राग मल्हार
राग मल्हार मूसलाधार बारिश से जुड़ा है और यह राग इतना शक्तिशाली है कि जब गाया जाता है, तो यह बारिश को प्रेरित कर सकता है।
76 संकीर्तन उपलब्ध हैं
आजु दोउ दामिनि मिलि बहसीं - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (55)
हे सखी! आज दो दामिनियों में परस्पर होड़ लगी है। दोनों अत्यंत नवीन श्याम घटाओं के बीच रहकर उनके श्यामल रंग में रंगी हैं। एक दामिनी (बिजली) आकाश की श्याम घटाओं के बीच चमक रही है और दूसरी श्रीराधा हैं, जो श्याम मेघ के समान वर्ण वाले श्रीकृष्ण के संग शोभायमान हो रही हैं।
तुम तजि और कौन पै जाउँ - श्री सूरदास, सूरसागर (164)
हे प्रभु! आपको छोड़कर मैं और किसके पास जाऊँ? मैं किसके द्वार पर जाकर अपना सिर झुकाऊँ और दूसरों के हाथों अपने-आप को क्यों बेचूँ, अर्थात् किसी अन्य का आश्रय क्यों लूँ?
झूलत दोऊ ललित हिंडोरें झूमत - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, वन कुंजन झूलन लीला (28)
श्री राधा-कृष्ण दोनों ही अत्यंत सुंदर हिंडोले पर झूल रहे हैं। झूलते समय वे परस्पर एक-दूसरे के ऊपर झुकते और गिरते हैं, जिससे उनके अंग-अंग से अद्भुत सौंदर्य की हिलोरें उठ रही हैं।
नीके द्रुम फूले-फूल सुभग - श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (29)
परम पावन श्री यमुनाजी के पुलिन पर समस्त तरु-लताओं में अलौकिक पुष्प विकसित हो रहे हैं। आकाश में सघन श्याम-घटाओं के मध्य सतरंगी इंद्रधनुष की अनुपम छटा सुशोभित हो रही है।
दोऊ जन क्रीडत हैं बन माँहि - श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (720)
युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) वृन्दावन में क्रीड़ा कर रहे हैं। चारों दिशाओं से उमड़ते-घुमड़ते हुए काले बादलों को देखकर उनके हृदय में आनंद समा नहीं रहा है।
प्यारी नित ऐसे ही तुमें निहारूंहै - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, प्रेम परीक्षा लीला (21)
हे प्यारी जू! मेरी यही अभिलाषा है कि मैं नित-निरंतर आपको इसी प्रकार निहारता रहूँ। आपके इस चंद्रमा के समान सुंदर मुखमंडल की नज़र उतारने के लिए मैं तिनका तोडूँ और राई-नमक न्योछावर करूँ।
हिंडोरे झूलत री सुरंग चूनरी पहिरें - श्री हित रूप लाल
सुंदर रंगों वाली चुनरी धारण किए श्री प्रिया जी मनोहर हिंडोले में झूल रही हैं। उनके प्रियतम लाल बिहारी बड़े अनुराग और उत्साह से उन्हें झुला रहे हैं और प्रेमवश बार-बार उन पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर रहे हैं। श्री राधा के अनुपम सौंदर्य की लहरें चारों ओर छा रही हैं।
झूलत फूलत कुंजविहारी - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (321)
निकुंज में कुंजविहारी झूला झूल रहे हैं एवं प्रफुल्लित हो रहे हैं, और दूसरी ओर किशोरवल्लभा, वृषभानु की दुलारी, श्री राधा महारानी विराजमान हैं।
निकुंज में ठाढ़े जुगल किसोर - श्री रूप मंजरी
