, सूरसागर
चाहे हम अच्छे हों या बुरे, हैं तो हम आपके ही ।हे प्रभु! हमारी लाज और प्रसिद्धि आपके ही हाथों में है; कृपया मेरी प्रार्थना सुनें!
मैं कैसें रस रासहिं गाऊँ - श्री सूरदास, सूरसागर
मैं किस प्रकार रास रस का वर्णन करूँ ? श्यामसुन्दर की प्यारी श्रीराधिका जू की कृपा से ही केवल मैं ब्रज का वास प्राप्त कर सकता हूँ!
रे मन मूरख जनम गँवायौ - श्री सूरदास, सूरसागर
अरे, मूर्ख मन, तू व्यर्थ ही अपने जीवन को गँवा रहा है । तूने अभिमान में भरकर, विषय रस को ही ग्रहण किया और हरि से विमुख होकर हरि का गुणगान नहीं किया ।
जय राधे, श्रीकुञ्ज बिहारिनि - श्री जुगलप्रिया जी
हे कुञ्ज बिहारिणी श्री राधा, आपकी जय हो, मुझे शीघ्र श्री वृन्दावन का वास प्रदान कीजिये । वहाँ के लता-वृक्ष, यमुना जल, रज तथा सत्संग के रंग में मैं भीग जाऊंगा ।
बेसर कौन की अति नीकी - श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, पदावली (69)
श्री राधा और श्री कृष्ण दोनों ने अपनी बेसर (नथ) पर दांव लगाया और ललिता जू से पूछा, "किसकी नथ अधिक सुंदर है?"
श्री राधा नाम रटो सुखकारी - श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (127)
सुखकारी “श्री राधा” नाम को रटो । श्री श्यामा प्यारी रूप से उज्जवल हैं और समस्त सखियों की सरदार हैं ।
अब मैं नाच्यौ बहुत गुपाल - श्री सूरदास
श्री सूरदास जी कहते हैं - हे गोपाल! अब मैं बहुत नाच चुका । काम और क्रोध का जामा पहनकर एवं विषय (चिन्तन) की माला गले में डालकर ।
राधे प्यारी तें मोहन वस कीनौं - श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (25)
हे श्री राधे प्यारी! आपने तो श्याम सुंदर को नित्य ही अपने वश में कर रखा है । समस्त लोक जिनके वश में हैं वही श्यामसुन्दर भगवान श्री कृष्ण आपके आधीन हैं ।
तन मन नवल जुगल पर वारौं - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (1346)
अपने तन मन को दिव्य युगल श्री राधा कृष्ण पर समर्पित करता हूँ । मैं बार-बार गौर श्याम वर्ण की युगल जोड़ी को कुंज के भीतर किसी द्वार से निहारता रहूँ ।