धाइके जाइ जी जमुना-तीरे - श्री छीत स्वामी जी की वाणी (164)
दौड़कर यमुना के तट पर चलो। उसकी महिमा कहाँ तक वर्णित की जा सकती है? यमुना जी के नीर का स्पर्श करते ही हृदय प्रेम से सराबोर हो जाता है।
राग रामकली एक प्रातःकालीन मधुर राग है।
22 संकीर्तन उपलब्ध हैं
दौड़कर यमुना के तट पर चलो। उसकी महिमा कहाँ तक वर्णित की जा सकती है? यमुना जी के नीर का स्पर्श करते ही हृदय प्रेम से सराबोर हो जाता है।
हे सखी! मेरे हृदय को युगल नाम रूपी निधि भा गई है । इस संसार की सुख-संपत्ति झूठी है, मृत्यु के समय कुछ भी साथ नहीं जाती।
मेरे नेत्र श्यामसुंदर के बिना दाम के गुलाम बन गए हैं। इस ग़ुलामी में इन्हें उस कोटि का सुख प्राप्त होता है कि ये मुड़कर मेरी ओर देखते तक नहीं।
श्री श्यामा-श्याम होली के आनंदमय रंगों में मग्न हैं, उनकी मोहक दृष्टियाँ प्रेम के रंगों में सराबोर हो रही हैं। कमान-सी टेढ़ी भौहें जल-वृष्टि करने वाली पिचकारी के समान, मधुर मुस्कान से युक्त, नयन-बाणों की वर्षा कर रही हैं।
उन्हीं को रसिक-अनन्य जानना चाहिए, जिनके अंदर विषय-विकार नहीं, अपितु श्री हरि से रति है। उन्हें ही साधु मानना चाहिए।
हे परम कृपालु, श्री श्याम श्याम! अब आप अपनी ओर निहारो । मेरे अवगुणों को न देखते हुए आप अपनी प्रतिष्ठा पर विचार कीजिए ।
हे सखी, मुझे तो परम धन युगल नाम (राधाकृष्ण) ही अच्छा लगता है। संसार की समस्त सुख-संपत्ति झूठी है, यह न हमारे संग जन्म से आयी है न मृत्यु के बाद संग जाएगी।
मेरा बल केवल दो ठौर में है । एक बल श्री हरि भक्तों का है और दूसरा बल नंदनंदन श्री कृष्ण चन्द्र का है ।
साधक को जिस इष्टदेव (श्री राधा कृष्ण) की उपासना प्राप्त है, उसे केवल उन्हीं को प्राप्त करने की इच्छा बनानी चाहिए। उन्हीं के नाम, रूप, लीला एवं गुणों का गान करना चाहिए।
श्री लालजी [कृष्ण] की अँखियाँ सदा श्री राधा के रूप से मोहित रहती हैं । यूँ तो उनकी अँखियाँ सदा श्री राधा रूप रस को पीती रहती हैं, फिर भी वे तृप्त नहीं होती ।
ऐसी कृपा हो कि मेरी मति श्री राधिका चरण रज में सदा बनी रहे (अर्थात् उनके चरणों की रज में मेरी पूर्ण शरणागति रहे ) ।
ब्रज में जो आनन्द प्रत्येक घड़ी हो रहा है, वह आनन्द तीनों लोकों में नहीं है। यह गोप-नगरी धन्य है ।
दिन रात "श्री राधा" नाम का रटन करो । जिसके प्रभाव से समस्त भव-बाधा मिट जाती है एवं चित्त को परम शांति प्राप्त होती है ।
श्री हरिराम व्यास कहते हैं "जिनका अंतःकरण विषय-विकार से शून्य हो गया है एवं श्री हरि के प्रेम में डूबा हुआ है, ऐसे साधु जनों को ही रसिक अनन्य मानना चाहिए।"
श्री नंददास कहते हैं "अरे सखी, तनिक देखो तो नागरनट को, सर पर मुकुट लटक रही है, श्री यमुना के पुलिन पर गोपियों के मध्य कैसा अनुपम नृत्य कर रहे हैं।"
श्री कुम्भनदास कहते हैं "हे कुँवरि राधिका जू, आप समस्त सौभाग्य की सीमा हो, आपके इस स्वरुप पर मैं करोड़ों करोड़ों चंद्रमाओं को न्योछावर कर दूँ। मेरे मन में यह विचार भी आ रहा है की आपके नयन कमलों पर करोड़ों करोड़ों खंजन पक्षी तथा मृगों को न्योछावर कर दूँ, जिनके नेत्र विश्व में सबसे सुन्दर माने गए हैं।"
गोपियां कहती है, हे उद्धव, मन तो हमारा एक ही है, दस-बीस मन तो हैं नहीं कि एक को किसी के लगा दें और दूसरे को किसी और में। अब वह भी नहीं है, कृष्ण के साथ अब वह भी चला गया हमारा नहीं रहा । तुम्हारे निर्गुण ब्रह्म की उपासना अब किस मन से करें ?
श्री राधिका श्याम सुंदर की अत्यंत प्यारी हैं । श्री राधिका जू के नख सिख [नख से सिख अर्थात् प्रत्येक अंग] की माधुरी पे कोटि कोटि चंद्रमा को नयौछावर किया जा सकता है ।
श्रीभट्ट देवाचार्य कह रहे हैं "मेरी आँखों में वृन्दावन के दोनों चंद्र श्री राधा कृष्ण ही बसे हैं, गौर वर्ण की श्री वृषभानु नंदिनी हैं और श्याम वर्ण के नन्द नंदन।
अब कोई बाधा नहीं रह गयी है, क्यूँकि अब मुझे मदन गोपाल मिल गए हैं, सारे साधन सफल हो गए हैं।