निकुंज में युगल सरकार, श्री राधा-कृष्ण युगल अत्यंत सुशोभित हैं, दोनों ने एक-दूसरे के गले में बाँहें डाल रखी हैं। आलस्य से भरी प्रभात बेला में वे जागे हैं, और उनके प्रेम की छाया से मानो भोर भी रंजित हो गई है।
मनमोहन सम सुन्दर को है - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, प्रेम परीक्षा लीला (4)
मनमोहन श्रीकृष्ण जैसा सुन्दर और कोई नहीं। मेरे अनुमान से तो उनकी समानता कोई दूसरा नहीं कर सकता।
जो कोऊ वृन्दाविपिन बसै - श्री हित दामोदर दास, फुटकर वाणी (172)
जो कोई भी श्रीधाम वृन्दावन में वास करता है — चाहे उसके पाप पर्वत के समान भारी क्यों न हों, वृन्दावन के प्रभाव से वे सहज ही नष्ट हो जाते हैं ।
गरजनि घन अरु दामिनी - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (68)
वर्षा ऋतु के आगमन पर मेघों की गर्जना, विद्युत की चमक, चातक, कोयल, शुक और मोर के मधुर स्वर वातावरण को सुखमय बना रहे हैं। काजल से भी अधिक काले बादल चारों ओर से उमड़-घुमड़ कर आकाश कर घिर आए हैं।
झूलत ये दोऊ रूप अपार - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, वन कुंजन झूलन लीला (25)
असीम रूप-सौंदर्य वाले श्री श्याम-श्यामा दोनों झूला झूल रहे हैं। वृषभानु सुता श्री राधा गोरी अत्यंत भोली हैं, और नंदकुमार अनुपम छवि के भंडार हैं।
ललित लतान पर नन्हीं नन्हीं बूँद परें - गोस्वामी श्री हरिराय जी
मनमोहक लताओं पर वर्षा की नन्हीं-नन्हीं बूँदें गिर रही हैं और राधा-कृष्ण दोनों प्रेममय भीग रहे हैं।
सघन बन झूलें दोऊ सुकुमार - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (24)
वृंदावन के हरे-भरे, सघन वन में युगल किशोरी श्री राधा-कृष्ण एक संग झूला झूल रहे हैं। उनके हृदय हर्षोन्माद से भरे हुए हैं, वे बार-बार एक-दूसरे की छवि निहार रहे हैं, और प्रत्येक क्षण उनका प्रेम और अधिक बढ़ता जा रहा है।
जमुना तट स्याम घटनि की पाँति - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (28)
पावस की छटा का वर्णन करती हुई श्रीविपुलबिहारिनदासीजी कह रही हैं कि श्रीयमुनाजी के तट पर स्याम रंग की घटाएँ सुशोभित हो रही हैं।
वृंदावन क्यों न भये हम मोर - श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (1375)
हे विधाता! मुझे वृंदावन का मोर क्यों नहीं बनाया? जहाँ मैं गोवर्धन पर्वत पर वास करता और नंदकिशोर श्रीकृष्ण को निहारा करता।
नव किशोरी नव किशोर बनी है विचित्र जोरी - श्री चतुर्भुज दास
युगल किशोरी-किशोर नवयौवन से युक्त, अनुपम सौंदर्य की दिव्य मूर्तियाँ हैं। श्रीकृष्ण, जो स्वयं कामदेव को मोहित करने वाले हैं, सौंदर्य के सागर हैं; और श्रीराधा, रूप-लावण्य की साक्षात मूर्ति हैं।
हमारी हेली स्वामिनी परमदयाल - श्री सरस माधुरी
हमारी स्वामिनी (श्री राधा) परम दयालु हैं । कीर्ति कुमारी अत्यंत कृपालु हैं एवं सदा श्री श्यामसुन्दर को सम्मान देती हैं ।
छबि निधि बिहरत प्रीतम प्यारी - श्री किशोरी अलि
सुंदरता की निधि, श्री प्रीतम प्यारी (श्री राधा कृष्ण), वृंदावन में विचरण कर रहे हैं। वे सघन बादलों से बरसते हुए जल और वृंदावन के हरे-भरे वनों को निहार रहे हैं।