श्री बिहारी लाल
श्री बिहारी लाल श्री निम्बार्क सम्प्रदाय के श्री वृन्दावन धाम के रसिक कवि थे। उनकी प्रसिद्ध रचना बिहारी सतसई थी, जो एक महान ग्रंथ है।
21 लेख उपलब्ध हैं
किती न गोकुल कुल-बधू - श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई (22)
गोकुल में न जाने कितनी कुलवधुएँ हैं, और ऐसी कोई नहीं जिसे किसी ने शिक्षा न दी हो; परन्तु कुलवधू होकर और उपदेश सुनकर भी ऐसी कोई न बची, जो श्रीकृष्ण की वंशी की तान में डूबकर लज्जा और लोकमर्यादा का त्याग न कर बैठी हो।
मोर-चन्द्रिका स्याम-सिर - श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई (20)
अरी मोर-चंद्रिका! श्री कृष्ण के सिर पर चढ़कर क्यों इतरा रही है? सुना है, श्री राधा मान करके बैठी हैं । अतैव शीघ्र ही तुझे उनके पाँवों पर लोटते हुए देखूँगी ।
निज करनी सकुचें हिं - श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई (705)
हे गोपाल, मैं तो अपनी ही करनी से लजा गया हूँ, फिर तुम अपनी इस चाल से मुझे क्यों लजवा रहे हो कि मुझ-जैसे अत्यन्त विमुख के तुम सम्मुख रहते हो-(मैं तुम्हें सदा भूला रहता हूँ, और तुम मुझे सदा स्मरण रखते हो!)
अपनैं-अपनैं मत लगे - श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई (710)
अपने-अपने मत के लिए व्यर्थ ही लोग हल्ला मचा रहे हैं। अंततः सभी को उस एक भगवान श्रीकृष्ण की ही उपासना करनी है, चाहे वे उन्हें किसी भी नाम से पुकारें।
तौ बलियै भलियै बनी नागर नन्दकिसोर - बिहारी लाल, बिहारी सतसई (708)
हे चतुर नन्दकिशोर, मैं बलैया लूँ, यदि तुम अच्छी प्रकार से मेरी करतूतों की ओर देखोगे अर्थात् मेरे अवगुणों पर विचारोगे, तब तो बस मेरी बिगड़ी खूब भली बनी! मेरा उद्धार हो चुका! (अर्थात् नहीं होगा।)
मेरी भववाधा हरौ राधा नागरि सोय
हे श्री राधा, मेरी भव बाधा को केवल आप ही हर सकती हो, कृपया इसे हरो। मैं आपकी महिमा में इतना ही कहूं कि जब आपके तन की छाया भी श्री कृष्ण पर पड़ती है तो वह हरित (प्रसन्न) हो उठते हैं।
मोहिं तुम्हैं बाढ़ी बहस को जीतै जदुराज - बिहारी लाल, बिहारी सतसई (427)
हे बाँके बिहारी! मेरे और तुम्हारे बीच मानो एक बहस छिड़ गई है—अब देखना है कि अंततः कौन जीतता है। तुम्हें अपने कृपालु स्वभाव की लाज रखनी है और मुझे अपने पतनशील स्वभाव की; तुम मेरा उद्धार करना चाहते हो और मैं बार-बार अपराध करके गिरता जा रहा हूँ।
कब कौ टेरतु दीन ह्वै होत न स्याम सहाइ - बिहारी लाल, बिहारी सतसई (696)
हे श्याम, मैं कब से दीन होकर तुम्हें पुकार रहा हूँ, किन्तु तुम सहाय (प्रसन्न) नहीं होते। हे जगत-गुरु, जगन्नायक! क्या आपको भी इस संसार की हवा लग गई है?
