हे बिहारी बिहारिणी! जो कुछ होता है आपकी कृपा से ही होता है, किसी का कोई नहीं है ।
हे बिहारी बिहारिणी! जो कुछ होता है आपकी कृपा से ही होता है, किसी का कोई नहीं है ।
ललिता अवतार श्री हरिदास जी महाराज द्वारा लिखित अठारह सिद्धांत दोहे जिन्हे अष्टादश सिद्धांत के पदों से जाना जाता है।
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हे बिहारी बिहारिणी! जो कुछ होता है आपकी कृपा से ही होता है, किसी का कोई नहीं है ।
श्री स्वामी हरिदास जी महाराज कहते है कि जिस प्रकार समुद्र की अगाधता का कोई ओर-छोर नही है उसी प्रकार प्रेम समुद्र जिसमें एक मात्र रूप, रस की गहराई है, उसका ओर-छोर कोई कैसे पा सकता है ?
इस पद में स्वामी श्री हरिदास जी संसार के नश्वर स्वरूप एवं स्वार्थ युक्त प्रीति का बहुत सुंदर वर्णन करते हैं। वह कहते हैं कि संसार में हमने सबसे (अपने परिवार वाले, मित्र, परिजन इत्यादि) प्रीति कर के देख लिया, हमें कोई भी हमारा वास्तविक हितैषी नहीं मिला ।
इस पद में स्वामी श्री हरिदास जी महाराज समस्त जीवों से उपदेश देते हुए कहते हैं, हे भाई! जब तक तू इस जगत में जीवित है, सब प्रकार के सांसारिक झंझटों को त्यागकर, केवल श्री हरि का भजन कर।
इस पद में स्वामी श्री हरिदास जी अपने आश्रित भक्तों के प्रति स्नेह से भरे हुए कहते हैं कि, “हे मेरे प्रिय भक्तों! सामान्य लोग तो श्री बिहारी जी के अनन्य आश्रय को भूल सकते हैं, लेकिन तुम तो अब हमारे हो चुके हो। तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए, तुम क्यों उन्हें भूल रहे हो?”
प्रस्तुत पद में श्री हरिदास जी ने जीव की अति प्रबल संसार आसक्ति को देखकर श्री बिहारी जी से ही कहते हैं कि आप ऐसे नागर नटवर शिरोमणि हो जो कि इस मिथ्या (झूठे) मायिक जगत को ही सच्चा कर दिखा रहे हो।
मायिक जगत में श्री हरी का ऐसा ही विचित्र खेल है, जिसमें सुख का न कोई बीज है और न ही बेल।
हरि नाम जप में आलास क्यों करते हो, काल तुम्हें ले जाने के लिए धनुष पर बाण चढ़ाये फिर रहा है।
अरे जीव, तुझे मानव देह जैसा अत्यंत दुर्लभ अधिकार एवं अवसर मिला है, अपने चित्त को इधर उधर तनिक भी ना डुला, इसे नित्य श्री श्यामा कुंजबिहारी में लगा।
इस पद में श्री हरिदास जी संसार के प्रति जीव की आसक्ति और श्री बिहारी जी के प्रति उसकी उदासीनता का वर्णन कर रहे हैं।
जैसे एक तिनका पृथ्वी पर गिरा हुआ पवन के अधीन होता है, उसे जहाँ वायु उड़ा कर ले जाती है, वहीं जाना पड़ता है। उसी प्रकार ब्रह्मलोक, शिवलोक और अन्य समस्त लोक भी श्री बिहारीजी के अधीन हैं।
मन लगाकर मन को स्थिर कर एकाग्र करके प्रिया प्रियतम में प्रीति करें और सब का परित्याग करके हाथ में केवल मृतिका (मिट्टी का पात्र) करुवा धारण करें और ब्रज की सुंदर गलियों में सोहनी बुहारी देते रहें ।
यह संसार एक अथाह सागर के समान है, जिसमें यह मनुष्य-रूपी मीन (मछली) काल के क्रूर घड़ियालों और मगरमच्छों जैसे हिंसक विषयों से घिरी हुई है, जो उसे प्रतिपल निगलने के लिए तत्पर रहते हैं।
श्री हरिदास जी महाराज कहते हैं, "एक ओर हम जीव हैं, जिन्हें अपनी बिगाड़ने की आदत लगी हुई है, और दूसरी ओर अकारण करुणा के सागर, श्री बिहारी जी हैं, जो सदैव हमारी बनाने (भलाई) में लगे रहते हैं। ऐसा लगता है मानो बिहारीजी और हमारी एक प्रकार की होड़ चल रही है ।”
हे हरि! आप जैसे-जैसे मुझे रखते हैं, वैसे-वैसे ही मैं रहता हूँ।
कमल के समान नेत्र हैं जिनके, ऐसे कमल नयन श्री बिहारीजी से ही हित-प्रेम करना चाहिए क्यूंकि उसके आगे सांसारिक एवं मोक्ष तक की कामना तुच्छ लगती है या साधु संतों की संगती से प्रेम करना चाहिए जिससे हृदय के समस्त कल्मष (अशुभ वासनाएं) सब प्रकार से नष्ट होती हैं।
श्री हरिदास जी महाराज कहते हैं कि मनुष्य देह के अभिमान की आसक्ति को छोड़कर श्री युगल किशोर प्रिया लाल का भजन कर, भजन कर भजन को मत छोड़। अरे सार्थक तिल तिल (अत्यंत ) धन की इच्छा मत कर, मत कर...
निज आश्रित जन से स्वामी श्री हरिदास जी कहते हैं, “हे भाई! कभी तुम्हारा मन मायिक सुखों में डूब जाता है, तो कभी परमार्थ के सुखों में। तुम्हें यह विचार करना चाहिए कि सर्वोपरि नित्य विहार रस से बढ़कर और कौन सा सुख हो सकता है?”
हे बिहारी बिहारिणी! सुर-मुनि मोहिनी आपकी दुर्जय माया की प्रबलता ऐसी है कि किसी का भी बल नहीं है जो अपने साधन-प्रयत्न से आपकी माया से पार हो सके। जो कुछ भी होता है, वह आपकी कृपा से ही होता है। जीव को आत्मस्वरूप का ज्ञान और भक्ति का साधन, सब कुछ आपकी कृपा का ही परिणाम है।
कमल के समान नेत्र हैं जिनके, ऐसे कमल नयन श्री बिहारीजी से ही हित -प्रेम करना चाहिए क्यूंकि उसके आगे सांसारिक एवं मोक्ष तक की कामना तुच्छ लगती है या साधु संतों की संगती से प्रेम करना चाहिए जिससे हृदय के समस्त कल्मष (अशुभ वासनाएं) सब प्रकार से नष्ट होती हैं |