राग विभास

यह राग दिन के समय गाया जाता है। इस राग से वातावरण गंभीर हो जाता है।

27 संकीर्तन उपलब्ध हैं

  1. हमपर कब कृपालु हरि हुइहौ - रूप कुँवरि जी

    हे हरि! हम पर कब कृपा करोगे? मैं तो अत्यन्त अधम हूँ, और आप अधमों के उद्धारक— फिर अपनी प्रतिज्ञा कैसे न निभाओगे? हे प्रभु! आपने करोड़ों दुष्टों को तार दिया, तो मुझे दीन जानकर यूँ तारने में संकोच क्यों कर रहे हो?

  2. नित्यविहार सों करि प्रीति - श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के पद (61)

    प्रिया-प्रियतम के नित्य-विहार रस से प्रीति करो क्योंकि वही अनन्य रसिक संतों का जीवन सार है। ऐसे अनन्य रसिकों के संग एवं दिखाए मार्ग के अनुसरण करने से भाव-भक्ति में दृढ़ प्रतीति (स्थिर निश्चय) सहज ही प्रकट हो जाती है।

  3. हमारी लाड़ली अति ही भोरी - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (114)

    हमारी लाड़ली श्री राधा अति ही भोली हैं। वृषभानु नंदिनी अपने शरण में आये हुए के अवगुण नहीं देखती, वे परम कृपामयी हैं।

  4. प्यारी तेरी चाल चितवन बाँकी - श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (6)

    सहचरी भावापन्न श्री विट्ठल विपुल देव जी श्री राधा रानी से कहते हैं: हे प्यारी! आज आपकी चालचलन एवं चितवन में विशेष रस बंकता उदभासित हो रही है । आपके श्रीअंग पर विलक्षण वसन एवं आभूषण सुसज्जित हो रहे हैं । रस वैभव जनित विलक्षण रेखा आपके वक्षस्थल पर दृश्यमान हो रही है ।

  5. प्यारी जू हम तुम दोऊ इहाँ न कोउ हितू मेरौ - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (79)

    हे प्यारी जू, हम दोनों एक ही कुंज के साथी हैं, तो हम क्यों एक दूसरे से रूठें । यहां कोई हमारा ऐसा हितैषी नहीं जो हम दोनों की पीर को समझ सके । [1]

  6. श्री राधा सुख चंद देखि - श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रजनिधि पद संग्रह (122)

    श्री राधा के मुख चन्द्र को देख कर कोटि चन्द्रमा को न्यौछवार कर दो । उनकी दन्त पंक्तियों पर दामिनी, नासिका पर शुक (तोता), भौंह पर धनुष को न्यौछवार कर दो, और श्री राधा के नैनों को निहार कर अपने तीन प्रकार के तापों (दैहिक, दैविक एवं भौतिक ताप) को जला डालो ।

  7. आज बनी लाड़िली प्रीतम संग आवति - श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (2)

    इस पद में प्रातःकाल की शोभा का वर्णन किया गया है । अद्भुत सौन्दर्य छटा से सुशोभित लाड़िलीजू अपने प्रियतम के संग अभिगमन कर रही हैं ।

  8. आवत लाडिली लाल फूले - श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (3)

    प्रातःकालीन छटा का चित्रण करती हुई श्रीविपुल बिहारिनदासीजी कह रही हैं कि रस में प्रफुल्लित श्रीलाड़िली लाल आ रहे हैं। कुज-केलि के नवरंग में अनुरंजित सुरतरसानंद के हिंडोले में झूले हुए हैं ।

  9. आजु तौ जुवति तेरौ वदन - श्री हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (4)

    हे युवति ! तुम्हारा जो यह मुख आनन्द से प्रफुल्लित है उसी से तुम्हारे प्रियतम सङ्गम जनित सुख की सूचना मिल रही है। जैसे तुम्हारे बोल आलस्य से लटपटाये हुए हैं वैसे ही तुम्हारे कपोल भी सुरंग (ताम्बूल पीक) से रँग गये हैं। दोनों नयन विशेष थकित से, अरुण एवं उनींदे हैं ।

  10. आजु प्रभात लता मंदिर में - श्री हरिवंश महाप्रभू, श्री हित चौरासी (5)

    मंगल प्रभात की वेला में हर्षोन्मादित युगल किशोर अलसाये हुए लटक लटक कर लता भवन की मंजुल भूमि पर मादक गति से चलते हैं। वृन्दावन निकुञ धाम में सूरत-विलासी श्रीश्यामसुन्दर की मालाएँ श्रीराधा के उरोज चर्चित केशर लेप से मण्डित हैं।

  11. प्रात में निकुंज द्वार ह्वै ललिता - श्री चतुर्भुज दास जी

    प्रातः समय में ललिता एवं अन्य सखियाँ निकुंज द्वार में वीना बजा रही हैं । चतुर एवं नवीन दम्पति राधा कृष्ण अपनी शैया पर विराजमान हैं एवं वीना का आनंद ले रहे हैं ।

  12. प्रात समै दोऊ रस लंपट - श्री हरिवंश महाप्रभू, श्री हित चौरासी (3)

    प्रातः काल दोनों रस लम्पट सुरत-युद्ध में विजय एवं प्रसन्नता पूर्वक संलग्न हैं। मुख पर श्रम वारि (प्रस्वेद) की सघन बूँदें शुभ्र मौक्तिक जैसी शोभित हैं।

  13. कौन चतुर जुवती प्रिया - श्री हरिवंश महाप्रभू, श्री हित चौरासी (6)

    (श्रीहित अलि ने कहा-) हे लाल ! ऐसी कौन चतुर युवती प्रेयसी है (जिससे) आप रात्रि में चोरी चोरी मिलते हैं ? हे प्यारे ! आनन्द विलास रंजित एवं सुख पूरित आपके नयन भला कहीं छिपाने से छिप सकते हैं?

  14. प्यारे बोली भामिनी, आजु नीकी जामिनी - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (2)

    (श्री हित अली ने कहा-) हे भामिनि । (तुम्हें) प्यारे (श्रीकृष्ण) ने बुलाया है। (देखो) आज (कैसी) सुन्दर रात्रि है ? अतः आप नवीन मेघ रूप (श्रीलालजी) से ऐसे भेंटिये (मिलिये) जैसे दामिनि ।