अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध]

अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध], श्री भागवत रसिक देव जू की वाणी का द्वितीय अध्याय है । रचयिता : श्री भागवत रसिक देव जी

21 लेख उपलब्ध हैं

  1. माया कौं सब जग भजै - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (28)

    समस्त संसार वास्तव में माया की ही भक्ति करता है — धन, स्त्री, गृह, आश्रम आदि में आसक्ति ही सबका साधन बन गई है। किंतु मायापति श्रीकृष्ण का अनन्य भजन तो कोई विरला ही करता है। और जो वास्तव में श्रीकृष्ण का अनन्य भजन करता है — उसके लिए माया स्वयं आज्ञाकारिणी दासी बन जाती है।

  2. परमेस्वर परतीति नहिं - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (22)

    जिन व्यक्तियों का भगवान् पर विश्वास नहीं है और जिनका भरोसा केवल धन-दौलत पर टिका है — वे चाहे गृहस्थ हों या गृहत्यागी, विरक्त कहलाते हों या संसार से विमुख दिखाई देते हों — वास्तव में वे सभी संसार-सागर में ही डूबे हुए हैं।

  3. जात जात मैं सब, सबही जात कुजात - श्री भगवत रसिक, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (20)

    जाति जाति करते सब कुछ चला ही जाता है और अंत में सभी जातियाँ कुजाति सिद्ध होती है। कहिये तो, जाति बंधन से मुक्त अनन्यरसिक की भला कौन सी जाति होती है? (यदि उसकी कोई जाति है, तो वह है अनन्यरसिक)

  4. अनहोनी नहिं होइ कछु - श्री भगवत रसिक, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (18)

    यदि कुछ नहीं होना होता तो वह नहीं होता, और यदि कुछ होना होता है तो उसे कोई रोक नहीं सकता । उदाहरण के लिए सीता जी और दशरथ जी को ही देख लो, दोनों परम समर्थवान थे ।

  5. कुंजन तै उठी प्राप्त - श्री भगवत रसिक, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (37)

    साधक को चाहिए की वह सबेरे(अपेन विश्राम) कुंज से उठकर सबसे पहले श्री यमुना जी में स्नान करे, फिर निधिवन को प्रणाम करता हुआ श्री बांकेबिहारी जी महाराज के दर्शन करे ।

  6. चेला काहू के नहीं - श्री भगवत रसिक,भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रंथ, उत्तरार्ध (40)

    न तो हम किसी (देह मानी) के चेला है और नकिसी (देह मानी) के गुरु हम तो अपने प्रिया प्रियतम की भावमयी सखी है। हम सदा उनके रंगमहल में निवास करते है और निरंतर उनकी टहल किया करते है। प्रिया प्रियतम की भी यह दशा है कि उन्हें हमारे बिना एक पल में ही बेकली होने लगती है।

  7. भगवत नित्य बिहार नैन - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (42)

    श्री भगवत रसिक जी कहते हैं कि यह 'नित्य-विहार' भगवान शिव के तीसरे नेत्र के समान है, जो समस्त द्वैत और अज्ञान को भस्म कर देता है। इसके प्रकटीकरण के साथ ही चित्त से जाति, वर्ण, कुल, धर्म एवं कर्म के समस्त वैषम्य समूल विनष्ट हो जाते हैं। केवल श्री राधा–कृष्ण की युगल-छवि ही अवशिष्ट रह जाती है।

  8. प्रथम दरस गोविंद रूप के प्रानपियारे - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (38)

    भगवत रसिक जी साधकों से कहते हैं कि जिस वृन्दावन धाम में ये (निम्नलिखित) सात सिद्ध विग्रह विराजमान हैं, उसमें रसिक संतो की संगत करते हुए साधक को निवास करना चाहिए।) 1. श्री रुपगोस्वामी के प्राण प्यारे ठा० श्री गोविंद देव जी 2. ठा० श्रीमदनमोहन जी महाराज, जिन्हें श्री सनातन गोस्वामी ने सदा अपने पवित्र हृदय में विराजमान किया था

  9. यह दिव्य प्रसाद प्रिया पिय कौ - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (7)

    श्रीयुगल के प्रसार की महिमा का वर्णन करते हुए श्रीभगवत रसिकजी कहते हैं कि प्रिया प्रियतम का यह प्रसाद दिव्य है। नजर पड़ते ही, मन के आनंद को बढाने लगता है, स्पर्श करते ही हृदय के पापों को हर लेता है

  10. हम सिष स्यामा स्याम के, गुरु हम स्यामा स्याम - श्री भगवत रसिक - भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (41)

