घनानंद ग्रंथावली

घनानंद ग्रंथावली श्री निम्बार्क संप्रदाय के रसिक श्री आनंदघन जी द्वारा लिखी गई है। लेखक: श्री आनंदघन

57 लेख उपलब्ध हैं

  1. या रस कों हौं हीं - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (796)

    श्री प्रिया-प्रियतम के अत्यंत गोपनीय और अनिर्वचनीय निकुंज-रस का गान करते हुए रसिक शिरोमणि कवि आनंदघन जी कह रहे हैं— इस परम अलौकिक और गूढ़ प्रेम-रस का बखान भला मैं अपनी तुच्छ वाणी से किस प्रकार कर सकता हूँ? परम पावन श्रीधाम श्रीवृंदावन में, यमुना जी के सुंदर तट पर श्रीराधा-मोहन जिस अंतरंग भाव से नित्य विहार करते हैं, वह वाणी से सर्वथा परे है।

  2. ललित फागु रचना रची - श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली, सरस वसंत (66)

    परम मनोहर फाग (होली-विलास) की रचना रची गई है, और मधुर बसंत ऋतु आनंदपूर्वक शोभित हो रही है। माधव की प्रियतमा श्री राधा जू की जय हो, वनमाली प्रियतम श्रीकृष्ण की जय हो।

  3. राधा रास-सिरोमनी राधा केलि-कुलीन - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रिया प्रसाद (81)

    श्रीराधा रास की शिरोमणि और केलि-लीला की परम कुलीन स्वरूपा हैं। वे समस्त कलाओं से परिपूर्ण, स्वयं रसस्वरूपिणी तथा प्रेम में पूर्णतः लीन रहने वाली प्रेम की अधिष्ठात्री हैं।

  4. ब्रजमोहन उर अवनि में राधा-सुपद-विहार - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रिया प्रसाद (75)

    श्री कृष्ण के हृदय रूपी धाम में श्री राधा के सुंदर चरण सदा विहार करते हैं जिससे उनका रोम रोम आनंद से भीग जाता है।

  5. नित बिहार बृंदावन राधा मोहन - श्री आनन्दघन जी, श्री घनानंद ग्रंथावली, पदावली (637)

    श्रीराधा और श्रीमोहन (श्रीकृष्ण) श्री धाम वृन्दावन में नित्य विहार करते रहते हैं। वे स्वभाव से ही सहज रंगीले, छैल-छबीले हैं, जो हृदय में प्रेम का संचार (आदान-प्रदान) करते रहते हैं ।

  6. चातिक चुहल चहुँ ओर चाहै स्वाति - घनानंद ग्रंथावली, सुजान हित (187)

    विनोदी स्वभाव का चातक पक्षी संसार भर के जल को त्यागकर केवल स्वाति की बूंद ही चाहता है — वह अपने प्रण का ऐसा पालनकर्ता है कि अमृत भी उसके लिए विष बन जाता है।

  7. ब्रजबन लीला माधुरी निरविधि रस कौ सार - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, अनुभव चंद्रिका (54)

    ब्रजवन की लीलाओं की मधुरता अनंत रस का सार है। रसिक शिरोमणि श्री राधा-कृष्ण की कृपा से मुझे प्रेम का आधार प्राप्त हुआ है।

  8. राधे दै बृंदावन-बास - श्री आनन्दघन जी, श्री घनानंद ग्रंथावली, पदावली (372)

    हे श्रीराधे! कृपा करके मुझे श्रीवृंदावन में निवास प्रदान कीजिए। मेरा मन उसी प्रकार आप में स्थिर बना रहे, जैसे कोई पनिहारिन अपने सिर पर मटका रखे चलती है— सखियों से हँस-बोल भी रही होती है, पर उसका ध्यान सदा मटकी पर ही टिका रहता है। ऐसी कृपा हो कि मेरा यह तन भी आपकी सेवा में निरंतर लगा रहे।

  9. एक आस एकै बिसवास प्रान गहैं बास - घनानंद ग्रंथावली, सुजान हित (260)

    हे प्रियतम! तुमसे पुनः मिलने की एक मात्र आशा और विश्वास के सहारे ही मेरे ये प्राण (शरीर में) बचे हुए हैं, क्योंकि, इन्हें अब किसी दूसरे से पहचान नहीं रह गई है।

  10. कमला तप साधि अराधति है - श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली, सुजान हित (467)

    श्री लक्ष्मी जी तप-साधना द्वारा श्री कृष्ण की आराधना करती हैं, मानो अभिलाषा रूपी महोदधि (समुद्र) में अवगाहन करने के लिए तपस्या कर रही हों।

  11. मधुर केलिरस-झेलि सों - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रिया प्रसाद (69)

    प्रिया प्रीतम की केली लीलाओं के मधुर रस में डूबकर, रसना दिव्य "राधा" नाम का अति अद्भुत आनंद लेती है, जो मनमोहक वाणी रूपी लता का ऐसा सुफल (सुंदर फल) है, जिसका रस अद्वितीय है और जिसकी कोई तुलना नहीं की जा सकती।

  12. पहचानै हरि कौन, मो से अनपहचान कों - श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली

    हे हरि! मुझ जैसे अपरिचित को कौन पहचान सकता है। जिस प्रकार आपके नेत्रों के बीच कृपा रूपी कान छिपे हुए हैं, उसी प्रकार मेरे मौन में पुकार छुपी हुई है। (अर्थात, मेरे बिना कहे ही आप अपने नेत्रों में छिपे कृपा रूपी कानों से सब सुन और समझकर कृपा करते हो। ऐसा अन्य कोई नहीं कर सकता।)

  13. कृपा-कादंबिनी जमुना बिराजै - घनानंद ग्रंथावली

    कृपा की कादम्बिनी के समान यमुना जी शोभायमान है । यह उल्लास की मूर्ति हैं, इनके दर्शन मात्र से हृदय प्रेम से परिपूर्ण हो जाता है। श्री कृष्ण के स्पर्श के कारण यह विशुद्ध प्रेम प्रदान करने वाली है और यह कृष्ण के यश-वैभव के रूप में विराजमान है।

  14. इस्कलता ब्रजचंद की जो बाँचै दै चित्त - घनानंद ग्रंथावली, इश्क़लता (44)

    जिसको ब्रजचन्द्र श्री कृष्ण के दिव्य प्रेम की चाह हो तो वे अपने मन का अनुराग सुख के धाम श्री वृंदावन से करे और नित्त ही नित्त प्रेम की लहरों में डूबा करे ।

  15. दोऊ मिलि एकै भए - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रिया प्रसाद (73)

    श्रीराधा-कृष्ण की यह दिव्य रसीली जोड़ी प्रेम के अतिरेक में मिलकर पूर्णतः एक हो गई है। मेरी यही एकमात्र अभिलाषा है कि यमुना के पावन तट पर, सघन कुंजों और लताओं की ओट में विहार करती इस जुगल छवि का मैं सदैव दर्शन करता रहूँ।