माया कौं सब जग भजै - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (28)
समस्त संसार वास्तव में माया की ही भक्ति करता है — धन, स्त्री, गृह, आश्रम आदि में आसक्ति ही सबका साधन बन गई है। किंतु मायापति श्रीकृष्ण का अनन्य भजन तो कोई विरला ही करता है। और जो वास्तव में श्रीकृष्ण का अनन्य भजन करता है — उसके लिए माया स्वयं आज्ञाकारिणी दासी बन जाती है।
