प्यारी अति रस प्रेम प्रवीन - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (185)
परम रसीली तथा प्रेम की कलाओं में निपुण हमारी श्री प्यारी जू (राधा) अत्यंत सुकोमल और लाडली हैं, जो अपने प्रीतम को नित्य-नवीन लाड लड़ाती हैं।
श्री बिहारिन देव जू की वाणी श्री वृंदावन, निकुंज वृंदावन रस एवं भक्ति की मूल सिद्धांत युक्त विभिन्न दोहों एवं पदों की एक काव्य रचना है, जो श्री बिहारिन देव जू द्वारा लिखित हैं। लेखक: श्री बिहारिन देव जू
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परम रसीली तथा प्रेम की कलाओं में निपुण हमारी श्री प्यारी जू (राधा) अत्यंत सुकोमल और लाडली हैं, जो अपने प्रीतम को नित्य-नवीन लाड लड़ाती हैं।
न जाने कितने पंडित बड़ी-बड़ी पोथियाँ पढ़ते-पढ़ते जीवन भर उसी में उलझे रहे और अंततः अपना अमूल्य जीवन व्यर्थ गँवा बैठे, परंतु वे प्रेम का एक भी वास्तविक अक्षर न पढ़ सके। वे केवल शुष्क शास्त्रीय ज्ञान का निरर्थक बोझ अपने सिर पर ढोते रहे, जिसके कारण उनके भीतर सच्चे विवेक का उदय न हो सका।
हे भाई! यह सर्वथा अकाट्य सिद्धांत है कि इहलोक-परलोक दोनों में ही प्रेम के बिना कोई नाता नहीं हुआ करता। इस संसार में माता, पिता, पुत्र और भ्राता आदि के जितने भी नाते हैं, वे मूलतः स्वार्थ की नींव पर टिके हैं। यहाँ वास्तविक निस्वार्थ प्रेम की सुगंध तक नहीं है, इसलिए केवल अज्ञानी लोग ही इन संबंधों में उलझते हैं।
स्वामी हरिदास जी की रस-उपासना में हमारे रसिक-शेखर श्रीयुगल तन, मन, मनसा, एवं रोम-रोम से एकमात्र अखंड नित्य-विहार में ऐसे वशीभूत हुए रहते हैं कि इस विहार के अतिरिक्त उन्हें अपना नाम सुनना भी सुहाता नहीं। श्री श्यामा-कुंजबिहारी का सर्वस्व और जीवन-प्राण केवल यह नित्य-विहार ही है।
परम रसिकों में श्रेष्ठ श्री कृष्ण और रसिक शिरोमणि श्री राधा साक्षात् रस की राशि हैं। वे दोनों ही अत्यंत चतुर रसिक हैं और समस्त रसिक जनों के जीवन के आधार हैं, जो सदैव परस्पर हास-विलास में मग्न रहते हैं।
हे बिहारीदास! श्रीमद्भागवत् के वर्तमान वक्ता मुख से तो अत्यंत सरस व्याख्यान करते हैं और बार-बार दण्डवत कर विनम्रता का प्रदर्शन भी करते हैं, किन्तु जो कुछ भेंट आती है, उससे अपनी देह-कुटुंब-परिवार का ही पालन-पोषण करते हैं। इसके विपरीत, श्री शुकदेव जी ने संपूर्ण भागवत् में संसार के विरक्ति और प्रभु-चरणों में अनन्य प्रीति का ही प्रतिपादन किया है। उन वक्ताओं की समझ पर आश्चर्य होता है जो श्रीमद्भागवत् के वास्तविक रहस्य से सर्वथा अनभिज्ञ हैं।
इन परम सुंदर युगल किशोर की आरती कीजिए। ये नवीन रसिक युगल, निकुंज के दो युगल चंद्रमाओं के समान हैं, जो भक्तों के हृदय के समस्त दुखों और अज्ञान रूपी अंधकार को हर लेने वाले हैं।
बहुत से लोग जन्मभर अपरस-सपरस अथवा बाह्य आचार-विचार में उलझे रहते हैं। मृत्यु के समय जब जीव खाट छोड़कर आगे की यात्रा पर जाता है, तब केवल भगवान से किया गया सच्चा प्रेम ही काम आता है और वही माया-सागर से पार करा सकता है; अन्य कुछ नहीं।
