भारतेंदु ग्रंथावली

भारतेंदु ग्रंथावली श्री भारतेंदु हरिशचंद्र जी द्वारा रचित है जिसमें श्री राधा कृष्ण की दिव्य लीलाएं संकलित हैं ।

54 लेख उपलब्ध हैं

  1. प्यारी पग नूपुर मधुर, धुनि सुनिवे के हेत - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली

    श्री राधा के चरणों में सुशोभित नूपुरों की मधुर ध्वनि इतनी मनोहर है कि ऐसा प्रतीत होता है मानो श्रीकृष्ण के कान उसी ध्वनि को सुनने के लिए उनके चरणों में आकर बस गए हैं। श्री राधा के चरण परम सुख प्रदान करते हैं।

  2. जद्यपि हम सब भाँति ही - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (16)

    हे श्री कृष्ण! यद्यपि हम सर्वथा कपटी, निष्ठुर और मन्दबुद्धि हैं, तथापि आप हमारे दोषों पर ध्यान न देकर अपने परम कृपालु स्वभाव की ओर ही दृष्टि डालिये। आपकी अहैतुकी कृपा से ही हम जैसे अधम जीवों का उद्धार संभव है।

  3. मनमोहन तें बिछुरी जबसौं - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, प्रेम माधुरी (116)

    एक विरहिणी गोपी अपनी पीड़ा व्यक्त करती है कि जब से प्राणप्रिय मनमोहन से बिछुड़ी हूँ, मेरा यह शरीर नित्य अश्रुओं की धारा से प्रक्षालित (धुलता) होता रहता है।

  4. वेद भेद पायो नहीं - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (8)

    वेदों को भी भगवान का रहस्य नहीं मिल पाया और पुराण उन्हें खोजते-खोजते स्वयं पुराने (जीर्ण-शीर्ण) हो गए, फिर भी वे ईश्वर की थाह न पा सके। स्मृतियों ने भी उन्हें समझने के प्रयास में अपनी सुध-बुध खो दी, पर इन ग्रंथों मात्र से प्रभु की प्राप्ति न हुई। सार यह है कि ईश्वर की प्राप्ति केवल निष्काम प्रेम और शरणागति से ही संभव है।

  5. जौं हमरे दोसन लखौ तौ नहिं कछु अवलंब - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (20)

    हे प्रभु! यदि आप मेरे दोषों को ही निहारेंगे, तो फिर मेरे पास कोई भी अवलम्ब नहीं बचेगा। मेरी विनती है कि आप अपने उस स्वभाव की ओर दृष्टि करें, जो दीनों पर करुणा करने वाला है। केवल उसी कृपालु स्वभाव के कारण ही मेरे जैसे पापी का कल्याण संभव है।

  6. भजौं तो गुपाल ही कौं - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, विनय प्रेम पचासा (21)

    यदि मैं पूजा करता हूँ तो वह केवल गोपाल की, यदि सेवा करता हूँ तो वह भी केवल गोपाल की — मेरा मन नंदलाल में ही सब भाँति से लगा हुआ है।

  7. जै जै श्री घनश्याम वपु - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, वेणु गीत (1)

    जय हो उन श्यामसुंदर की, जिनका वपु घनश्याम मेघ के समान मोहक है। जय हो उन राधा की, जो सदैव उनके वाम भाग में अद्भुत माधुरी के साथ विराजती हैं। ब्रज भूमि की समस्त सखियों की जय हो, श्रीवृंदावन धाम की जय हो।

  8. सुत तिय गृह धन राज्य हू - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (7)

    पुत्र, पत्नी, घर, धन एवं राज्य आदि में सच्चा सुख नहीं है। परम आनंद केवल श्रीकृष्ण के चरणों में ही प्राप्त होता है।

  9. नित नित होरी ब्रज में रहौ - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, होली (79)

    नित्य धाम ब्रज में होली का उत्सव नित्य-नित्य ही मनाया जाता है, जहाँ श्री हरि ब्रज की युवतियों संग आनंदपूर्वक क्रीड़ा करते हैं, और वे सदा दिव्य आनंद में मग्न रहती हैं।

  10. भटकयौ बहु बिधि जग बिपिन - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (5)

    मैं इस संसार रूपी जंगल में अनेक प्रकार से भटकता रहा, परंतु कहीं भी विश्राम और शांति नहीं मिली। जब से घनश्याम (श्री कृष्ण) के चरणकमलों की शरण प्राप्त हुई है, तभी से मुझे वास्तविक आनंद और शांति का सच्चा अनुभव हुआ है।

  11. अहो सहो नहिं जात अब - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (31)

    हे नंदनंदन (श्रीकृष्ण)! अब बहुत हुई, अब आपके दर्शन के बिना जीना असंभव है । श्री हरिचंद प्रार्थना कर रहे हैं कि हे परम करुणामय, अब मुझ पर कृपा कीजिए और अपने सेवक की रक्षा कीजिए।

  12. श्रीपद अंकित ब्रज मही - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली

    ब्रज धाम की भूमि, श्री कृष्ण के चरण चिन्हों से अंकित है जिसकी छवि का वर्णन करना असंभव है । इस ब्रज धाम के रस का पान करने के लिए यदि स्वयं महालक्ष्मी का ह्रदय भी ललचाये, तो इसमें आश्चर्य क्या है?

  13. जै जै श्रीवृंदावन देवी - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, विनय प्रेम पच्चासा (01)

    श्री वृंदावन धाम की पटरानी, श्री राधारानी की जय हो! स्वयं देवों के देव, श्रीकृष्ण भी उनके चरण कमलों की सेवा करते हैं।

  14. साधुन को सँग पाइ कै - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (30)

    संतों का संग पाकर श्री हरि का यशोगान करो। ऐसा जीवन जियो कि श्री हरि के प्रेम में भाव में उन्मत्त होकर नृत्य करने लगो।

  15. श्री जमुना-जल पान करू - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (23)

    मेरी यही अभिलाषा है कि मैं सदा वृंदावन का वास करूं और श्री यमुना जल का पान करता रहूं। मुख में महाप्रसाद रखूं और श्री वल्लभ नाम का उच्चारण करूं।

  16. लोक वेद कुल-धर्म बल - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (3)

    मैं लोक, वेद, कुल-धर्म के बल से विहीन हूँ एवं सब प्रकार से अति हीन हूँ । परंतु ब्रजराज श्री कृष्ण चन्द्र के चरणों के बल से मैंने परम ढिठाई (ढीठता) की है ।

  17. चिरजीवो होरी के रसिया - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, होली (13)

    हे होली के रसिया श्री कृष्ण, तुम चिर काल तक जियो। तुम नित्य मेरे संग होली खेलो जिसमें नित्य ही तुम्हारे मधुर गाली एवं हँसी होगी।

  18. साधन छाँड़ि अनेक विधि - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (22)

    हे श्री राधा, मैं समस्त साधनों को छोड़कर आपके द्वार पर आकर पड़ा हूँ, मुझे अपना मानकर किसी भी उपाय से मुझे अपनी सेवा प्रदान कीजिए।