ब्रज रसिक संकीर्तन व वाणी

रसिकों द्वारा लिखी गई वाणी वृंदावन एवं ब्रजरस का मूल स्रोत है। जिसको भी इस रस में आगे बढ़ना है उसे इन वाणियों का आश्रय लेना होगा एवं रसिकों द्वारा बताए गए मार्ग में चलना होगा।

2776 संकीर्तन उपलब्ध हैं

  1. जासौं सपरस चाहिए तासौ अपरस - भगवत रसिक, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ, उत्तरार्ध (21)

    जिन रसिकों एवं महापुरुषों का हमें नित्य संग करना चाहिए, उनसे तो लोग प्राय: सदा दूर रहते हैं और जिन सांसारिक वासनाओं से युक्त लोगों से दूर रहना चाहिए, उनसे चुंबक की तरह मन चिपका रहता है।

  2. झूलत दोऊ ललित हिंडोरें झूमत - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, वन कुंजन झूलन लीला (28)

    श्री राधा-कृष्ण दोनों ही अत्यंत सुंदर हिंडोले पर झूल रहे हैं। झूलते समय वे परस्पर एक-दूसरे के ऊपर झुकते और गिरते हैं, जिससे उनके अंग-अंग से अद्भुत सौंदर्य की हिलोरें उठ रही हैं।

  3. किशोरी मेरी हरो विरह की - श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (115)

    हे मेरी किशोरी जी! आप मेरे विरह के दुःख को दूर कीजिए। हे करुणा की सागर, परम दयालु और लाड़ली श्रीराधा जी! आप हर प्रकार से सर्वसमर्थ हैं।

  4. कौन दिन ऊँचे सुर राधिका - श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (57)

    वह दिन कब आएगा जब मैं श्री वृन्दावन की लताओं के मध्य ऊँचे स्वर में 'श्री राधिका! श्री राधिका!' पुकारूँगी और श्री धाम के उस परम-रस में मेरी गति और बुद्धि पंगु (स्तब्ध) हो जाएगी?

  5. बसौ नित नैनन मांही लली - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (16)

    हे प्यारी किशोरी जी! आप सदैव मेरे नेत्रों में निवास करें। आप श्री वृन्दावन के निकुञ्ज भवन में वास करती हैं, जहाँ ललिता आदि सखियाँ निरंतर आपकी सेवा में आपके साथ रहती हैं।

  6. सब ठाकुर को ठाकुर हरि - श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, रस के सवैया (01)

    यह बार सर्वस्व विदित है कि श्रीहरि समस्त ठाकुरों के भी ठाकुर हैं, किन्तु उन सर्वेश्वर श्रीहरि की भी स्वामिनी श्रीराधा हैं। प्राणप्रिय श्रीकृष्ण अपना सारा मान-अभिमान त्यागकर अपनी स्वामिनी श्री राधा से प्रेम की याचना करते रहते हैं और अपना समस्त प्रभुत्व छिपाकर उनके प्रेम के अधीन होकर ही रहते हैं।

  7. यह प्रेम कथा कहिये किहि - श्री ठाकुर जी

    हृदय की इस गम्भीर प्रेम-व्यथा को किसे कहें, क्योंकि यदि किसी से कहें भी तो कोई इसका विश्वास नहीं करता। सब केवल ऊपर-ऊपर से सांत्वना देना चाहते हैं, परन्तु भीतर लगे इस प्रेम-रोग को कोई पहचान नहीं पाता।

  8. हिंडोरौ ब्रज के आँगन माँच्यौ - गोस्वामी श्री हरिराय जी

    ब्रज के आँगन में अलौकिक हिंडोला रचा गया है। श्री वृन्दावन की सघन कुंजों में इस अद्भूत उत्सव को देखकर स्वयं भगवान शंकर भी आनंदातिरेक में तांडव नृत्य करने लगे हैं।

  9. जै राधा मन हरनी मोहन - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (293)

    श्री कृष्ण के मन को हरने वाली, श्री राधा रानी की जय हो जिनके चरण-कमल मेरे शीश पर सदा सुशोभित हैं। उन्होंने अपनी कृपा-सुधा का सिंचन करके अपनी इस दासी के सूखे हुए जीवन रूपी धान को पुनः हरा-भरा कर दिया है।

  10. ललिता ललित प्रबीन बीन लै - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (31)

    अति चतुर और सुंदर सखी श्री ललिता जी अपने हाथों में वीणा लेकर खड़ी होकर मधुर सुरों में गा रही हैं। शय्या पर लेटे हुए श्री श्यामा-श्याम इस मधुर तान को सुन रहे हैं, जिससे उनके कानों में इस संगीत को सुनने की रुचि और अधिक बढ़ रही है।

  11. धन-धन बृन्दाविपिन बसैं हलवाई - श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (95)

    श्री वृन्दावन धाम में निवास करने वाले हलवाइ अत्यंत धन्य और सौभाग्यशाली है। वे परम प्रेम से अत्यंत सुंदर जलेबी, खुरमा, खाजा और मलाई इत्यादि मिष्ठान तैयार करते हैं।

  12. आरती राधिका-लाल पर वारौं सहज - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (20)

    मैं श्री राधिका और प्रियतम लाल पर आरती वारता हूँ। उनके प्रत्येक अंग पर स्वाभाविक रूप से सुशोभित आभूषणों की अत्यंत सुंदर झलक और उनकी इस अनुपम रूप-माधुरी को मैं अपने नेत्रों से निहार रहा हूँ।

  13. रूप रस मांते महा प्रेम - श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त एवं सवैया (26)

    जो रसिक संत श्री श्यामा-श्याम की रूप-रस माधुरी में मग्न हैं, महाप्रेम के पुंज में रंगे हुए हैं और समस्त संसारी नातों का त्याग करके मन को जीतकर अवधूत बन गए हैं।