ब्रज निधि ग्रंथावली

ब्रज निधि ग्रंथावली निम्बार्क सम्प्रदाय के ब्रज के रसिक संत श्री ब्रज निधि द्वारा रचित ग्रंथ है।

40 लेख उपलब्ध हैं

  1. प्रिया बदन बिधु तन लखे - श्री ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (68)

    श्री प्रिया जी के मुख-रूपी चंद्रमा की ओर प्रियतम श्री कृष्ण के नेत्र चकोर के समान निरंतर एकटक निहारते रहते हैं। श्री राधा के अगाध सौंदर्य-रूपी मदिरा का निरंतर पान करके नन्दनन्दन श्रीकृष्ण सदा छके रहते हैं।

  2. हम तौ राधाकृष्न-उपासी - ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रजनिधि पद संग्रह (11)

    हम तो केवल श्री राधा-कृष्ण के ही उपासक हैं। गौर वर्ण की श्री राधा और श्याम वर्ण के श्री कृष्ण की यह जोड़ी अत्यंत अभिराम, मनमोहक और सुख की राशि है।

  3. ब्रह्मा इंद्र कहैं हम चाहैं - श्री ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रज शृंगार (7)

    ब्रह्मा और इन्द्र कहते हैं—हमें ब्रह्मलोक अथवा स्वर्गलोक के सम्राट की पदवी नहीं चाहिए। यदि ब्रज में एक वृक्ष बनने का भी सौभाग्य मिल जाए, तो हम सदा वहीं बने रहना चाहेंगे।

  4. कुँवरि किसोरी नवल पिय करत परस्पर हेत - श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, हरि पद संग्रह (45)

    कुंवरी किशोरी श्री राधा और नवल रसिक श्री कृष्ण परस्पर प्रेम के बंधन में बँधे हैं। केवल थोड़ी-सी मुस्कान से ही वे मेरे मन को हर लेते हैं।

  5. कहूँ लकुट कहुँ मुरलिका पीताम्बर सुधि नाहिं - श्री ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (63)

    श्रीराधा के ध्यान में श्रीकृष्ण इस प्रकार डूबे हुए हैं कि उन्हें न तो अपनी छड़ी का होश है, न मुरली का पता है, और न ही अपने पीताम्बर की सुधि शेष है। यहाँ तक कि उनके सिर की मोर-पंखी चंद्रिका भी ध्यानमग्न होकर झुक गई है मानो वह भी उसी प्रेम-भाव में लीन हो गई हो।

  6. हमारी बृंदावन रजधानी - श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रजनिधि मुक्तावलि (9)

    श्री वृन्दावन समस्त तीर्थों का शिरोमणि, रसिकों की राजधानी है, जहाँ निधिवन के अधिपति, ब्रजराज लाड़िले श्रीकृष्ण नित्य विराजमान हैं, और श्री राधा रानी उनकी परमस्नेहवती पटरानी रूप में विराजमान हैं।

  7. सुर-नर-किन्नर-उरग हू - श्री ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रज शृंगार (6)

    चाहे देवता हों या मनुष्य, किन्नर हों या नाग — सभी प्राणी यही कहते हैं कि यदि उन्हें ब्रज की रेणु (रज) मिल जाए, तो उनका जीवन धन्य हो जाए और उनका भाग्य सफल कहलाए।

  8. छबीली राधे कब दरसन दैहौ - ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रजनिधि पद संग्रह (25)

    हे छबीली राधे! मुझे कब आप अपने दर्शन से तृप्त करेंगीं? मेरी अँखियाँ चकोरी पक्षी की भाँति आपके चंद्रमुख की सुधा-रस पान करने के लिए व्याकुल हैं।

  9. नीलंबर को ध्यान धरि - श्री ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (59)

    जब से श्रीकृष्ण की दृष्टि संकेत ग्राम (जो बरसाना और नंदगाँव के मध्य स्थित है) में श्रीराधा पर पड़ी है, तब से वे अनवरत बरसाने की ओर ही निहार रहे हैं। (मानो वे निरंतर अपेक्षा कर रहे हैं कि कब फिर से श्रीराधा की मधुर छवि के दर्शन होंगे)

  10. छुवत राधिका-अंग कौ कंप-स्वेद ह्वै जाय - श्री ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रज शृंगार (28)

    श्रीकृष्ण जैसे ही श्रीराधिका का श्रृंगार करने के लिए अपने करकमलों से उनके अंग को स्पर्श करते हैं, उनका शरीर कंप, स्वेद आदि सात्विक भावों से रोमांचित हो उठता है। ऐसी दिव्य प्रेममयी अवस्था में ब्रजराज श्रीकृष्ण श्री राधा का थोड़ा सा श्रृंगार करने में भी असमर्थ हो जाते हैं।

  11. राधे तुम मोकौ अपनायौ - श्री ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रज निधि मुक्तावली (8)

    हे राधे! आपने मुझे अपना स्वीकार कर लिया है। मैं चाहे अति मूढ़ हूँ, कुछ भी नहीं जानता-समझता हूँ, फिर भी आपने मुझसे अपना सुंदर यशोगान करवा लिया है।

  12. काली कहै मो मैं है रु - श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रज श्रृंगार (23)

    जिनका पार माता काली, भगवान शिव एवं ब्रह्मा भी पाने में असमर्थ हैं। जिनकी भक्ति इंद्र, वरुण एवं कुबेर आदि देवता करते रहते हैं।

  13. नीलंबर को ध्यान धरि - श्री ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (61)

    नीले वस्त्रों को धारण करने वाली श्री राधा का ध्यान कर श्री श्यामसुन्दर उन्मत्त हो उठे । श्री किशोरीजी के गौर वर्ण वाले रूप को निहारने के कारण ही वे सदा पीतांबर धारण करते हैं ।

  14. प्यारी के अति प्यार सों, पिय परसत कर पाय - श्री ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (51)

    जब श्री राधा मान करती हैं तब श्री कृष्ण अति ही प्रेम में भरकर, उनके चरणों को अपने कर कमलों द्वारा स्पर्श कर, उन श्री चरणों की आराधना करते हैं । श्री कृष्ण के प्रेम की पीर को पहचान कर श्री राधा उन्हें क्षमा कर मुस्कुरा देती हैं ।

  15. छबीली बिहारिनि की छबि पर बलिहारी - ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रजनिधि पद संग्रह (62)

    छबीली बिहारिनि श्री राधा जू की छवि पर मैं स्वयं को न्योंछावर करता हूँ। ब्रज की नित्य नवल किशोरी, सखियों की शिरोमणि, श्री श्यामा जू ने कुञ्ज-बिहारी श्री कृष्ण को अपने वश में कर रखा है।

  16. लगैं मोहिं स्वामिनी नीकी - श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रजनिधि पद संग्रह (21)

    मुझे मेरी स्वामिनी श्री राधिका बहुत प्यारी लगती हैं । उनके मृग के समान नैन हैं, कोयल के समान वाणी है, एवं प्रियतम श्री श्यामसुन्दर को सुख दान करने वाली हैं ।

  17. तीर्थ सबै देखे सुने - श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रज शृंगार (4)

    तीर्थ तो बहुत देखे एवं सुने हैं परंतु इस ब्रज भूमि के समान कोई नहीं है जहाँ की रज आज भी श्रीकृष्ण के श्रीचरणों के स्पर्श और उनके अलौकिक अनुराग से ओतप्रोत है।