राधा हरि हरि राधिका बनि आए संकेत - श्री बिहारी लाल, बिहारी सतसई (343)
गुप्त मिलन-स्थल पर श्री राधा और श्रीकृष्ण ने परस्पर रूप धारण किया—श्री राधा ने कृष्ण का रूप धारण किया और श्रीकृष्ण ने राधा का। इस प्रकार रूप-परिवर्तन के कारण स्वाभाविक समागम में दोनों दम्पति विपरीत-रति का सुख अनुभव कर रहे हैं।
कोऊ कोरिक संग्रहौ - श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई
कोई हजारों, लाखों या करोड़ों की सम्पत्ति संग्रह करे; किन्तु मेरी सम्पत्ति तो सदा वही ‘विपत्तियों का नाश करने वाले’ यदुनाथ [श्रीकृष्ण] हैं।
जपमाला छापें तिलक - श्री बिहारी लाल, बिहारी सतसई
बिहारीलाल जी कहते हैं कि नाम-जप की माला फेरने या माथे पर तिलक लगाने से कोई भी कार्य सिद्ध नहीं होता। यदि मन कच्चा है, तो वह व्यर्थ ही सांसारिक विषयों में नाचता रहेगा। सच्चा और दृढ़ मन ही राम में रम सकता है।
जहाँ जहाँ ठाढ़ौ लख्यौ - श्री बिहारी लाल, बिहारी सतसई (7)
जहाँ-जहाँ मैंने उन परम सुंदर रसिक शिरोमणि श्री श्यामसुन्दर को खड़े हुए देखा था, उनके वहाँ न रहने पर भी आज वे स्थान आँखों को एक क्षण के लिए बरबस पकड़ लेते हैं—आँख वहाँ से हटती ही नहीं।
चिरजीवौ जोरी जुरे - श्री बिहारी लाल, बिहारी सतसई (8)
(राधा-कृष्ण की यह) जोड़ी चिरंजीवी हो। इन दोनों में गहरा प्रेम क्यों न बना रहे? इनमें कौन किससे घटकर है? एक ओर तो वे वृषभानु की लाड़ली बेटी हैं, और दूसरी ओर वे विख्यात वीर बलदेवजी के छोटे भाई हैं।
सघन कुंज छाया सुखद - श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई (5)
जहाँ की कुंजें घनी हैं, छाया सुख देने वाली है और पवन शीतल व सुगंधित है—उस वृन्दावन में यमुना के तट पर जाते ही आज भी मन उसी प्रकार श्री राधा-कृष्ण के प्रेम में मग्न हो जाता है।
नित प्रति एकत ही रहत - श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई (9)
दोनों सदा एक साथ ही रहते हैं। (क्यों न हों?) दोनों की अवस्था, रूप-रंग और मन भी तो एक-से हैं। इस युगलमूर्ति (राधा-कृष्ण) का दर्शन करने के लिए तो आँखों के अनेक जोड़े चाहिए; क्योंकि केवल दो आँखों से देखने पर तृप्ति हो ही नहीं सकती।
नाचि अचानक हीं उठे - श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई (11)
बिना वर्षा-ऋतु के ही ब्रज के वन में मोर अचानक नाच उठे। जान पड़ता है कि इस दिशा को नन्द के लाड़ले (घनश्याम) ने आनन्दित किया है।
तजि तीरथ हरि-राधिका - श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई (4)
अन्य समस्त तीर्थों का त्याग कर केवल श्री राधा-कृष्ण की दिव्य अंग-कान्ति से ही अनन्य अनुराग करो। जिस ब्रज के निकुञ्ज-मार्गों में प्रिया-प्रीतम नित्य क्रीड़ा करते हैं, वहाँ का पग-पग साक्षात् 'प्रयाग' के समान पावन है।
गिरि तैं ऊँचे रसिक - श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई
पर्वत से भी ऊँचे रसिकों के मन जहाँ हजारों बार डूब चुके हैं, वही प्रेम का समुद्र संसारी और पशुवत बुद्धि वाले लोगों के लिए सदा उथला ही रहता है—इतना उथला कि उसमें उनके पैर भी नहीं डूबते।
सीस मुकुट कटि काछनी - श्रीमहाकवी श्री बिहारी लाल, बिहारी सतसई (2)
हे बाँके बिहारी लाल! आप नित्य ही मेरे मन में उसी रूप में विराजमान रहें—जिसमें आपके शीश पर मुकुट हो, कमर में काछनी बँधी हो, हाथों में मुरली हो और उर पर सुंदर माला सुशोभित हो।
या अनुरागी चित्त की - श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई (19)
जिस हृदय में श्यामसुंदर के अनुराग-रस का प्रादुर्भाव होता है, उस हृदय की गति को कोई नहीं समझ सकता। जितना-जितना श्याम-रंग गहरा होता जाता है, उतना-उतना ही वह जीव उज्ज्वल होता जाता है।