    श्री भगवत रसिक जी भावमयी सखी भाव से कहते हैं कि हम श्यामा श्याम के शिष्य भी हैं और गुरु भी हैं (वे जैसी आज्ञा देते है, हम वैसा करते हैं और हम जैसा निर्देश देते है, वैसे वे रस विलसते हैं ) । प्रेम से ओत प्रोत होकर हमने उनको अपना सर्वस्व (मन, तन, धन, धाम) अर्पण कर दिया ।

  11. परस्पर दोउ चकोर, दोउ चंदा - श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (6)

    भगवतरसिकजी कहते है कि रसिकबिहारी प्रियतम और रसिक बिहारिणी श्रीप्रियाजी - दोनों एक दूसरे के लिए चकोर है और दोनों ही चन्द्रमा हैं। दोनों ही चातक हैं और दोनों ही स्वाति वृष्टि हैं। दोनों ही मेघ हैं और दोनों ही ज्योतिर्मयी दामिनी हैं।

  12. जात जात मैं सब - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (20)

    जाति-जाति करते सब चला ही जाता है, और अंत में सभी जातियाँ कुजाति सिद्ध होती हैं। कहिये ‘रसिक अनन्य’ भक्त—जो श्री राधा रानी का अनन्य भक्त है और वृन्दावन ही जिसका जीवन है—उसकी भला कौन सी जाति है?

  13. हम सिष स्यामा स्याम के - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (41)

    श्रीभगवतरसिकजी भावमयी सखी-भाव से कहते हैं कि हम श्रीश्यामा-श्याम के शिष्य भी हैं और गुरु भी हैं। प्रेम से ओत-प्रोत होकर हमने अपना सर्वस्व (मन, तन, धन, धाम) उन्हें अर्पण कर दिया है।

  14. चेला काहू के नहीं, गुरु काहू के नहीं - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (40)

    श्री भगवत रसिक जी के शब्दों में वह न किसी के चेला हैं, और न गुरु हैं वह केवल निज महल में श्री लाड़ली लाल को दिन रात लाड लड़ाती हैं |

  15. मोह-फाँस जग बँधि रह्यौ - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (34)

    प्राणी इस संसार में न तो किसी के साथ आये हैं और न (इस संसार से) किसी के साथ गये हैं। (सब अकेले पैदा होते हैं और अकेले ही मरते हैं।) यह मिलाप तो यहीं संसार यात्रा में हो गया है। दुनिया ममता के जाल में फँसी है, इसीलिए लोग पिता, पुत्र, माता, ससुर, जमाई पत्नी, मित्र, गुरु, शिष्य, धन, भाई बंधु आदि को अपना मानकर उनसे बिछुडने पर विलाप करते हैं।

  16. नैननि देखीं और नहीं - श्री भगवत रसिक - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (2)

    भगवत रसिक जी कहते हैं कि मैं अब (श्रीयुगल की नित्य केलि के अतिरिक्त) न तो अपनी आँखों से कुछ और देखता हूँ, न कानों से कुछ और सुनता हूँ, न नासिका से कुछ और सूंघता हैं, न ही कानों से कुछ और सुनता हैं, न नासिका से कुछ और सूंघता हूँ, न जिह्वा (जीभ) से कुछ और कहता हूँ और न त्वचा से कुछ और छूता हैं। इस प्रकार में सदा सर्वत्र अपनी समस्त पांचों ज्ञानेन्द्रियों को श्रीश्यामा- कुंजबिहारी की नित्य कीड़ा में निमग्न करके उन्हें (प्रिया प्रियतम को) नयन संकेतों से अनवरत केलि का उपदेश करता रहता हूँ, वाणी से इस नित्य अनंग क्रीडा का रात दिन गान कर उसे उद्दीपन बनता हुआ मैं नेत्रों से इसी केलि को निहारता रहता हूँ।

  17. वृन्दावन विहरत फिरै - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (37)

    श्री भगवत रसिक जी वृन्दावन रस के उपासक को सलाह देते हुए कहते हैं कि वृन्दावन में युगल उपासना है इसलिए जहाँ जहाँ भी वृन्दावन में विहरण करो, उससे पहले युगल रूप को अपनी आँखों में लाओ अर्थात युगल छवि का रूपध्यान करो।

  18. जासौं सपरस चाहिए - भगवत रसिक, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उत्तरार्ध] (21)

    जिनके संसर्ग में नित्य रहना चाहिए, उन रसिक महापुरुषों से लोग दूर रहते हैं, और जिन आसक्त जीवों से दूर रहना चाहिए, उनसे चुम्बक की तरह मन चिपका रहता है।

  19. प्रथम सुनें भागवत - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (36)

    सबसे पहले किसी भगवद भक्त के मुख से श्रीमद्भागवत कथा,और गीता सुने, दूसरा व्यास जी द्वारा बताई गई नवधा भक्ति का अभ्यास करे। तीसरा सतगुरु (रसिक भक्त ) के चरणों में आत्म समर्पण करे (पूर्ण दक्ष एवं रसीले गुरु बनाये।)