भक्ति शतक

जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज द्वारा लिखित भक्ति शतक (दिव्य प्रेम के सौ रत्न), साधक के लिए भक्ति मार्ग के पूर्ण दर्शन का स्पष्ट और संक्षिप्त वर्णन है। लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

25 लेख उपलब्ध हैं

  1. चितवत चित करषत जिते - जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (54)

    श्री कृष्ण की एक रसमयी दृष्टि से बड़े-बड़े परमहंस समाधि भुला देते हैं और परमहंसों की तो गणना ही क्या, जब स्वयं देवाधिदेव भगवान् शिव ने भी उस रस के आस्वादन हेतु गोपी-देह को धारण कर लिया।

  2. जाके अगनित गुनन को गावत वेद ऋचान - जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (94)

    जिन श्री कृष्ण के अनगिनत गुणों को गाते हुये चारों वेद नहीं थकते, वही ब्रह्म श्री कृष्ण ब्रज में गोपियों को हठात् छेड़ कर 'दारी के’, इत्यादि गाली को सुनने में अपना परम सौभाग्य समझते हैं।

  3. तुम मेरे थे रहोगे यह श्रुति वचन तिहार - जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (81)

    हे श्री कृष्ण! भले ही मैं पतित हूँ, परंतु तुम अनादि काल से मेरे थे, और अनंतकाल तक मेरे ही बने रहोगे — यह वेदों में तुम्हीं ने स्वयं कहा है। फिर हे अधम उधारन! मुझे क्यों भुला दिया?

  4. कोटिन ज्ञानिन मध्य कोउ प्रेम-सुधा-रस पाय - जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (28)

    करोड़ों ज्ञानियों में किसी बड़भागी को ही प्रेम सुधा रस प्राप्त होता है । जैसे सनकादि शुकादिक परमहंस ब्रजरस में डूब गये ।

  5. ज्ञान मरै दै मुक्ति पद, कर्म मरै दै स्वर्ग - जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (61)

    मोक्ष देकर ज्ञान समाप्त हो जाता है, स्वर्ग देकर अच्छा कर्म समाप्त हो जाता है । किंतु केवल एक भक्ति ही ऐसी है जो सदा अमर रहती है जहां भक्त को स्वर्ग, मोक्ष आदि की कामना नहीं होती ।

  6. देशकाल नहिँ नियम कछु नहिँ कछु शिष्टाचार - जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (41)

    मैं उस विलक्षण प्रेम-पंथ पर सर्वस्व न्यौछावर करता हूँ, जहाँ देश, काल अथवा बाह्य शिष्टाचार का कोई बंधन नहीं है। यहाँ केवल निष्कपट हृदय से निष्काम प्रेम करना ही सर्वस्व है।

  7. काहे खोजत ब्रह्म को - जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (91)

    हे ज्ञानियों! वेद की विविध ऋचाओं में ब्रह्म को निरर्थक क्यों खोज रहे हो? वह तो नंदरानी के आँगन में ऊखल से बँधा हुआ सुलभ है। यदि मेरे वचन पर विश्वास न हो तो स्वयं ब्रज जाकर दर्शन कर लो।

  8. जाकी माया ते नचे, योगी यती महान - जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (100)

    जिसकी माया से बड़े-बड़े योगी एवं मुनींद्र भी नाचते (काँपते) हैं, उसी ब्रह्म श्री कृष्ण को ब्रज में ब्रजांगनाएँ अपने हाथों की तालियों पर नचा रही हैं।

  9. अधम उधारन नाम सुनि - जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (90)

    हे श्री कृष्ण! तुम्हारा पतित-पावन नाम सुनकर मन में आशा उत्पन्न होती है, क्योंकि मैं पतित हूँ और मेरा भी काम बन सकता है। किंतु जब “भक्त-वश्य”, “भक्त-वत्सल” आदि नाम सुनता हूँ, तो हृदय में भय उत्पन्न हो जाता है क्योंकि आपका भक्त तो मैं अभी हुआ नहीं।

  10. काम क्रोध मद लोभ कहँ - जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (38)

    हे मूर्ख मन! काम, क्रोध, मद और लोभ को केवल दबाने का प्रयास मत कर; इन्हें श्यामसुन्दर की ओर मोड़ दे। यदि इच्छा करनी है तो उनके सुख की इच्छा कर, यदि क्रोध करना है तो अपनी उन कमियों पर कर जो तुझे उनसे दूर करती हैं, और यदि गर्व करना है तो इस पर कर कि मैं श्यामसुन्दर का हूँ।

  11. सौ बातन की बात इक - जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (74)

    अनंत सिद्धांतों का यही सार है कि सेव्य श्रीकृष्ण में मन का अनुराग हो और श्रीकृष्ण-सेवा की भावना निरंतर बढ़ती रहे; यही अंतिम तत्त्वज्ञान है।

  12. मन हरि में तन जगत में - श्री कृपालु जी, भक्ति शतक (84)

    जिसका मन सदा श्यामसुन्दर में अनुरक्त रहे और शरीर से संसार का कर्म संपन्न करे, वही सच्चा कर्मयोग है। किंतु जिसका मन संसार में अनुरक्त रहे और शरीर से भगवद्भक्ति करे, वह पराकाष्ठा का मूर्ख है।

  13. जो नहिं जात बुलायेहु - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (93)

    जो सगुण, सविशेष, साकार ब्रह्म—श्री कृष्ण—शुकदेव और सनकादिक परमहंसों की समाधि में अत्यधिक प्रयत्न करने पर भी नहीं पहुँचते, वही ब्रह्म श्री कृष्ण बिना बुलाए ही, ब्रजांगनाओं के घर-घर भागते हुए पहुँच जाते हैं। यह कितना बड़ा आश्चर्य है!

  14. ब्रह्म लोक पर्यंत सुख - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (45)

    ब्रह्मलोक पर्यन्त के सुखों की कामना तथा पाँचों मुक्तियों की अभिलाषा का त्याग करके ही विशुद्ध भक्ति-सरिता में अवगाहन करना चाहिए; अन्यथा प्रेम के उज्ज्वल स्वरूप पर कामनाओं का काला धब्बा लग जाएगा।

  15. सबै शक्ति हैं नाम में - जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (18)

    हे मन! भगवान के नामों में समस्त शक्तियाँ समाहित हैं, इसलिए तू रात-दिन केवल उसी का आराधन कर। किंतु स्मरण रहे, जो मनुष्य नामापराध करते हैं, उन्हें नाम की इन अगाध शक्तियों का कोई लाभ प्राप्त नहीं होता। नाम की महिमा तभी फलित होती है जब उसे अपराध-रहित होकर जपा जाए।

  16. साँचो दास न कबहुँ चह - जगद्गुरू श्री कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (15)

    सच्चा दास केवल युगल-सरकार की सेवा ही चाहता है और उनके सुख में ही सुखी रहता है तथा पाँचों प्रकार की मुक्तियों को स्वप्न में भी नहीं चाहता।