स्वामी श्री हरिदास

स्वामी श्री हरिदास, वृंदावन के रसिक शिरोमणि संत थे, जो श्री ललिता सखी के अवतार थे, जो श्री राधारानी की मुख्य सखी हैं। स्वामी हरिदास जी ने 'केलिमाल' की रचना में 'अखंड नित्य विहार' रस निकुंज उपासना को प्रस्तुत किया है ।

120 लेख उपलब्ध हैं

  1. श्रम जल कन नाहीं होत - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (59)

    हे राधे! सुरत-श्रम के पश्चात तुम्हारी रसमयी छवि के श्रीअंगों पर सुशोभित ये स्वेद-बिन्दु (पसीने की बूँदें) कोई साधारण जल-कण नहीं हैं, अपितु ये साक्षात् चिन्मय मोतियों की माला के समान दमक रहे हैं। संसार में अनेक बहुमूल्य मोती तो देखे, किन्तु इस अलौकिक छवि का कोई मूल्य नहीं है; इस अद्भुत रूप-माधुरी पर मैं अपना तन, मन और धन सब कुछ बार-बार न्योछावर करता हूँ।

  2. बचन दै मान न करौं - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (59)

    प्रियतम बाँके बिहारी श्री राधा रानी से कहते हैं— हे प्यारीजू! वचन दीजिये कि आप कभी मान न करेंगी। मन से कभी मान नहीं करेंगी, वचनों से कभी रुखाई न बरतेंगी, एवं किसी क्रिया द्वारा अर्थात् भौहों को टेड़ी करके मुझे डरायेंगी नहीं।

  3. द्वै लर मोतिन की एक पुंजा पोति कौ सादा - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (20)

    श्री कुंजबिहारिणीजू (श्रीराधा) के गले में मोती की दो लरियों वाला हार, सादा और एकदम सुगठित है।हे सखी! मेरी दृष्टि उनसे हटती ही नहीं।

  4. बेंनी गूँथि कहा कोउ जानें मेरी सी - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (70)

    हे प्यारी जू ! आपकी सौगन्ध खा कर कह रहा हूँ कि वेणी गूंथने की कला मेरे समान और कौन जानता है ? हे प्यारी! वेणी के बीच-बीच में सफेद, पीले एवं लाल फूलों की सज्जा मेरे सदृश दूसरा कोई नहीं बना सकता ।

  5. युगल नाम सौं नेम, जपत नित कुंजबिहारी - श्री नाभादास, भक्तमाल (91)

    स्वामी श्री हरिदास जी का वर्णन करते हुए श्री नाभादास जी कहते हैं कि श्री स्वामी हरिदास जी का अटल नियम था कि युगल नाम के चिंतन में सदा रहते थे एवं श्यामा कुंजबिहारी को नित्य ही प्रेम से लाड़ लड़ाते थे । वे नित्य श्री राधा कृष्ण की परम अंतरंग केली का ही सदा अवलोकन करते थे, एवं श्री राधा की सखी भाव के रस का पान करते थे।

  6. कुंजबिहारी कौ बसन्त सखि - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (99)

    अरी सखी ! चलो न, श्यामा- कुञ्जविहारी का वसन्तोत्सव देखने चलें । देखो, श्रीधाम वृन्दावन नव-नव उमंगों से पुलकित हो रहा है । इसकी कुंज निकुजें भी नवीन हैं और पत्र-पुष्पों का विकास भी नवीन है । ऐसे सरस वातावरण में श्यामा श्याम नव तरुणियों के बीच उनसे मिलकर वसन्तोत्सव मना रहे हैं ।

  7. बनी री तेरे चारि चारि चूरी करनि - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (50)

    हे प्यारीजू (श्री राधा), आपके प्रत्येक हाथ में चार चूड़ियाँ सुशोभित हैं। एक बहुमूल्य हीरे का हार आपके गले की शोभा बढ़ा रहा है, और आपकी नथ से मोती झूल रहे हैं।

  8. अजहूँ कहा कहति है री मारै नैंन आरनि - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (64)

    हे प्रियाजू ! आपकी चितवन के प्रहार से लाल (श्री कृष्ण) के हृदय में ऐसी वेदना हो रही है, क्या अब भी कुछ कहना शेष है ? अब क्या कहती हो ?

  9. अनन्य नृपति श्रीस्वामी हरिदास - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (70)

    श्री स्वामी हरिदास जी अनन्य रसिक प्रेमियों में सर्वोच्च सम्राट के समान हैं। वृंदावन के एकांत कुंजों में श्री कुंज बिहारी-बिहारीणी के अतिरिक्त उन्होंने न तो कहीं और दृष्टि डाली और न ही किसी अन्य से आशा की, चाहे वो कोई भी हो।

  10. प्यारी तेरौ बदन चंद देखैं - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (57)

    लालजी (श्री कृष्ण) श्री राधा से कहते हैं - हे प्यारी जू, आपके चन्द्र वदन को देखकर मेरे हृदय रूपी सरोवर में चाह रूपी कमल प्रफुल्लित हुई है।

  11. प्यारी तेरी बॉफिन बान सुमार - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (37)

    श्री कृष्ण श्री राधा से कहते हैं - हे प्यारी जू! आपकी चितवनि अर्थात् पलकें बाण के समान हैं एवं भौंहें धनुष के समान हैं जिसके प्रहार से कोई नहीं बच सकता । यदि एक साथ इस धनुष के बाण छूट जायें तो ऐसा रस बरसता है मानो इंद्र के क्रोध से भयंकर बादल बरसने लगें ।

  12. सुनि धुनि मुरली बन बाजै - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (52)

    अरी सखी! कुंजों में बज रही मुरली की धुन सुन, श्री हरि ने रास रचाया है । प्रत्येक कुंज में वृक्ष एवं लताएँ प्रफुल्लित हैं एवं रास मण्डल सोने एवं मणियों से जटित है ।

  13. प्यारी जू हम तुम दोऊ इहाँ न कोउ हितू मेरौ - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (79)

    हे प्यारी जू, हम दोनों एक ही कुंज के साथी हैं, तो हम क्यों एक दूसरे से रूठें । यहां कोई हमारा ऐसा हितैषी नहीं जो हम दोनों की पीर को समझ सके । [1]

  14. ऐसी जिय होत जो जिय सौं जिय मिलै - ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (35)

    श्री श्यामसुंदर प्यारी श्री राधा से कहते हैं - हे प्यारी जू, मेरी ऐसी इच्छा हो रही है कि हृदय से हृदय मिल जाये, तन में तन समा जाय, परन्तु हे प्यारी, फिर मैं आपके दर्शन कहाँ कर पाउँगा ?

  15. सोई तौ बचन मोसौं मानि - श्री स्वामी हरिदास जी, केलिमाल (44)

    निकुंज महल में दिव्य युगल श्री राधा कृष्ण विराजमान हैं। उसी समय श्री राधा अपना प्रतिबिंब देखते हुए, अपने ही प्रतिबिंब से मधुर वचन कहने लगीं: