राग रामकली

राग रामकली एक प्रातःकालीन मधुर राग है।

22 संकीर्तन उपलब्ध हैं

  1. होरी खेलैं श्यामा श्याम - श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (808)

    श्री श्यामा-श्याम होली के आनंदमय रंगों में मग्न हैं, उनकी मोहक दृष्टियाँ प्रेम के रंगों में सराबोर हो रही हैं। कमान-सी टेढ़ी भौहें जल-वृष्टि करने वाली पिचकारी के समान, मधुर मुस्कान से युक्त, नयन-बाणों की वर्षा कर रही हैं।

  2. माई मोकों जुगलनाम निधि भाई - श्री जुगलप्रिया जी

    हे सखी, मुझे तो परम धन युगल नाम (राधाकृष्ण) ही अच्छा लगता है। संसार की समस्त सुख-संपत्ति झूठी है, यह न हमारे संग जन्म से आयी है न मृत्यु के बाद संग जाएगी।

  3. जाकी है उपासना, ताहीकी वासना - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (179)

    साधक को जिस इष्टदेव (श्री राधा कृष्ण) की उपासना प्राप्त है, उसे केवल उन्हीं को प्राप्त करने की इच्छा बनानी चाहिए। उन्हीं के नाम, रूप, लीला एवं गुणों का गान करना चाहिए।

  4. लाल की अँखियाँ रूप लुभानी - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (41)

    श्री लालजी [कृष्ण] की अँखियाँ सदा श्री राधा के रूप से मोहित रहती हैं । यूँ तो उनकी अँखियाँ सदा श्री राधा रूप रस को पीती रहती हैं, फिर भी वे तृप्त नहीं होती ।

  5. श्री राधा नाम रटो दिन रैन - श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (126)

    दिन रात "श्री राधा" नाम का रटन करो । जिसके प्रभाव से समस्त भव-बाधा मिट जाती है एवं चित्त को परम शांति प्राप्त होती है ।

  6. तेई रसिक अनन्य जानिवै - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्द्ध (178)

    श्री हरिराम व्यास कहते हैं "जिनका अंतःकरण विषय-विकार से शून्य हो गया है एवं श्री हरि के प्रेम में डूबा हुआ है, ऐसे साधु जनों को ही रसिक अनन्य मानना चाहिए।"

  7. देखों देखों री नागरनट - श्री नंददास, नंददास ग्रंथावली, पदावली (119)

    श्री नंददास कहते हैं "अरे सखी, तनिक देखो तो नागरनट को, सर पर मुकुट लटक रही है, श्री यमुना के पुलिन पर गोपियों के मध्य कैसा अनुपम नृत्य कर रहे हैं।"

  8. कुँवरि राधिका तुम सकल सौभाग्य सींवा - श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (159)

    श्री कुम्भनदास कहते हैं "हे कुँवरि राधिका जू, आप समस्त सौभाग्य की सीमा हो, आपके इस स्वरुप पर मैं करोड़ों करोड़ों चंद्रमाओं को न्योछावर कर दूँ। मेरे मन में यह विचार भी आ रहा है की आपके नयन कमलों पर करोड़ों करोड़ों खंजन पक्षी तथा मृगों को न्योछावर कर दूँ, जिनके नेत्र विश्व में सबसे सुन्दर माने गए हैं।"

  9. उधो, मन न भए दस बीस - श्री सूरदास

    गोपियां कहती है, हे उद्धव, मन तो हमारा एक ही है, दस-बीस मन तो हैं नहीं कि एक को किसी के लगा दें और दूसरे को किसी और में। अब वह भी नहीं है, कृष्ण के साथ अब वह भी चला गया हमारा नहीं रहा । तुम्हारे निर्गुण ब्रह्म की उपासना अब किस मन से करें ?

  10. राधिका श्याम सुन्दर को प्यारी - श्री छीतस्वामी

    श्री राधिका श्याम सुंदर की अत्यंत प्यारी हैं । श्री राधिका जू के नख सिख [नख से सिख अर्थात् प्रत्येक अंग] की माधुरी पे कोटि कोटि चंद्रमा को नयौछावर किया जा सकता है ।

  11. बसौ मेरे नैननि में दोउ चंद - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (53)

    श्रीभट्ट देवाचार्य कह रहे हैं "मेरी आँखों में वृन्दावन के दोनों चंद्र श्री राधा कृष्ण ही बसे हैं, गौर वर्ण की श्री वृषभानु नंदिनी हैं और श्याम वर्ण के नन्द नंदन।