श्री हित हरिवंश महाप्रभु

श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री वृंदावन धाम के रसिक शिरोमणि संत और श्री कृष्ण की वंशी के अवतार हैं। वे श्री राधारानी को ही अपना गुरु और इष्ट मानते हैं और राधावल्लभ संप्रदाय के मुख्य आचार्य हैं। इनकी उपासना में मुख्य रूप से सहचरी भाव है, जिसमें श्री राधा चरण प्रधानता है।

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  1. राधा प्यारी तेरे नैंन सलोल - श्री हित हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (23)

    हित सखी (श्री हरिवंश महाप्रभु) भाव-विभोर होकर कहती हैं— हे प्यारी राधे! आज तुम्हारे नेत्र अत्यंत चंचल और मदमाते हैं। तुमने अपनी अनन्य प्रीति, अनुराग और कंचन के समान कांतिवान गौर देह से रसिकलाल श्रीकृष्ण को पूर्णतः अपने वश में कर लिया है।

  2. यत्पादाम्बुरुहेक रेणु-कणिकां - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (72)

    जिनके चरणकमलों की एक रज कण को ब्रह्मा, शिव आदि गोपी-भाव का आश्रय लेकर के भी प्राप्त नहीं कर पाये, वही प्रेमामृत रस-सागर की निधि श्री राधा महारानी समय की प्रबल गति से साधारण गोपी सी प्रतीत हो गई हैं — हे दैव (काल)! तुम्हें नमस्कार है।

  3. बैंनु माई बाजै बंसीवट - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (64)

    हे सखी! वंशीवट में श्री कृष्ण की वंशी की मधुर ध्वनि गूँज रही है। श्री धाम वृन्दावन के परम पावन एवं सुन्दर यमुना तट में सदा वसंत ही रहता है ।

  4. यस्याः स्फूर्जत्पदनखमणि ज्योति - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (136)

    जिनकी प्रकाशमान् पद-नख-मणि-ज्योति की एक छटा का विलास सघन प्रेमामृत-रस के कोटि-कोटि सिन्धुओं के समान है। वे श्रीराधा यदि कदाचित् मुझ पर कृपा-दृष्टि-पात कर दें तो अनेक प्राकृत-अप्राकृत शोभायें और मुक्ति भी मेरे लिये तुच्छ हो जायँ ।

  5. लक्ष्म्या यश्च न गोचरीभवति यन्नापुः - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (239)

    लक्ष्मी को भी जिसका साक्षात्कार नहीं होता, जिसे श्रीदामा आदि सखागण भी प्राप्त नहीं कर सके, जो ब्रह्मा, नारद, शिव, सनकादि के द्वारा कल्पनीय नहीं है, जो श्रीवृन्दावन की नागरी गोपिकाओं (ललितादिकों) के भाव (सखी भाव) द्वारा (ही) प्राप्त है, श्रीराधामाधव के उस एकान्त दास्य का अधिकार मुझे कैसे मिले ?

  6. श्री हरिवंश सरन जे आये - श्री नेह नागरी दास जी की वाणी, सिद्धांत (136)

    जो भी जीव श्रीहरिवंश महाप्रभु जी की शरण में आ गए, उनका नाम स्वयं श्री राधा-श्यामसुन्दर ने अपने हस्तकमल से भक्तों की सूची में अंकित कर लिया।

  7. श्रीराधाचरण प्रधान - श्री नाभादास, भक्तमाल (90)

    श्री हित हरिवंश जी श्री राधा के चरण-कमलों के सुदृढ़ उपासक हैं, अर्थात् उनकी उपासना का मुख्य आधार केवल श्री राधा चरणों की आराधना ही है । वे सदा निकुंज की मधुर केली लीलाओं में संलग्न युगल दंपति की परम खवासी (सेवा) करते हैं ।

  8. बाद ग्राम, मथुरा - श्री हित हरिवंश महाप्रभु का प्राकट्य स्थल

    मथुरा में स्थित बाद ग्राम राधावल्लभ संप्रदाय प्रवर्तक श्री हित हरिवंश महाप्रभु की जन्म भूमि है। इसलिए यह स्थान राधावल्लभ सम्प्रदायानुगत वैष्णवों के लिए एक तीर्थ स्थान है।

  9. कदा वा राधायाः पदकमल - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (191)

    मैं कब श्रीराधा के परम करुणायुक्त चरण कमलों को हृदय में धारण करके इस संसार के नियमित विधि निषेधों को पूर्ण रूप से त्याग दूंगी, और कब सर्व सुखद गोविन्द मुझे श्री राधा के प्रति अनन्यता से धन्य दासी जान, निकुंजांतर सेवा योग्य काम-कला का शिक्षण करेंगे?

  10. मोहनलाल के रसमाती - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (20)

    हे राधे ! तू मोहन लाल के रस में उन्मत्त है। हे नव वधू ! उस एकान्त मिलन की गोप्य बात को क्यों मुझसे छिपा रही है? इसीलिये न कि प्रथम स्नेह के कारण संकोच है !

  11. तैं भाजन कृत जटित विमल - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री स्फुट वाणी (7)

    जैसे कोई विविध रत्नों से जटित स्वर्णपात्र में अमृत भरकर उसे चूल्हे पर चढ़ाकर चन्दन की लकड़ी से अग्नि प्रज्बलित करके उसमें सरसों की खली को रांधे, अर्थात इस दुर्लभ मनुष्य देह से असत्य विषय सुख प्राप्त करना चाहे, तो वह पुरुष मन्दमति नहीं तो क्या कहा जाएगा ?

  12. चलि सुंदरि बोली वृंदावन - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (44)

    (दूतिका ने श्रीप्रियाजी से कहा- ) हे सुन्दरि ! चलो !! तुम्हें ( प्रियतम ने ) वृंदावन में बुलाया है । हे कामिनि ! तुम तो हो दामिनि जैसी और मोहन नूतन घन की भाँति । तब फिर तुम उनके कण्ठ में ( घन में दामिनि की भाँति ) लग कर क्यों नहीं शोभित होती ?

  13. यस्यास्ते बत किंकरीषु - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (93)

    वृन्दाटवी कन्दर्प श्रीलालजी श्री राधिका के प्रसादोत्सव की इच्छा से उनकी किंकरियों की अत्यन्त हर्ष-पूर्वक अधिकाधिक सदा चाटुकारिता करते रहते हैं । आपके जिन युगल चरण-कमलों से सदा ही घनीभूत आनन्द एवं अनुराग की लहरें प्रवाहित होती रहती है, हे वृषभानुनन्दिनि ! मैं आपके उन्हीं श्रीचरणों की सदा बन्दना करती हूँ ।

  14. खंजन मीन मृगज मद मेंटत - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (73)

    हे प्रिया, मैं तुम्हारे नेत्रों की बात क्या कहूँ ? यह अपनी चंचलता से खंजन का, तिरछी गति से मीन का, और भोलेपन से मृगछोना का मद चूर चूर कर रहे हैं ।

  15. यल्लक्ष्मी शुक नारदादि - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (85)

    हे नव- कुञ्ज नागरि ! मैं आपके उस कैंकर्य प्राप्ति की आशा को धारण किये हुए हूँ जिससे क्षण-क्षण में अद्भुत रस की प्राप्ति होती है और जिसे उन अनुराग-उत्सव मयी ब्रज-किशोरी गणों ने प्राप्त किया था, जिन ब्रजांगनों के अनुराग-उत्सव की लालसा लक्ष्मी, शुक, नारद आदि को भी रहती है। हे श्रीराधे ! मेरे लिये आप अपनी उस कृपा-दृष्टि का दान क्या कभी करोगी?

  16. आरती मदन गोपाल की कीजियै - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (18)

    मदनगोपाल की आरती करनी चाहिये। देवऋषि नारद, वेदव्यास एवं शुकदेवजी जब विश्वास पूर्वक इस बात को कहते हैं तब (मदनगोपाल की आरती करके) बिना श्रम के रससिन्धु का पान क्यों नहीं करते?

  17. तू रति रंगभरी देखियत है श्री राधे - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (10)

    हे श्रीराधे, आज तुम प्रेम-रंग भरी दिखलाई दे रही हो, मालूम होता है कि तुमने अपने मोहन प्रियतम के साथ रात्रि में एकान्त रमण किया है ।

  18. प्रेम्णः सन्मधुरोज्ज्वलस्य हृदयं श्रृंगारलीलाकला - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (78)

    जो मधुर और उज्ज्वल प्रेम की प्राण-स्वरूपा, श्रृंगार रस की लीला कलाओं की विचित्रता की सर्वोच्च अवधि, भगवान् श्रीकृष्ण की आराधनीया कोई अनिर्वचनीया शासन-कर्ती हैं। जो ईश्वर-रूप श्रीकृष्ण की शची हैं तथा समस्त ऐश्वर्य शक्तियाँ पार्वती, इन्द्राणी और महासुख स्वरूपा की स्वतन्त्र सुखमय वपुधारिणी शक्ति हैं; वे श्रीवृन्दावन के नाथ की पटरानी 'श्रीराधा' ही केवल मेरी सेव्या एवं आराध्या हैं ।

  19. लाल की रूप माधुरी नैननि निरखि नेकु सखी - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (22)

    हे सखी, तू अपने नेत्रों से लाल की रूप माधुरी को तनिक देख तो सही । सुकुमारता की राशि श्रीश्यामसुन्दर की मुसकान कामदेव के मन को हरण करने वाली है । उनके नख से शिखा पर्यन्त विभिन्न अंग इतने अधिक सुन्दर हैं मानो उन्होंने उमँगकर सुन्दरता की सीमा का उल्लंघन कर दिया है ।

  20. लिखन्ति भुजमूलतो न खलु शंख-चक्रादिकं - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (81)

    श्री गुरु द्वारा दिए गए भजन के पराक्रम से युक्त वे कोई महाबुद्धिमान विरले ही अनन्य रसिक जन हैं, जो न तो भुजाओं में शंख चक्र आदि वैष्णव चिन्हों को धारण करते हैं, और न ही कभी ललाट पर वैष्णव तिलक आदि रचते हैं, और न ही अपने कंठ में सुहावनी तुलसी माला को धारण करते हैं । उन्हें तो इन सब बाहरी लक्षणों की सुधि ही नहीं, वे किसी अंतरंग राधा रस में डूबे हुए हैं ।