मन, वाणी और कर्म—तथा सम्पूर्ण आत्मभाव से श्री नित्यविहारिणी जू को ही अपना सर्वस्व मानो। इसी दिव्य रस के प्रभाव से श्रीविहारिणी जू की दासी बनकर, उनके पूर्ण वशीकरण में स्थित वह श्रीविहारिणीदासी प्रियाजू को नित्य सुख प्रदान करने वाली बनती है और श्री निकुंज-महल में सुशोभित होकर विराजमान रहती है।
हे सखी, चाहे कोई इसे कितना भी बताने का प्रयास करे, पर सत्य यही है कि श्री बिहारी–बिहारिणी जू का नित्य विहार ऐसा अद्भुत और विलक्षण रस से परिपूर्ण है, जिसकी गहराई को कोई भी पूर्णतः समझ नहीं सकता।
यदि तुम व्यभिचारियों के संग को सर्वथा त्याग दो, एकमात्र निष्काम और अनन्य भाव से प्रिया-प्रियतम का भजन करो, केवल उनके सुख में ही सुखी रहो, तो तुम्हारे हृदय रूपी घर में श्री युगल का प्रेम रूपी धन भर जाएगा।
हे मन रूपी भँवरे! तू ठौर-ठौर पर डोल रहा है, अब मेरी बात सुन। मैं तुझे ऐसा ज्ञान दूँगा जिससे तेरी रुचि श्री चरण-कमलों में उत्पन्न होगी और तू अगाध सुख को प्राप्त करेगा।
हीरे बोरे भरकर नहीं मिलते, न ही हंस पंक्तियों में चलते हैं । शेरों की भी भेड़ों-सी भीड़ नहीं होती, वैसे ही वास्तविक रसिकों की कोई जमात नहीं होती —वे अत्यंत दुर्लभ एवं छिपे हुए होते हैं ।
हे हरि! आपने मुझे ऐसे अपनाया कि जहाँ-जहाँ भी आपने मेरे जीवन में बाधाएँ देखीं, वहाँ-वहाँ आपने स्वयं ही उनका निवारण किया है ।
पंडित निपट-कोरे मिट्टी के समान इस कर्मकाण्ड में ऐसे उलझे रहते हैं जिसका कोई ओर-छोर ही नहीं है। ऐसे बाह्य आडम्बरों से युक्त कर्मकाण्डी लोग सर्वोच्च प्रेम पदार्थ को कैसे प्राप्त कर सकते हैं?
मेरी स्वामिनी श्री राधा जी प्रसन्न मुख वाली हैं और श्रीकृष्ण सुख की राशि हैं । मैं इन दोनों को नित्य-प्रतिदिन, क्षण-क्षण लाड़ लड़ाता रहूँ और इनकी शाबाशी पाता रहूँ । [1]
प्रेमधाम श्रीब्रजमंडल में बसने से हमें वे श्री बाँकेबिहारीजी महाराज प्राप्त हुए हैं, जो एक मात्र प्रेमी भक्तों से प्रेम के कारण ही सपरस (स्पर्श/आलिंगन) करते हैं। प्रेम-विहीन बाह्य अपरस-सपरस के विचारों में उलझे रहने वाले सकामी जनों से तो वे सदा काल दूर रहते हैं, इसलिए वे लोग सदा दुखी बने रहते हैं।
श्री वृन्दावन धाम की प्राप्ति साक्षात् इष्ट की प्राप्ति ही है। जितना हम श्री वृंदावन धाम वास से पृथक हैं, उतना ही हम अपने उपास्य तत्व से भी विलग हैं। फिर भी यदि कोई व्यक्ति यह कहे कि "हम तो इतने दिन से श्री वृन्दावन धाम में वास करते हैं, तो हमें तो ऐसा अनुभव नहीं हुआ," तो श्री बिहारिन देव कहते हैं कि "हे भाई! तुम्हारा वास कुछ-कुछ तो सच्चा है, और कुछ तुमने मन में लोभ-लालच संजो रखे हैं, इसीलिए तुम्हें यह अनुभव नहीं हो रहा। अन्यथा वृंदावन की प्राप्ति साक्षात् इष्ट की प्राप्ति है।"
हे भाई! मैं तुम्हें सत्य बता रहा हूँ कि किसी भी बात का अहंकार अच्छा नहीं होता। प्रभु के द्वारा दिए बिना, किसी को कुछ भी प्राप्त नहीं होता। अतः अपने या पराए के हानि-लाभ में तुम्हारा मन दुख-सुख क्यों मानता है?
श्री बिहारिन देव अपने मन से उपदेश करते हैं — “अब तू सब ओर से भलीभांति स्वयं को हटा कर, केवल स्वामी श्री हरिदास जी के रस-यश में, अर्थात् युगल सरकार के अखंड नित्य विहार रस में ही अपने आप को सदा-सर्वदा स्थिर कर दे क्योंकि जो रस यहाँ प्राप्त होता है वैसा और कहीं नहीं है ।”